डेरा सच्चा सौदा प्रमुख राम रहीम को 16 वीं बार पैरोल मिल गई है। जी हां, 2017 से अब तक कभी पैरोल तो कभी फरलो पर राम रहीम जेल से बाहर आता है और हर बार एक नई बहस शुरू होने के साथ ही सवाल खड़े हो जाते हैं। देश की जेलों में सजा काट रहे कैदियों को कानून के तहत कुछ खास परिस्थितियों में अस्थायी राहत दी जाती है। इस राहत को ही पैरोल कहा जाता है।

हाल ही में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख को एक बार फिर पैरोल मिलने की खबरों के बाद यह मुद्दा चर्चा में है कि आखिर पैरोल होती क्या है, यह किन कैदियों को मिलती है, इसके नियम क्या हैं और क्या यह अधिकार है या विशेष सुविधा। भारत की जेल व्यवस्था में पैरोल और फरलो दो अलग-अलग कानूनी प्रावधान हैं जिनका उद्देश्य कैदियों को सामाजिक और पारिवारिक जीवन से जोड़ना और सुधार की प्रक्रिया को मजबूत करना है। लेकिन जब-जब किसी हाई-प्रोफाइल कैदी को बार-बार पैरोल मिलती है तो इस व्यवस्था की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल उठने लगते हैं।

पैरोल क्या होती है?

पैरोल एक अस्थायी रिहाई है जिसमें जेल में सजा काट रहा कैदी कुछ समय के लिए जेल से बाहर आता है लेकिन वह कानूनी रूप से दोषी बना रहता है। यह रिहाई सजा को खत्म नहीं करती बल्कि कुछ समय के लिए रोक देती है। सरल शब्दों में कहें तो पैरोल ‘छुट्टी’ नहीं बल्कि एक ‘निगरानी में दी गई अस्थायी रिहाई’ है। पैरोल के दौरान कैदी को कुछ शर्तों का पालन करना अनिवार्य होता है और उसे तय समय के बाद वापस जेल लौटना होता है।

पैरोल किन कैदियों को मिलती है?

-हर कैदी को पैरोल का अधिकार नहीं होता। इसके लिए कुछ शर्तें तय की गई हैं:
-कैदी ने अपनी सजा का एक निश्चित हिस्सा पूरा किया हो
-उसका व्यवहार जेल में अच्छा रहा हो
-वह किसी गंभीर सुरक्षा खतरे का कारण न हो
-अदालत या जेल प्रशासन की रिपोर्ट सकारात्मक हो
-पारिवारिक या मानवीय कारण मौजूद हों

आमतौर पर उम्रकैद, लंबी सजा काट रहे कैदियों को भी पैरोल मिल सकती है लेकिन यह पूरी तरह प्रशासनिक और कानूनी जांच के बाद ही संभव है।

पैरोल कब दी जाती है?

पैरोल देने के पीछे कुछ मानवीय और प्रशासनिक कारण होते हैं:

  1. -पारिवारिक कारण किसी करीबी रिश्तेदार की मृत्यु परिवार में गंभीर बीमारी शादी या अन्य महत्वपूर्ण पारिवारिक आयोजन
  2. -स्वास्थ्य कारण कैदी की खुद की गंभीर बीमारी बेहतर इलाज की जरूरत
  3. -सामाजिक पुनर्वास कैदी को समाज में दोबारा जोड़ने की प्रक्रिया मानसिक संतुलन बनाए रखना
  4. -विशेष परिस्थितियाँ अदालत या सरकार द्वारा विशेष अनुमति त्योहारों या मानवीय आधार पर राहत

पैरोल और फरलो में अंतर यह समझना जरूरी है कि पैरोल और फरलो एक जैसे नहीं हैं:

पैरोल: किसी विशेष कारण पर मिलती है सजा स्थगित होती है, समाप्त नहीं आमतौर पर छोटी अवधि के लिए

फरलो: बिना किसी विशेष कारण के भी मिल सकती है। यह एक नियमित अंतराल पर दी जाने वाली छुट्टी जैसी व्यवस्था है इसका उद्देश्य कैदी के व्यवहार में सुधार और सामाजिक संपर्क बनाए रखना है

पैरोल देने की प्रक्रिया

पैरोल कोई स्वतः मिलने वाली सुविधा नहीं है। इसके लिए एक तय प्रक्रिया होती है:

कैदी या उसके परिवार द्वारा आवेदन, जेल प्रशासन की रिपोर्ट, पुलिस जांच रिपोर्ट, जिला पैरोल समिति की समीक्षा। अंतिम निर्णय सक्षम प्राधिकारी द्वारा कई राज्यों में यह अधिकार राज्य सरकार के गृह विभाग या विशेष पैरोल बोर्ड के पास होता है।

पैरोल की शर्तें पैरोल मिलने के बाद कैदी पर कई प्रतिबंध लगाए जाते हैं:
-निर्धारित समय पर पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट करना तय क्षेत्र से बाहर न जाना किसी आपराधिक गतिविधि में शामिल न होना
-मोबाइल और अन्य माध्यमों से निगरानी समय समाप्त होने पर अनिवार्य रूप से जेल लौटना

इन शर्तों के उल्लंघन पर पैरोल तुरंत रद्द की जा सकती है और अतिरिक्त कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है।

क्या पैरोल अधिकार है?

कानूनी तौर पर पैरोल को ‘मौलिक अधिकार’ नहीं माना गया है। यह एक प्रशासनिक सुविधा है जो जेल मैनुअल और राज्य नियमों के तहत दी जाती है। इसका उद्देश्य सजा को हल्का करना नहीं बल्कि मानवीय दृष्टिकोण अपनाना है।

राम रहीम का मामला क्यों चर्चा में है?

डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह 2017 से रेप और हत्या जैसे मामलों में सजा काट रहा है। उसके बाद से उसे कई बार पैरोल और फरलो मिलने की खबरें सामने आती रही हैं। हाल ही में उसे एक बार फिर पैरोल दी गई है जिसे लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में बहस तेज हो गई है।

बार-बार पैरोल मिलना सवाल खड़े करता है जबकि समर्थकों का तर्क है कि यह कानूनी प्रक्रिया के तहत ही दिया गया राहत कदम है। इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह चर्चा तेज कर दी है कि क्या पैरोल व्यवस्था का दुरुपयोग हो रहा है या यह केवल नियमों के तहत मानवीय आधार पर दी जा रही सुविधा है।

क्या पैरोल का दुरुपयोग संभव है?

पैरोल प्रणाली में कुछ चुनौतियां जरूर हैं: निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी के आरोप राजनीतिक या प्रभावशाली व्यक्तियों को प्राथमिकता मिलने की धारणा निगरानी व्यवस्था की सीमाएं राज्यवार अलग-अलग नियमों से असमानता हालांकि सरकारें समय-समय पर इस व्यवस्था को और सख्त और पारदर्शी बनाने की बात करती रही हैं।

अदालतों और कानून की भूमिका भारत में पैरोल से जुड़े मामलों में अदालतें भी हस्तक्षेप करती हैं- खासकर जब किसी कैदी को बार-बार राहत दी जाती है या उसकी शर्तों के उल्लंघन की आशंका होती है। सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट समय-समय पर यह स्पष्ट कर चुके हैं कि पैरोल एक ‘रियायत’ है, ना कि ‘अधिकार’ और इसका उद्देश्य केवल मानवीय और सुधारात्मक है।