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होली: फूलों से रंगों तक महीने भर की उमंग

भवानी प्रसाद मिश्र की लंबी कविता सतपुड़ा के घने जंगल की कुछ पंक्तियों में होली की खुमारी दिखती है - जबकि होली पास आती/सरसराती घास गाती/और महुए से लपकती/मत्त करती बास आती...। यानी कि पूरी प्रकृति होली के रंग में रंग जाती है। प्रकृति और फूलों से शुरू हुई होली रंग और गुलाल तक पहुंची और अब तो फेसबुक से लेकर ट्वीटर तक पर होली अपने ढंग से ट्रेंड कर रही है। पेश है जनसत्ता टीम की जुटाई यह रिपोर्ट जिसमें कोशिश की गई है कि शास्त्रों से लेकर मुगलकाल तक, देश ले लेकर विदेश तक की होली की चर्चा हो।

Author March 24, 2016 4:25 AM
होली खेलती महिलाएं

मौसम व प्रकृति की बदलती रंगत
जब पेड़ों की शाखों पर बौर खिलने लगे, सर्द मौसम के बाद हवा का रुख मध्यम हो जाए और गर्म आहट हो तो फाल्गुन मास आता है। पौधों पर फूल खिलते हैं। प्र्रकृति रंगबिरंगे परिधान पहनती है। धरती पर हरियल चादर बिछ जाती है। सुबह मादक होने लगती है तो प्रकृति की सभी ऋतुओं में सबसे ज्यादा धनी और प्रिय बसंत ऋतु का आगमन होता है और उसके साथ ही होली का त्योहार शुरू हो जाता है। प्रकृति के रंग ओढ़ते ही रंग और उल्लास का पर्व होली मनाया जाता है।
खेती व किसान से संबंध
किसानों की फसलें पूरी तरह पक कर खड़ी होती हैं। उन्हें उम्मीद होती है कि अब फसल कटने के बाद साल भर के लिए अनाज और खाद्यान्न उत्पन्न होगा तो हर ओर एक खुशी का वातावरण रहता है। किसानों की पत्नियां फसल अच्छी होने की उम्मीद में किसानों के सामने अपनी मांगें रखती हैं और सजने संवरने के लिए सामान लाने की मांग करती हैं। वे सज संवर कर खुशी के गीत गाती हैं। चारों ओर खुशहाली रहती है। ऐसे में इस पर्व को वसंतोत्सव और कामोत्सव भी कहते हैं।
शास्त्रों में होली
होली का वर्णन जैमिनी के पूर्वमीमांसा सूत्र और कथक ग्रह्य सूत्र में भी है। सबसे लोकप्रिय कथा हिरण्यकश्यप से जुड़ी है। हिरण्यकश्यप राक्षस था। भगवान विष्णु ने उसके भाई को मार दिया था। बदला लेने के लिए हिरण्यकश्यप ने कई सालों तक घोर तप किया और वरदान प्राप्त कर शक्ति हासिल कर ली। ताकत के मद में उसे लगने लगा कि वह ही भगवान है। उसका पुत्र प्रहलाद भगवान विष्णु की पूजा करता था। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका था। उसे वरदान प्राप्त था कि वह आग में जल नहीं सकती थी। हिरण्यकश्यप ने होलिका से कहा कि वह उसके पुत्र को लेकर आग में बैठ जाए। पर जैसे ही वह प्रह्वााद को गोद में लेकर आग में बैठी, वह जल गई और प्रह्वााद बच गया। ऐसे में होलिका की यह हार बुराई के नष्ट होने का प्रतीक बन गई। यह फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है।
मुगलकाल में होली
अकबर का जोधाबाई के साथ और जहांगीर का नूरजहां के साथ होली खेलने का वर्णन मिलता है। अलवर संग्रहालय के एक चित्र में जहांगीर को होली खेलते हुए दिखाया गया है। शाहजहां के समय तक होली का मुगलिया अंदाज ही बदल गया था। शाहजहां के जमाने में होली कोईद-ए-गुलाबी या आब-ए-पाशी (रंगों की बौछार) कहा जाता था। अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के बारे में प्रसिद्ध है कि होली पर उनके मंत्री उन्हें रंग लगाने जाया करते थे।
सवा मास बृज हुड़दंग मच गयौ
बृज में बसंत पंचमी के दिन से ही चारों ओर होली के आगमन की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। इस दिन हर चौराहे पर डांढा गढ़ जाता है। लड्डू होली का आयोजन किया जाता है। इसमें बरसाना गांव में नंदगांव के कान्हा स्वरूप हुरियारे होरी खेलने आते हैं। इस दिन लोग एक दूसरे को जमकर लड्डू बांटते हैं और लुटाते हैं। मान्यता है कि कृष्ण के आगमन के साथ ही सखाओं ने खूब लड्डू बांटे थे। इसके अगले दिन बरसाना के राधारानी मंदिर में विश्व प्रसिद्ध लट्ठमार होली मनाई जाती है। बरसाना आए कृष्ण स्वरूप हुरियारों को लहंगा और ओढ़नी में सजी हुरियारिनें जी भरकर लाठियां भांजती हैं। नंदगांव के हुरियारे फाग गा गाकर गोपी स्वरूपा हुरियारिनों को खूब छकाते हैं और उकसाते हैं। मथुरा के श्री कृष्ण जन्मस्थान में मनाई जाने वाली होली की अपनी अलग ही पहचान है। मथुरा के द्वारिकाधीश मंदिर में भी होली की उमंग अपने चरम पर रहती है। रंग खेलनी होली यानि धुलेंड़ी के दिन मथुरा से लगभग 22 किलोमीटर दूर बल्देव गांव के दाऊजी मंदिर में हुरंगा का आयोजन किया जाता है। इस दिन कृष्ण के बड़े भाई बल्देव का डोला निकाला जाता है। हुरंगा में गांव की महिलाएं गांव के ही पुरुषों पर पोतना (फटे कपड़ों का अंटा लगाकर बनाया गया) फटकारती हैं और हुरियारे अपना बचाव करते हुए गीत गाते हैं। बृज के लगभग सभी जगहों पर होली हो जाने के बाद सबसे अंत में बठैन के गिडोह में हुरंगा का आयोजन किया जाता है। बठैन का हुरंगा बृज में ही नहींं बल्कि देश-विदेश में भी काफी लोकप्रिय है। इस दिन गांव की हुरियारिनै सज धज कर फाग गाती हुई निकलती हैं। वे गलियों में डंडा फटकारती हुई एक खुले परिसर में जमा होती हैं। उसके बाद गांव और आनगांव के हुरियारे आते हैं और साबौनी लेकर जाने के लिए हुरियारिनों के डंडे खाते हैं। होली से पहले पड़ने वाली एकादशी को पूरे वृंदावन में हाथी की सवारी निकाली जाती है।
सतरंगी होली
पूरी प्रकृति से लेकर भौतिक समारोहों तक प्रकृति के सात रंगों का विशेष महत्त्व है। इनमें लाल, हरा, पीला, नीला, गुलाबी, नारंगी, बैंगनी आदि शामिल हैं। इन सभी रंगों का अलग-अलग महत्त्व है। इन रंगों को खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक भी माना जाता है तो हरियाली, प्रेम, मादकता, अहसास, भावनाओं और समर्पण के लिए भी जाना जाता है। बृज में प्रेम का एक ही रंग माना जाता है और वह है श्याम रंग। बृज में श्याम रंग की बिंदी, काजल, लहंगा और श्याम की कारी कांवर का बड़ा महत्त्व है। श्याम का रंग की सर्वोत्तम रंग माना जाता है। श्याम रंग में डूबा यानि सब रंगों से पार।
पहले होता था फूलों का प्रयोग
रंग और अबीर के लिए पहले फूलों का प्रयोग होता था। कुछ जगहों पर विभिन्न रंगों की मिट्टी को भी रंगों के लिए इस्तेमाल किया जाता था। लताओं और पेड़ों के फूलों व पत्तों को पानी में डाल कर रंग तैयार किया जाता था। पलाश और टेसू के फूल बहुत गहरे रंग वाले होते हैं तो इन्हें पानी में उबाल कर रंग तैयार किया जाता था। चुकंदर आदि सब्जियों से भी रंग बनता था। लेकिन अब कृत्रिम रूप से बनाए जाने वाले रंगों और अबीर का चलन है।
सेहत के लिए फायदेमंद
होली खेलना मानसिक खुशहाली का त्योहार तो है ही, शारीरिक सुखों की खान भी है। पुराने जमाने में पत्तियों, फूलों और मिट्टियों के रंग को मिला कर रंग बनाए जाते थे। विभिन्न जड़ी-बूटियों से उबाल कर निकला हुआ अर्क जब हमारे शरीर पर पड़ता है तो औषधीय गुण प्राप्त होते हैं। इससे निरोगी रहने के साथ ही रोगों से लड़ने की क्षमता विकसित हो जाती है।

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