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धर्म स्थल हरिद्वार: शिव और शक्ति के उपासकों का केंद्र

तीर्थनगरी हरिद्वार का उपनगर कनखल भगवान शिव की ससुराल और सती का जन्मस्थल माना जाता है। वहीं हरिद्वार के गंगा तट पर चंडी देवी मंदिर की पर्वतमाला नील पर्वत के कजरी वन की तलहटी पर गंगा के पूर्वी छोर में आदि दक्षिण काली पीठ सतयुग से स्थापित है। भगवान शिव आदि योगी और तंत्र साधना के पहले महासाधक माने जाते हैं। पृथ्वी पर पहले तंत्र साधना के साधक बाबा कामराज माने जाते हैं। बाबा कामराज को शिव और शक्ति का प्रथम उपासक माना गया है। उन्होंने बरसों तक हरिद्वार के गंगा तट पर चंडी घाट पर कठोर तंत्र साधना की थी।

सती और शिव का स्थल हरिद्वार।

तीर्थ नगरी हरिद्वार में गंगा के पावन तट पर शिव और शक्ति दोनों की पूजा होती है, क्योंकि गंगा हरिद्वार में शिव की जटाओं से निकलते हुए मैदान में प्रवेश करती है। इसलिए इस देवस्थली में शिव की पूजा के साथ-साथ शक्ति पूजा का विशेष महत्व है। इसलिए तीर्थ नगरी हरिद्वार शैव मत के उपासकोंं के साथ-साथ शक्ति पूजा के उपासकों के लिए हमेशा आकर्षण का केंद्र रही है।

तीर्थनगरी हरिद्वार का उपनगर कनखल भगवान शिव की ससुराल और सती का जन्मस्थल माना जाता है। वहीं हरिद्वार के गंगा तट पर चंडी देवी मंदिर की पर्वतमाला नील पर्वत के कजरी वन की तलहटी पर गंगा के पूर्वी छोर में आदि दक्षिण काली पीठ सतयुग से स्थापित है। भगवान शिव आदि योगी और तंत्र साधना के पहले महासाधक माने जाते हैं। पृथ्वी पर पहले तंत्र साधना के साधक बाबा कामराज माने जाते हैं। बाबा कामराज को शिव और शक्ति यानी शिव और काली का प्रथम उपासक माना गया है। उन्होंने बरसों तक हरिद्वार के गंगा तट पर चंडी घाट यानी नील धारा गंगा क्षेत्र में कठोर तंत्र साधना की थी।

बाबा कामराज को भगवान शिव ने सपने में दर्शन दिए और इस नीलधारा गंगा क्षेत्र में आदि दक्षिण कालीपीठ के दिव्य दर्शन कराए और उसकी खोज करने के निर्देश दिए। कठोर साधना के बाद बाबा कामराज ने नीलधारा क्षेत्र में चंडी घाट के पूर्वी तट पर श्मशान घाट के निकट आदि शक्ति दक्षिण कालीपीठ की खोज की। यह पीठ सतयुग काल का पीठ माना जाता है, जो तंत्र साधना और काली के उपासकों के लिए सबसे बड़ा तीर्थ है।

यह क्षेत्र अघोर साधकों के लिए भी प्रमुख केंद्र माना जाता है। मान्यता है कि बाबा कामराज ने यहां लुप्त हुई दक्षिण कालीपीठ को जागृत करने के लिए नीलधारा गंगा क्षेत्र में स्थित श्मशान में से 1008 शवों को पुनर्जीवित किया और उनके नर मुंडों की बलि चढ़ाई। तब आदि कालीपीठ जागृत हुआ। तंत्र साधना के महान साधक बाबा कामराज अमर माने जाते हैं और वे हिमालय में कठोर साधना में लिप्त रहते हैं और यह भी मान्यता है कि वे रात्रि को रोजाना सूक्ष्म शरीर के माध्यम से काली की उपासना के लिए आते हैं और यहां पर काली मां की प्रतिमा अपने रूप नित्य बदलती रहती हैं और यह जीवंत प्रतिमा मानी जाती हैं, जो रात्रि काल में इस क्षेत्र में अपने दिव्य रूप में भ्रमण करती हैं।

दक्षिण आदि कालीपीठ नाम क्यों पड़ा
अधिकतर मंदिरों के नाम वहां स्थापित भगवान के विग्रह या फिर उस स्थल के या मंदिर के प्रवेश द्वार के जिस दिशा में होने पर रखे जाते है। लेकिन हरिद्वार में गंगा के तट पर स्थित आदि दक्षिण कालीपीठ के बारे में ऐसा नहीं है। यहां पर यह प्रथा बिल्कुल भिन्न है।

गंगा के नीलधारा चंडीघाट के इस पावन तट पर आदि दक्षिण काली पीठ मंदिर में मां काली का विग्रह और मां का पवित्र पावन मुख तो पूर्व दिशा की ओर है, लेकिन इस आदि कालीपीठ मंदिर का नाम दक्षिण काली मंदिर पीठ है। इसकी वजह यह है कि दक्षिण काली आदि पीठ मंदिर गंगा की पावन धारा के दक्षिण की ओर है। यानी यहां पर गंगा दक्षिणी वाहिनी है। इसी कारण इस मंदिर को आदि दक्षिण काली पीठ मंदिर के नाम से जाना जाता है।

बाबा कामराज ने इसी जगह पर आल्हा और उनकी पत्नी रानी मछला को यहां पर दीक्षा दी थी। यहां पर रानी मछला का महल खंडहर हालत में है? यहां गंगा में मछला कुंड भी बना हुआ है। कहते हैं इस कुंड में स्नान करने से मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह किंवदंती है कि मछला रानी का आधा शरीर मछली का और आधा शरीर मनुष्य का था। मछला कुंड में स्नान करने के बाद काली के भक्त मां के मंदिर में मत्था देखने आते हैं।

मान्यता है कि कार्तिक महीने के आखिर के पांच दिनों में कार्तिक पूर्णिमा से पहले दक्षिण काली आदि पीठ में गंगा के तट पर ब्रह्म मुहूर्त में तारों की छांव में गंगा स्नान करने और मां काली के दर्शन करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है और मां की कृपा सदैव बनी रहती है। आदि दक्षिण कालीपीठ मंदिर के परमाध्यक्ष और तंत्र साधना के प्रमुख उपासक पंच अग्नि अखाड़े के महामंडलेश्वर कैलाशानंद ब्रह्मचारी का कहना है कि आदि दक्षिण कालीपीठ की स्थापना शिव के अवतार बाबा कामराज ने की थी और यह मंदिर सतयुगी मंदिर है।

इसी मंदिर से कोलकाता के काली मठ में अखंड ज्योति ले जाई गई थी। जहां पर काली के घोर उपासक रामकृष्ण परमहंस ने कठोर साधना की थी और मां काली के दिव्य दर्शन करते हुए महासमाधि ली थी, जो स्वामी विवेकानंद के गुरु थे। ऋषिकेश भ्रमण के दौरान स्वामी विवेकानंद ने भी इस दक्षिण आदि कालीपीठ के दर्शन किए थे। यह पीठ काली के भक्तों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र है।

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