छेड़छाड़ के आरोपी को दिया गांवभर की महिलाओं के कपड़े धोने का आदेश, अब जज पर ही गिरी गाज

पटना हाईकोर्ट ने अजीबोगरीब फैसला देने वाले मधुबनी जिले के अतिरिक्त जज अविनाश कुमार को अगले आदेश तक कार्य नहीं करने का निर्देश दिया है।

तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (फोटो: फ्रीपिक)

पिछले दिनों बिहार की एक जिला अदालत ने एक महिला से छेड़छाड़ के आरोपी व्यक्ति को जमानत देते हुए बेहद ही अजीबोगरीब शर्त रखी थी। कोर्ट ने आरोपी को गांवभर की महिलाओं के कपड़े फ्री में धोने और इस्त्री करने का आदेश दिया था। अब पटना हाईकोर्ट ने इस मामले में संज्ञान लेते हुए अजीबोगरीब फैसला देने वाले मधुबनी जिले के अतिरिक्त जज अविनाश कुमार को अगले आदेश तक कार्य नहीं करने का निर्देश दिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पटना उच्च न्यायालय ने प्रशासनिक आदेश जारी कर मधुबनी जिले के झंझारपुर अनुमंडल में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में तैनात अविनाश कुमार को उनके अजीबोगरीब आदेश देने के कारण उन्हें अगले आदेश तक कोई भी न्यायिक कार्य नहीं करने को कहा गया है।

गौरतलब है कि पिछले दिनों मधुबनी जिले के झंझारपुर अनुमंडल में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश अविनाश कुमार ने एक महिला के साथ छेड़छाड़ के आरोपी ललन कुमार साफी की जमानत याचिका पर सुनवाई की थी। आरोपी पिछले अप्रैल महीने से ही जेल में बंद था। सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकील ने अदालत के सामने कहा कि वह कपड़ा धोने का काम करता है और पेशे के माध्यम से समाज की सेवा करना चाहता है।

जिसके बाद अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश अविनाश कुमार ने सुनवाई पूरी करते हुए ही 10 हजार रुपए के दो जमानतदार देने के लिए कहा। साथ ही न्यायाधीश ने यह भी आदेश दिया कि आरोपी अगले छह महीने तक मुफ्त में गांव की सभी महिलाओं के कपड़े धोकर इस्त्री करेगा। इसके अलावा आरोपी के द्वारा दिए जा रहे कामों की समीक्षा के लिए गांव के सरपंच और मुखिया को भी नियुक्त करने की बात कही गई।

मधुबनी जिले के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा दिया यह फैसला काफी सुर्ख़ियों में रहा। अदालत के इस फैसले पर सोशल मीडिया पर भी तरह तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिली। अब कहा यह भी जा रहा है कि मधुबनी जिले में तैनात अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश अविनाश कुमार पहले भी इस तरह के अजीबोगरीब फैसले दे चुके हैं। इससे पहले उन्होंने एक मामले में दलित बच्चों को छह महीने तक दूध पहुंचाने की सजा भी सुनाई थी।

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