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कोरोना की दहशत: सेवा करने से भी लोग डरे, मांगने पर नहीं दे रहें पानी

पूर्णबंदी के बाद सबसे अधिक परेशानी उन लोगों को उठानी पड़ रही है, जो आपदा के वक्त भी काम कर रहे हैं। खासकर उन लोगों को, जो घरों तक विभिन्न प्रकार के जरूरत के सामानों को पहुंचाने का काम करते हैं। पहले राजधानी में जगह-जगह पर प्याऊ होते थे, लेकिन पूर्णबंदी के बाद से प्याऊ […]

सार्वजनिक रूप से पानी देने से लोग बच रहे हैं। जहां सप्लाई का पानी आ रहा है, वहां एक साथ लेने को भीड़ लग रही है।

पूर्णबंदी के बाद सबसे अधिक परेशानी उन लोगों को उठानी पड़ रही है, जो आपदा के वक्त भी काम कर रहे हैं। खासकर उन लोगों को, जो घरों तक विभिन्न प्रकार के जरूरत के सामानों को पहुंचाने का काम करते हैं। पहले राजधानी में जगह-जगह पर प्याऊ होते थे, लेकिन पूर्णबंदी के बाद से प्याऊ की व्यवस्था कहीं नहीं है। पॉश इलाकों में तो पहले लोग मटके में पानी भरकर रखते थे।

सामान पहुंचाने का काम करने वाले धमेंद्र कुमार ने बताया कि पूर्णबंदी से पहले जब किसी के घर सामान लेकर जाते थे तो अकसर लोग कड़ी धूप में पानी पीने के लिए देते थे, लेकिन जब दरवाजा भी नहीं खोलते और अंदर से ही कहते हैं कि वहीं बार धूप में सामान रख दो। कई बार मन करता है कि पीने के लिए पानी मांग लें, पर जिस प्रकार का व्यवहार लोग अपनाते हैं। उससे तो यही लगता है कि आपदा के वक्त लोग मानवीय मूल्यों को भूल गए हैं।

सफाई कर्मचारी मोहन कहते हैं कि गर्मी के दिनों में राजधानी के कई इलाकों में शरबत पीलाया जाता था। पर कोरोना माहामारी की वजह से लोग शरबत बांटना तो दूर पीने के लिए पानी तक नहीं पूछते। सोसायटी में रहने वाले लोग भी सामाजिक दूरी के नाम पर दिक्कतों की अनदेखी करते हैं।

कार्यालय के बाहर का काम करने वाले सोहन सिंह का कहना है कि पहले दुकानें खुली रहती थी तो खरीद कर भी पानी पी लेता था। अब ऐसी व्यवस्था नहीं होने से लू लगने का भी डर बना रहता है।

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