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नौकरी गई तो बेटी के दूध के लिए नहीं थे पैसे, भेजना पड़ा मायके, पति भी थे बेरोजगार, जानें लॉकडाउन में बेबस हुए पांच परिवारों की दास्तां

दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिाय का कहना है कि अब वे शहर को फिर से पहले की तरह खोल रहे हैं, क्योंकि राजधानी में कोरोना के अलावा भुखमरी, मानसिक दबाव और बेरोजगारी जैसी समस्याएं भी हैं।

Edited By कीर्तिवर्धन मिश्र नई दिल्ली | Updated: November 19, 2020 9:14 AM
दिल्ली के मदनगिर में बाउंसर के तौर पर नौकरी करने वाली मेहरुनिसा की नौकरी भी लॉकडाउन के दौरान ही गई है। (फोटो- अमित मेहरा)

भारत में कोरोनावायरस महामारी के संकट के चलते मार्च में लगाए गए लॉकडाउन का असर अर्थव्यवस्था पर अभी तक देखा जा सकता है। आरबीआई की एक रिपोर्ट में तो यहां तक कहा गया था लगातार दो तिमाही में जीडीपी में निगेटिव ग्रोथ रेट की वजह से देश इतिहास में पहली बार तकनीकी तौर पर मंदी में पहुंच गया। लॉकडाउन की अवधि- मार्च से लेकर जून तक तो देश में लाखों लोगों ने अपनी नौकरियां भी गंवाई। इनमें हजारों की संख्या में महिलाएं भी रहीं, जिनमें से कई पर तो उनके पूरे परिवार निर्भर थे।

29 साल की रेशमा उन महिलाओं में शामिल रहीं, जिन पर लॉकडाउन ने बुरा असर डाला। लॉकडाउन के एक महीने बाद ही एक ऊर्जा नीति संस्थान में उनकी नौकरी चली गई। यहां उन्हें 24 हजार रुपए प्रतिमाह मिलते थे। रेशमा ही नहीं उनके पति भी पिछले एक साल से बेरोजगारी का सामना कर रहे थे। ऐसे में हालात यह हो गए कि उन्हें अपनी चार साल की बेटी को मायके भेजना पड़ गया। रेशमा के मुताबिक, अगर वे कुछ कमा नहीं रहीं, तो अपनी बेटी का ख्याल रखने लायक खर्च भी नहीं उठा सकतीं। यहां तक कि उसके लिए एक ग्लास दूध तक का इंतजाम नहीं कर सकतीं। रेशमा का कहना है कि सिर्फ एक मां ही यह दर्द समझ सकती है।

ऐसी ही दास्तां रही दिल्ली के संगम विहार में रहने वाली 40 साल की एक स्कूल टीचर की, जिन्हें प्रतिमाह 12 हजार रुपए मिलते थे। उन्होंने बताया कि अप्रैल में नौकरी जाने के बाद उनके पास 40 हजार रुपए का कर्ज अदा करने के लिए रह गया। इसके अलावा उन्होंने 11 लोगों से पैसे उधार भी लिए थे। इस स्कूल टीचर को पांच महीने बाद नौकरी तो मिली, पर एक बाउंसर के तौर पर, वह भी बेहद कम तनख्वाह पर। महिला का कहना है कि वह यह रोजगार पाकर भी शर्मशार हैं, क्योंकि उनके परिवार ने कभी ऐसी गरीबी नहीं देखी।

21 वर्षीय प्रिया, जो कि दक्षिण दिल्ली के मूलचंद में ब्यूटीशियन के तौर पर काम कर के हर महीने 10 हजार और उसके ऊपर टिप में पैसे कमा लेती थी की नौकरी भी लॉकडाउन के दौरान ही चली गई। यहां तक कि ड्राइक्लीनिंग स्टोर में काम करने वाले उसके पिता तक को नौकरी गंवानी पड़ी। प्रिया के मुताबिक, उनके पास कोई सेविंग्स नहीं थीं, था तो सिर्फ लोन। ऐसे में जब तक उन्हें कोई नौकरी नहीं मिलती, तब तक वे घर पर हर तरह से रहने के लिए मजबूर हैं। प्रिया का कहना है कि राशन में उन्हें सीएम केजरीवाल से छोले मिल रहे हैं और उनका पूरा परिवार यही खाकर काम चला रहा है।

दिल्ली की रहने वाली 24 साल की आरती कश्यप भी उन महिलाओं में शामिल रहीं, जिनकी इस साल लॉकडाउन की वजह से नौकरी चली गई। आठ भाई-बहनों और बीमार पिता की देखभाल करने वाली आरती दिल्ली के एक प्राइवेट इंस्टीट्यूट में काम कर के 25 हजार रुपए महीना तक कमा लेती थीं, लेकिन इससे घर के खर्चे तक नहीं निकल पाते थे, ऐसे में उनकी मां भी जंगपुरा में घरों में काम कर 8 हजार रुपए तक कमा लेती थीं। अप्रैल में दोनों की नौकरी जाने के बाद उनके परिवार को एक पुराना टीवी और अलमारी तक बेचने की नौबत आ गई। यहां तक कि उन्हें एक रिश्तेदार से 50 हजार रुपए और एक स्थानीय कर्जदाता से 30 हजार रुपए कर्ज लेना पड़ा।

राजधानी से सटे नोएडा में भी महिलाओं पर लॉकडाउन का बुरा असर पड़ा। यहां 15 साल का पढ़ाने का अनुभव रखने वाली हेमलता को अप्रैल में ही स्कूल से निकाल दिया गया था। इसके बाद उन्होंने अब तक घर चलाने के लिए 30-40 हजार रुपए उधार ले लिए हैं, जिन्हें अगली नौकरी मिलने के बाद ही चुकाया जा सकता है। हेमलता के मुताबिक, उन्होंने अपने जीवन में कभी ऐसा आर्थिक संकट नहीं देखा। वे अपने घर का किराया तक नहीं दे पाए और न ही बेटी की स्कूल फीस जमा करने में सक्षम रहे। उन्हें अपने बच्चों का ट्यूशन भी छुड़वाना पड़ा।

दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों में अब एक बार फिर कोरोना के केस तेजी से बढ़ रहे हैं। फिलहाल तो सीएम केजरीवाल और केंद्र सरकार की तरफ से लॉकडाउन की कोई घोषणा नहीं हुई है, पर चर्चाओं का बाजार गर्म रहने की वजह से हजारों लोगों की नौकरी पर एक बार फिर खतरा मंडराता दिख रहा है। द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत के दौरान दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा कि लॉकडाउन के नतीजे अब दिखने शुरू हो रहे हैं। हमारी मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी और मुफ्त यात्राओं की स्कीम से महिलाओं को कुछ फायदा हुआ है। अब उनकी समस्याओं से निपटने के लिए दिल्ली सरकार शहर को फिर से पहले की तरह खोल रहे हैं, क्योंकि राजधानी में कोरोना के अलावा भुखमरी, मानसिक दबाव और बेरोजगारी जैसी समस्याएं भी हैं।

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