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27 साल जेल में रहकर भी नहीं हारा पेरारिवलन, मुरीद हुए कैदी, बाहर भी लोग ले रहे प्रेरणा

पुनकुझली चेन्नई के मशहूर लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। मृत्युदंड के खिलाफ आंदोलन छेड़ने वाले प्रमुख कार्यकर्ता हैं। इन्होंने पेरारिवलन की मां अरपुथम की आत्मकथा (तमिल में) लिखी है।

पुनकुझली चेन्नई के मशहूर लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। मृत्युदंड के खिलाफ आंदोलन छेड़ने वाले प्रमुख कार्यकर्ता हैं। इन्होंने पेरारिवलन की मां अरपुथम की आत्मकथा (तमिल में) लिखी है।

(पुनकुझली, मशहूर लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता)

पेरारिवलन अब 46 साल के हो चुके हैं। अपनी जिंदगी के 27 अहम साल उसने जेल में काटे हैं। इनमें से 23 साल फांसी की आशंका में एक-एक दिन गुजारे हैं। उसकी फांसी की तारीख भी कई बार तय हुई और हर बार टलती रही। पुलिस कस्टडी में भी उसने शारीरिक और मानसिक यातनाएं झेली हैं, बावजूद इसके उसके चेहरे पर से मुस्कान कभी खोई नहीं। इंसानी जिंदगी में 27 साल एक बड़ा लम्हा होता है। पेरारिवलन की बहन की शादी उसकी गिरफ्तारी के अगले ही साल हो गई थी। उसके बच्चे अब सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल्स के तौर पर काम कर रहे हैं। ये सभी उस बीते लम्हे की जीती-जागती कहानी और प्रमाण हैं लेकिन अरवु इससे वंचित रह गए। इतनी लंबी कैद किसी भी इंसान को खोखला कर सकती है लेकिन अरवु आज भी खुद को निर्भीक, परिपक्व और हंसमुख बनाए रखा है। वह जोलारपेट कस्बे में एक मध्यमवर्गीय स्कूल शिक्षक परिवार में जन्मा और पला-बढ़ा लेकिन उसकी गिरफ्तारी ने उसे और उसके परिवार को गहरा सदमा पहुंचाया है। हालांकि, वह अभी भी नहीं टूटा है और न ही अपने परिवार को बिखरने दिया है। वह अभी भी इंसाफ के लिए दृढतापूर्वक हल्की मुस्कान के साथ लड़ रहा है।

वह अपने वकील के साथ मिलकर खुद अपने केस को ड्राफ्ट करता है। वह जेल में बंद रहकर भी मुलाकातियों से देश-दुनिया की खबरों, खेल, राजनीति, विज्ञान और चिकित्सा जगत के बारे में जानकारी लेता रहता है। उसने जेल में बंद रहते हुए 12वीं बोर्ड का इम्तिहान दिया था और 91.33 फीसदी अंक हासिल कर जेल में बंद होकर परीक्षा देने वाले सभी कैदियों में टॉप किया था। उसने तमिलनाडु ओपेन यूनिवर्सिटी से एक डिप्लोमा कोर्स में गोल्ड मेडल भी हासिल किया। वह अभी भी कम्प्यूटर अप्लिकेशन्स में मास्टर डिग्री कम्प्लीट कर रहा है। वह जेल में कैदियों को विभिन्न परीक्षाओं की तैयारी करने में सहयोग करता है और उन्हें ट्यूशन पढ़ाता है। वह साथी कैदियों के साथ म्यूजिक बैंड भी चलाता है।

वह अपने स्वभाव से सभी का चहेता बन चुका है। पुलिस कॉन्स्टेबल से लेकर पुलिस के आला अधिकारी तक उसके स्वभाव के मुरीद बन गए हैं। पेरारिवलन से प्रभावित होकर एक पूर्व कैदी ने पोनप्पन आज कांचीपुरम में एक एजुकेशनल ट्रस्ट चलाते हैं, जहां गरीब, बेसहारा बच्चों को शिक्षा दी जाती है। इस ट्रस्ट का नाम पोनप्पन ने उसी के नाम पर पेरारिवलन एजुकेशनल ट्रस्ट रखा है। वहां पूरे राज्य से बड़ी संख्या में आकर बच्चे पढ़ते हैं। हालांकि, इतनी लंबी कैद से उसे उच्च रक्तचाप और उससे जुड़ी अन्य बीमारी भी हो गई है।

राजीव गांधी हत्याकांड के आरोपी पेरारिवलन की मां अरपुथम। (एक्सप्रेस फोटो- प्रशांत नाडकर)

आज बड़ी संख्या में लोग उसकी रिहाई के लिए आंदोलन कर रहे हैं। राजीव गांधी हत्याकांड के एक आरोपी से लेकर घर-घर तक पुकारे जाने वाले अरिवु की संघर्षपूर्ण यात्रा अकेली नहीं रही है। वह रातोंरात लोगों का पसंदीदा नहीं बन गया, उसके साथ हर मोड़ पर एक महिला खड़ी रही हैं, जिन्हें तमिलनाडु के लोग अरिवम्मा (अरिवु की मां) कहकर पुकारते हैं। अरिवु का मां अरपुथम उम्र के 71वें पड़ाव पर हैं। इन 27 सालों में उन्होंने बेटे पेरारिवलन की रिहाई के अलावा कुछ नहीं सोचा। अब उनकी आंखें कमजोर पड़ गई हैं। इतने लंबे संघर्ष का असर उनके शारीरिक और मानसिक दशा पर साफ झलकता है। जब तक उनके बेटे की गिरफ्तारी नहीं हुई थी, तब तक वह अपने परिवार के लिए समर्पित थी लेकिन उसके बाद वो सिर्फ बेटे के लिए संघर्ष करती रहीं। उसे इन 27 सालों में हर तरह का सपोर्ट देते रहीं।

इन 27 सालों में उन्होंने एक भी हफ्ते जेल जाकर बेटे से मुलाकात करना नहीं छोड़ा, भले ही वो खुद बीमार क्यों न रही हों। यहां तक कि भयंकर चक्रवात के दिन भी वो अपने बेटे से मिलने जेल पहुंची थीं। वह जेल की खिड़की के सहारे बेटे को कई बार यह बताती रहीं कि मीडिया नहीं समझ रहा है लेकिन कई बार वह यह भी बताती रहीं कि अब दुनिया अरिवु की ओर देख रही है और उसे समझ भी रही है।

(पुनकुझली चेन्नई के मशहूर लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। मृत्युदंड के खिलाफ आंदोलन छेड़ने वाले प्रमुख कार्यकर्ता हैं। इन्होंने पेरारिवलन की मां अरपुथम की आत्मकथा (तमिल में) लिखी है। यह लेख इंडियन एक्सप्रेस में उनके लिखे आर्टिकल का हिन्दी अनुवाद है।)

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