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लोगों की चिंता या सियासत

जम्मू और कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला और भारत के प्रधानमंत्री नेहरू के बीच सन 1952 में ‘दिल्ली एग्रीमेंट’ हुआ था। इस समझौते में भारत की नागरिकता को जम्मू और कश्मीर के निवासियों के लिए भी खोल दिया गया था।

Author February 26, 2019 3:47 AM
भारतीय संविधान की धारा 370 जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा प्रदान करती है।

राजनीतिक मुद्दा बन चुके धारा 370 और अनुच्छेद 35 ए को लेकर इन दिनों राजनीति न सिर्फ जम्मू एवं कश्मीर राज्य में, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी उबल रही है। अनुच्छेद 35 ए को खत्म करने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली गई थी, जिसपर सुनवाई की प्रक्रिया जारी है। राजनीति के मैदान में संविधान की इन व्यवस्थाओं की अलग-अलग तरीके से तमाम व्याख्याएं सामने आ रही हैं। ये प्रावधान कई अनसुलझे मुद्दों से सीधे जुड़े हुए हैं। मसलन, जम्मू-कश्मीर राज्य के शासन और नागरिकता के अलग तरह के प्रावधान से लेकर पाकिस्तान के द्वारा आत्मनिर्णय के अधिकार की रट तक।

संविधान में क्या है व्यवस्था
भारतीय संविधान की धारा 370 जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा प्रदान करती है। भारतीय संविधान में अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष उपबंध संबंधी भाग 21 का अनुच्छेद 370 तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के विशेष हस्तक्षेप से तैयार किया गया था। 1947 में जम्मू-कश्मीर के राजा हरिसिंह स्वतंत्र रहना चाहते थे। पाकिस्तान समर्थित कबीलाई गिरोहों के आक्रमण के समय उन्होंने भारत में विलय के लिए सहमति दी। आपातकालीन स्थिति के मद्देनजर कश्मीर का भारत में विलय करने की संवैधानिक प्रक्रिया पूरी करने का समय नहीं था। इसलिए संघीय संविधान सभा में गोपालस्वामी आयंगर ने धारा 306-ए का प्रारूप पेश किया। यही बाद में धारा 370 बनी। 26 जनवरी 1957 को राज्य में विशेष संविधान लागू कर दिया गया। धारा 370 के प्रावधानों के मुताबिक संसद को जम्मू-कश्मीर के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार है। किसी अन्य विषय से संबंधित कानून को लागू करवाने के लिए केंद्र को राज्य सरकार की सहमति लेनी पड़ती है। विशेष दर्जे के कारण जम्मू-कश्मीर राज्य पर संविधान की धारा 356 लागू नहीं होती। राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बर्खास्त करने का अधिकार नहीं है।

क्या है ‘दिल्ली एग्रीमेंट’
जम्मू और कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला और भारत के प्रधानमंत्री नेहरू के बीच सन 1952 में ‘दिल्ली एग्रीमेंट’ हुआ था। इस समझौते में भारत की नागरिकता को जम्मू और कश्मीर के निवासियों के लिए भी खोल दिया गया था। दिल्ली एग्रीमेंट के बाद ही 1954 का विवादित कानून अनुच्छेद 35 ए बनाया गया था। इससे कश्मीर विधानमंडल को यह अधिकार मिला कि वह यह तय करे कि जम्मू और कश्मीर का स्थायी निवासी कौन है।

जमीनी हकीकत
1947 में हुए बंटवारे के दौरान लाखों लोग पाकिस्तान से शरणार्थी बनकर भारत आए थे। दिल्ली, मुंबई, सूरत या जहां कहीं भी ये लोग बसे, आज वहां के स्थायी निवासी कहलाने लगे हैं। लेकिन जम्मू-कश्मीर में स्थिति ऐसी नहीं है। यहां आज भी कई दशक पहले बसे लोगों की चौथी-पांचवी पीढ़ी शरणार्थी ही कहलाती है और तमाम मौलिक अधिकारों से वंचित है। 1947 में 5764 परिवार पश्चिमी पकिस्तान से आकर जम्मू में बसे थे। इन हिंदू परिवारों में लगभग 80 फीसद दलित थे। इन लोगों को न तो यहां होने वाले चुनावों में वोट डालने का अधिकार है, न सरकारी नौकरी पाने का और न ही सरकारी कॉलेजों में दाखिले का। 1957 में वाल्मीकि समुदाय के करीब 200 परिवारों को पंजाब से जम्मू कश्मीर बुलाया गया था। कैबिनेट के एक फैसले के अनुसार इन्हें विशेष तौर से सफाई कर्मचारी के तौर पर नियुक्त करने के लिए यहां लाया गया था। 60 साल से ये लोग यहां सफाई का काम कर रहे हैं, लेकिन इन्हें जम्मू-कश्मीर का स्थायी निवासी नहीं माना जाता।

और किन जगहों पर विशेष दर्जा
अकेले जम्मू-कश्मीर को ही विशेष राज्य का दर्जा नहीं मिला है। अनुच्छेद 371 के तहत कई राज्यों को विशेष अधिकार दिए गए हैं। असम, मणिपुर, मिजोरम, सिक्किम और गोवा को विशेष अधिकार मिले हैं। नागालैंड में सिविल और आपराधिक मामले में नागा कानून लागू है। वहीं सिक्किम के प्राकृतिक संसाधनों पर केंद्र का हक नहीं है।

विशेषाधिकार
’जम्मू-कश्मीर का झंडा अलग होता है। नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता होती है। वहां भारत के राष्ट्रध्वज या राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान अपराध नहीं है। यहां भारत की सर्वोच्च अदालत के आदेश मान्य नहीं होते।
’ जम्मू-कश्मीर की कोई महिला यदि भारत के किसी अन्य राज्य के व्यक्ति से शादी कर ले तो उस महिला की जम्मू-कश्मीर की नागरिकता खत्म हो जाएगी। कोई कश्मीरी महिला पाकिस्तान के किसी व्यक्ति से शादी करती है, तो उसके पति को भी जम्मू-कश्मीर की नागरिकता मिल जाती है। महिलाओं पर शरियत कानून लागू है।
’ भारत की संसद जम्मू-कश्मीर के संबंध में बहुत ही सीमित दायरे में कानून बना सकती है। जम्मू-कश्मीर में पंचायत के पास कोई अधिकार नहीं है।
– जम्मू-कश्मीर में सूचना का अधिकार (आरटीआइ) लागू नहीं होता। शिक्षा का अधिकार (आरटीई) लागू नहीं होता। यहां सीएजी भी लागू नहीं है।

अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दिया गया। जम्मू-कश्मीर का भारत में पूरी तरह से कभी विलय नहीं हुआ और यह अर्द्ध-संप्रभु स्टेट है। चूंकि जम्मू-कश्मीर भारत में इसी शर्त पर आया था इसलिए इसे मौलिक अधिकार और संविधान की बुनियादी संरचना का हवाला देकर चुनौती नहीं दी जा सकती है। यह भारत के संविधान का हिस्सा है कि जम्मू-कश्मीर में भारत की सीमित पहुंच होगी।
– प्रशांत भूषण, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील

धारा 370 एक अस्थायी व्यवस्था थी। लेकिन इसे अक्सर जनमत संग्रह के प्रावधान से जोड़ा जाता है। यह गलत है। दरअसल13 अगस्त 1948 के संयुक्त राष्ट्र के संकल्प के आधार पर पाकिस्तान को पहले अपनी सेना पीछे हटानी थी। पूरा कश्मीर भारत को सौंपना था। फिर जब स्थितियां सामान्य हो जातीं, तब संयुक्त राष्ट्र की देखरेख में पूर पीओके सहित जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह होता। लेकिन पाकिस्तान ने इन शर्तों को नहीं माना। ऐसे में आज की स्थिति में जनमत संग्रह का सवाल ही नहीं उठता।
-मेजर जनरल (रिटायर) शेरू थपालियाल, रक्षा विशेषज्ञ

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