पिछले दो हफ्तों में सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन नाम की दो बेहद आम और सस्ती कीमोथेरेपी दवाएं देशभर में दुकानों से गायब हो गई हैं। इससे कैंसर विशेषज्ञों (ऑन्कोलॉजिस्ट) ने चिंता जाहिर की है। इसकी वजह होर्मुज संकट के कारण कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी है। लेकिन सरकारी मूल्य नियंत्रण के चलते दवा कंपनियां इनकी कीमत नहीं बढ़ा पा रही हैं, इसलिए आपूर्ति प्रभावित हो गई है।

सर गंगा राम अस्पताल में मेडिकल ऑन्कोलॉजी के चेयरमैन डॉ. श्याम अग्रवाल ने कहा, “हमारे अस्पताल की फार्मेसी में सिसप्लेटिन और कार्बोप्लेटिन खत्म हो गई हैं। मेरे क्लिनिक में आने वाले हर दस में से लगभग सात मरीजों को इनमें से किसी एक दवा की जरूरत होती है। ये दवाएं मुंह, फेफड़े, गर्भाशय और ग्रीवा जैसे कई तरह के कैंसर के इलाज के लिए लिखी जाती हैं। अब कैंसर के मरीज इस दवा की तलाश में एक दुकान से दूसरी दुकान भटक रहे हैं। दूसरे शहरों में मेरे साथी डॉक्टर भी ऐसी ही स्थिति का सामना कर रहे हैं।”

डॉक्टरों ने जाहिर की चिंता

ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज नई दिल्ली के ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. अभिषेक शंकर ने भी ऐसी ही चिंता जताई। उन्होंने कहा, “पिछले कम से कम दो हफ्तों से इन दवाओं की कमी बनी हुई है।” दिल्ली के एक और ऑन्कोलॉजिस्ट ने बताया कि कम डोज वाली दवाएं तो बाजार से पूरी तरह गायब हो गई हैं, जबकि ज्यादा डोज वाली दवाएं अभी भी कुछ दुकानों पर उपलब्ध हैं।

मुंबई में लीलावती अस्पताल और रिसर्च सेंटर के मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. मोहन मेनन ने बताया कि प्लैटिनम से बनी कीमोथेरेपी की सभी दवाओं की कमी हो गई है और इसकी मुख्य वजह है दुनिया भर में प्लैटिनम की बढ़ती कीमतें। उन्होंने कहा, “2023 के मध्य में इस कीमती धातु की कीमत 2700 रुपये प्रति ग्राम थी, लेकिन अब यह तेजी से बढ़कर 7800 रुपये प्रति ग्राम से भी ज्यादा हो गई है।”

थोक विक्रेताओं और स्टॉक रखने वालों के पास भी अब तेजी से स्टॉक खत्म हो रहा है। दिल्ली की एक बड़ी रिटेल फार्मेसी के मालिक ने बताया, “इस समय देश में शायद ही किसी मेडिकल स्टोर पर ये दवाएं उपलब्ध हैं। ज्यादातर स्टॉक रखने वालों और थोक विक्रेताओं के पास इनका स्टॉक खत्म हो चुका है। उनके पास जो थोड़ा-बहुत स्टॉक बचा है, उसे वे रिटेल विक्रेताओं को बेचने के बजाय सीधे मरीजों को बेचने की बात कह रहे हैं।”

हालांकि, युद्ध शुरू होने के बाद से कच्चे माल की बढ़ती कीमतों के कारण कई मेडिकल उत्पादों खासकर पेट्रोकेमिकल-आधारित उत्पादों की कीमतें बढ़ गई हैं, लेकिन इन दोनों दवाओं का उत्पादन करने वाली कंपनियों ने अपनी कीमतें नहीं बढ़ाई हैं। ये दवाएं ‘ड्रग प्राइसिंग कंट्रोल ऑर्डर’ (DPCO) के तहत आती हैं। इस देश में सभी जरूरी दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करता है। डीपीसीओ के तहत आने वाली किसी भी दवा की कीमत में हर साल, थोक कीमतों में होने वाली औसत बढ़ोतरी के हिसाब से ही बढ़ोतरी की जा सकती है।

भारत में ज्यादातर प्लैटिनम खाड़ी देशों से आयात किया जाता है

जहां एक तरफ प्लैटिनम की कीमतें बढ़ रही हैं। इसकी वजह दुनिया के सबसे बड़े सप्लायर, दक्षिण अफ्रीका में इसकी कमी होना और ऑटोमोटिव सेक्टर और ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन में इस धातु का बढ़ता इस्तेमाल है। वहीं दूसरी तरफ, पश्चिम एशिया में चल रहे मौजूदा संकट ने इस आग में घी डालने का काम किया है। एक इंडस्ट्री एक्सपर्ट ने अपना नाम जाहिर न करने की शर्त पर बताया, “भारत में ज्यादातर प्लैटिनम खाड़ी देशों से आयात किया जाता है और मौजूदा संघर्ष की वजह से इन देशों पर असर पड़ा है।” भारत के लिए प्लैटिनम का सबसे बड़ा सप्लायर संयुक्त अरब अमीरात (UAE) है, जहां से भारत में होने वाले कुल आयात का लगभग आधा हिस्सा आता है।

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मर्क एंड कंपनी की सबसे ज्यादा बिकने वाली कैंसर इम्यूनोथेरेपी दवा Keytruda का जेनेरिक वर्जन बनाने की दौड़ में कम से कम सात भारतीय निर्माता शामिल हैं। डॉक्टरों और शोधकर्ताओं का कहना है कि जून 2028 में दवा का पेटेंट समाप्त होने पर दो साल के अंदर एक सस्ता विकल्प उपलब्ध हो सकता है । इस दवा के 200 मिलीग्राम खुराक की कीमत 3 लाख रुपये से अधिक है। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर…