पेगासस केसः तीन मोर्चों पर SC से केंद्र को झटका, राम जेठमलानी और मोदी सरकार के बीच का यह केस दिखा रहा ‘राह’

अपूर्वा विश्वनाथ की रिपोर्ट। याचिकाकर्ताओं के लगाए आरोपों पर विस्तृत प्रतिक्रिया दर्ज करने से सरकार के इन्कार पर कोर्ट ने काला धन राम जेठमलानी बनाम भारत संघ के मामले पर साल 2011 के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते कहा, “जब नागरिकों के मौलिक अधिकार के खतरे में हों, तब सरकार को प्रतिकूल स्थिति नहीं लेनी चाहिए।”

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नई दिल्ली में पेगासस जासूसी कांड के मुद्दे पर तख्ती लेकर प्रदर्शन करते हुए कांग्रेस की छात्र इकाई का सदस्य। (एक्सप्रेस आर्काइव फोटोः अभिनव साहा)

अपूर्वा विश्वनाथ की रिपोर्ट।

पेगासस जासूसी केस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र की एनडीए सरकार को सुप्रीम कोर्ट से तीन मोर्चों (नागरिकों के निजता के अधिकार, प्रेस एवं अभिव्यक्ति की आजादी और राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा) पर झटका लगा है। बुधवार (27 अक्टूबर, 2021) को अदालत ने इजराइली स्पाईवेयर ‘पेगासस’ के जरिए भारत में कुछ लोगों की कथित तौर पर जासूसी के मामले की जांच के लिए एक्सपर्ट्स की तीन सदस्यीय समिति का गठन कर दिया।

कोर्ट इसके साथ ही बोला, “सरकार हर बार राष्ट्रीय सुरक्षा की दुहाई देकर बच नहीं सकती। उसके द्वारा उसकी दुहाई देने मात्र से कोर्ट ‘‘मूक दर्शक’’ बना नहीं रह सकता और इसे ‘हौवा’ नहीं बनाया जा सकता, जिसका जिक्र होने मात्र से कोर्ट खुद को केस से दूर कर ले।” बेंच ने बताया कि उसका हस्तक्षेप “राजनीतिक बयानबाजी में लिए जाने के बगैर” संवैधानिक आकांक्षाओं और कानून के शासन को बनाए रखने के लिए है।

रोचक बात है कि इस मामले में जाने-माने वकील राम जेठमलानी और मोदी सरकार के बीच का यह केस ‘राह’ दिखाता नजर आया। दरअसल, याचिकाकर्ताओं के लगाए आरोपों पर विस्तृत प्रतिक्रिया दर्ज करने से सरकार के इन्कार पर कोर्ट ने काला धन राम जेठमलानी बनाम भारत संघ के मामले पर साल 2011 के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते कहा, “जब नागरिकों के मौलिक अधिकार के खतरे में हों, तब सरकार को प्रतिकूल स्थिति नहीं लेनी चाहिए।”

कोर्ट ने आगे कहा, “याचिकाकर्ताओं और राज्य से सूचना का यह मुक्त प्रवाह, अदालत के समक्ष एक रिट कार्यवाही में, सरकारी पारदर्शिता और खुलेपन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो हमारे संविधान के तहत मनाए गए मूल्य हैं।”

केंद्र ने स्पाइवेयर खरीदा था या नहीं? इस मसले पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने एक विस्तृत हलफनामा दायर करने या यह जवाब देने से मना कर दिया था। टॉप कोर्ट ने इस बाबत मेहता के दिए राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक तर्क को स्वीकार करने से भी इन्कार कर दिया। वास्तव में कोर्ट ने केंद्र को जवाबदेह ठहराने हुए टोका और कहा कि अब सरकार को अपना पक्ष रखना होगा।

अदालत के मुताबिक, “जब संवैधानिक विचार (राज्य की सुरक्षा से संबंधित, या जब एक विशिष्ट क़ानून के तहत एक विशिष्ट प्रतिरक्षा) मौजूद हों तब बेशक प्रतिवादी केंद्र जानकारी देने से मना कर सकता है। हालांकि, यह राज्य पर निर्भर है कि वह न केवल विशेष रूप से इस तरह की संवैधानिक चिंता या वैधानिक प्रतिरक्षा की दलील दे, बल्कि उन्हें हलफनामे पर अदालत में इसे साबित और उचित भी ठहराए।”

यही नहीं, कोर्ट ने अपनी जांच बिठाने से जुड़ी सरकार की याचिका को भी खारिज कर दिया। कहा, “इस तरह की कार्रवाई पूर्वाग्रह के खिलाफ स्थापित न्यायिक सिद्धांत का उल्लंघन करेगी यानी, ‘न्याय न केवल किया जाना चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए’।”

निजता के अधिकार का हवाला देते हुए कोर्ट बोला कि “निजता पत्रकारों या सामाजिक कार्यकर्ताओं की एकमात्र चिंता नहीं है।” आगे कहा, “कानून के शासन द्वारा शासित एक लोकतांत्रिक देश में, संविधान के तहत कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया का पालन करके, पर्याप्त वैधानिक सुरक्षा उपायों के अलावा व्यक्तियों पर अंधाधुंध जासूसी की अनुमति नहीं दी जा सकती है।”

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