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जनसत्ता विशेष: विषाणु से पार पाना है तो जीवन शैली बदलनी होगी

कोरोना संक्रमण दरअसल कथित आधुनिक सभ्यता में झटपट विकास और तुरंत मुनाफे के लालच में अपनाई जा रही दोषपूर्ण जीवन शैली का रोग है। यह रोग प्रकृति के खिलाफ महज तात्कालिक सुविधा और बढ़ती मांसाहार की प्रकृति का भी प्रतीक है। यह एक चेतावनी भी है कि पशुओं और पक्षियों को महज खाद्य समझने का परिणाम यह भी हो सकता है जिसमें आदमी क्या सभ्यताएं नष्ट हो सकती हैं।

Author Published on: April 1, 2020 2:30 AM
इस वक्त संक्रमण को फैलने से रोकना बड़ी चुनौती है। उसमें तेजी से जांच और उपचार उपलब्ध कराना प्राथमिकता है।

डॉ एके अरुण
अब तक 200 से भी ज्यादा देशों में फैले कोरोना वायरस संक्रमण को लेकर भारत में चिंता इसलिए अधिक है कि हमारे यहां आबादी घनत्व (455 व्यक्ति प्रति किलोमीटर), चीन के मुकाबले 3 गुना और अमेरिका के मुकाबले (36 व्यक्ति प्रति किलोमीटर) 13 गुना है। इस विषाणु से पीड़ित व्यक्ति महज कुछ फुट की दूरी पर खड़े 2 से 3 व्यक्ति को प्रभावित करता है। इसके अलावा भारत में लोग आदतन भी ऐसी संक्रामक बीमारियों में भी एहतियात नहीं बरतते। इसका एक दूसरा पहलू है कि इस विषाणु ने दुनिया भर के बाजारों की पल्स रेट को काफी नीचे ला दिया है। अथर्शास्त्रियों के अनुमान के अनुसार भारत से लेकर अमेरिका तक के शेयर बाजारों में ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई है।

हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि इस वायरस में मृत्यु दर (3.4 फीसद) अन्य विषाणुओं के मुकाबले कम है इसलिए संक्रमण के बाद लोगों के जीवित रहने की संभावना तुलनात्मक रूप से ज्यादा है। उल्लेखनीय है कि स्वाइन फ्लू (0.02 फीसद), इबोला (40.40 फीसद), मर्स (34.4 फीसद) तथा सार्स (9.6 फीसद) की मृत्यु दर से कोरोना वायरस की मृत्युदर काफी कम है।

कोरोना विषाणु संक्रमण (सीओवीआइडी-19) को दुनिया भर में आर्थिक विकास का सबसे बड़ा रोड़ा माना जा रहा है। आॅक्सफोर्ड इकोनोमिक्स ने आशंका जताई है कि यह संक्रमण वैश्विक महामारी का रूप ले चुका है और यह वैश्विक विकास दर का 1.3 फीसद कम कर सकती है। डन एण्ड ब्रैडस्ट्रीट ने कहा है कि चीन से शुरू कोरोना वायरस के संक्रमण का असर जून महीने तक बने रहने की संभावना है और इससे वैश्विक आर्थिक वृद्धि दर एक फीसद नीचे आ सकती है। चीन में स्थित दुनिया की 2.2 करोड़ कंपनियां 50 से 70 फीसद के घाटे में हैं।

चीन के कोरोना संक्रमण का भारत के दवा बाजार पर गंभीर असर की आशंका यहां के फार्मा कंपनियों के सीइओ को सताने लगी है। वर्ष 2018-19 में भारत का एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रीडिएन्ट्स (एपीआइ) और बल्क ड्रग भारत आयात 25,552 करोड़ रुपए था जिसमें चीन का हिस्सा 68 फीसद था। अमेरिकी बाजार को ड्रग्स आपूर्ति करने वाली 12 फीसद मैन्युफैक्चरिंग साइट भारत में हैं और भारतीय कंपनियों का एपीआइ स्टाक अब समाप्त हो गया है।चीन के बुआन शहर में जहां से कोराना का संक्रमण फैला वहां की एक करोड़ से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय कंपनियों में शटडाउन चल रहा है।

कोरोना वायरस से वैश्विक अर्थव्यवस्था और चीन कैसे प्रभावित हं,ै इसे समझने के लिए 2003 को याद करें। सन् 2003 में एक घातक वायरस संक्रमण सार्स (सिवियर एक्यूट रेसीपरेट्री सिन्ड्रोम) की वजह से लगभग 8000 लोग संक्रमित थे और दुनिया भर में कोई 800 लोगों की मौत हो गई थी। उस वर्ष चीन की विकास दर 0.5 से 1 फीसद कम हो गई थी। वैश्विक अर्थव्यवस्था को 40 अरब डॉलर (2.8 लाख करोड़ रुपए) का नुकसान हुआ था। सार्स संक्रमण के समय चीन दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी और वैश्विक जीडीपी में उसका योगदान केवल 4.2 फीसद था। अब चीन विश्व की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था है और वैश्विक जीडीपी में उसका योगदान 16.3 फीसद है। जाहिर है कि चीन में बिगड़ी अर्थव्यवस्था वैश्विक स्तर पर असर डालेगी।

कोरोना संक्रमण दरअसल कथित आधुनिक सभ्यता में झटपट विकास और तुरंत मुनाफे के लालच में अपनाई जा रही दोषपूर्ण जीवन शैली का रोग है। यह रोग प्रकृति के खिलाफ महज तात्कालिक सुविधा और बढ़ती मांसाहार की प्रकृति का भी प्रतीक है। यह एक चेतावनी भी है कि पशुओं और पक्षियों को महज खाद्य समझने का परिणाम यह भी हो सकता है जिसमें आदमी क्या सभ्यताएं नष्ट हो सकती हैं।

याद कीजिये जब 1996 में पागल गाय रोग; मैड काऊ डिजीज फैला था तब ब्रिटेन में लाखों गायों को मार कर जला दिया गया था। लेकिन लोगों ने अपनी प्रव्रति नहीं बदली। वे गायों को जीव की बजाय एक मांस उत्पाद समझकर आज भी वैसे ही इस्तेमाल कर रहे हैं जैसे कभी कुछ हुआ ही नहीं हो। इस फ्लू ने आध्ुनिकता के पैरोकारों को अभी भी प्रभावित नहीं किया है। महज कुछ ही दिनों में कई बार अपनी जेनेटिक संरचना बदल लेने वाले ये वायरस बार-बार यही संदेश दे रहे हैं कि यदि मनुष्य ने प्रकृति विरोधी गतिविधियां बंद नहीं कि तो इसके परिणाम गम्भीर हो सकते हो सकते हैं।

रोगों के और खतरनाक होकर बार-बार लौटने तथा जीवाणुओं-विषाणुओं की संरचना जटिल होने का नतीजा है कि चिकित्सा विज्ञान की सांसें फूल रही हैं। सभी कारगर दवाएं बेअसर हो रही हैं। दवाओं के महंगा और प्रभावित होने से लोग वैसे ही त्राहि त्राहि कर रहे हैं। क्या अब भी हम इन तथ्यों को नजरअंदाज करते रहेंगे। या जीवनशैली के मानवीय व प्राकृतिक पक्ष को अपनाने की पहल कहेंगे। यदि हां तो भविष्य में टिकाऊ जीवन की आशा की जा सकती है।

कोरोना वायरस के बहाने एक बात जो महत्त्वपूर्ण है वह यह कि एन्टीबायोटिक दवाओं के आविष्कार और विस्तार के बाद रोगाणुओं ने बढ़ना बंद नहीं किया। जैसे-जैसे चिकित्सा विज्ञान नये एन्टीबायोटिक्स बनाता गया और बैक्टीरिया और वायरस उसके विरुद्ध अपनी प्रतिरोध शक्ति भी बढ़ाते गए। जवाब में दवा कंपनियों ने भी नई दवाओं पर शोध में निवेश बढ़ा दिया। मामला मुनाफे से जुड़ा है तो इसके प्रचार-प्रचार में कोई कमी का सवाल ही नहीं। अब वायरस और दवा बनाने वाली कंपनियों में होड़ चल रही है।

अमेरिकी सूक्ष्म जीव विज्ञान अकादमी मान रही है कि विषाणु क्रमिक विकास की प्राकृतिक ताकत से लैस हैं और वे हमेशा बिना रुके बदलते-बढ़ते रहेंगे और दवाओं पर भारी पड़ेंगे? इसलिए इन वायरसों से निबटने का तरीका कुछ नया सोचना होगा। ये वायरस हौआ तो बन गए हैं।। विज्ञापनों में तो इन वायरस को विध्वंसक दुश्मन के रूप में दिखाया जाता है ताकि इन्हें मारने वाले महेंगे रसायन बेचे जा सकें। कोरोना वायरस के मामले में भी यही हो रहा है। आज वायरस के घातक असर से लोगों को बचाने के लिए नए चिंतन की जरूरत है। क्या हम वायरस, उसके प्रभाव, रोग और उपचार की विधि पर स्वस्थ चिंतन और चर्चा के लिए तैयार हैं?

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