तमिलनाडु के तिरुपत्तूर जिले में इन दिनों बड़ी संख्या में मोर जंगल छोड़कर खेतों और आबादी वाले इलाकों की ओर रुख कर रहे हैं। वन विभाग के अधिकारियों और स्थानीय लोगों के मुताबिक, लगातार बढ़ती जंगल की आग, प्राकृतिक आवास के सिकुड़ने और पानी-भोजन की कमी के कारण ये पक्षी सुरक्षित जगहों की तलाश में खेतों तक पहुंच रहे हैं। किसानों का कहना है कि अब सुबह-शाम खेतों में दर्जनों मोर दिखाई देते हैं जबकि विशेषज्ञ इसे पर्यावरणीय असंतुलन और वन क्षेत्रों पर बढ़ते दबाव का संकेत मान रहे हैं।
मदावलम गांव के निवासियों ने न्यूज एजेंसी एएनआई को बताया कि अब मोर अक्सर खेतों में, मदापल्ली झील के पास और गांव की सड़कों पर भोजन और आश्रय की तलाश में दिखाई देते हैं। स्थानीय लोगों ने बताया कि सौ से अधिक मोर आसपास के खेतों में शरण ले चुके हैं। एक तरफ जहां ग्रामीणों और किसानों ने कहा कि पक्षियों को अपने रंग-बिरंगे पंख फैलाते देखना इस क्षेत्र का एक प्रमुख आकर्षण बन गया है। वहीं, दूसरी तरफ उन्होंने सड़कों और घनी आबादी वाले क्षेत्रों के पास मोरों की बढ़ती आवाजाही पर चिंता भी व्यक्त की। निवासियों का कहना है कि पक्षी ऐसे ही सार्वजनिक क्षेत्रों से गुजरते रहे तो उनके घायल होने की संभावना बढ़ सकती है।
खेतों में घूम रहे मोर
ग्रामीणों ने सरकार और वन विभाग के अधिकारियों से जंगलों के विनाश को रोकने और वन्यजीव संरक्षण में सुधार के लिए तुरंत कोई उपाय करने का आग्रह किया। एक किसान ने एएनआई से कहा, “जलागंबराई वन क्षेत्र से सौ से अधिक मोर हमारे खेतों में शरण ले चुके हैं। ये पक्षी हमारे खेतों में उगाई जाने वाली मक्का, बाजरा, रागी और मूंगफली जैसी फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। फिर भी हमें मोरों को अपने खेतों में आते देखकर खुशी होती है।”
किसान ने कहा, “हम इन्हें सीधे भोजन नहीं देते लेकिन ये भोजन की तलाश में खुद ही आ जाते हैं। जंगल की आग और वन क्षेत्रों के तबाह होने के कारण ये पक्षी खेती योग्य जमीन और गांवों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं। वन विभाग को हमारे राष्ट्रीय पक्षी मोर की रक्षा के लिए उचित कदम उठाने चाहिए।”
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आईआईटी मद्रास और बेंगलुरु के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस के रिसर्चर्स ने एक नया कार्बन-फ्री मॉलिक्यूल बनाकर केमिस्ट्री में एक बड़ी कामयाबी हासिल की है। यह मॉलिक्यूल मशहूर कार्बन वाले फेरोसिन मॉलिक्यूल (Ferrocene Molecule) के अनोखे ‘सैंडविच’ स्ट्रक्चर की कॉपी जैसा है। इससे एक ऐसी समस्या हल हो गई है जो सात दशकों से वैज्ञानिकों को चुनौती दे रही थी। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें
