संसद के विस्तारित बजट सत्र में पेश होने वाले तीनों विधेयक महिलाओं के लिए आरक्षण को जल्द लागू करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माने जा रहे हैं। इन विधेयकों में निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन से जुड़े कई सवालों के जवाब देने की कोशिश की गई है, लेकिन साथ ही कुछ नए सवाल भी खड़े हो गए हैं, जिन पर संसद में गहन चर्चा होने की संभावना है।

सबसे पहले लोकसभा की कुल सीटों की संख्या पर ध्यान दें। प्रस्ताव के अनुसार, निर्वाचित सदस्यों की अधिकतम संख्या 850 तक हो जाएगी, जो मौजूदा 543 सीटों की तुलना में लगभग 50 फीसदी अधिक है। नए संसद भवन में लोकसभा कक्ष की बैठने की क्षमता 888 सदस्यों के लिए है, जिसे संयुक्त सत्र के दौरान 1,272 तक बढ़ाया जा सकता है। इसका मतलब है कि भविष्य में सांसदों की संख्या बढ़ाने की भौतिक व्यवस्था पहले से मौजूद है।

हालांकि, सबसे बड़ा सवाल यह है कि अलग-अलग राज्यों के बीच सीटों का बंटवारा किस आधार पर होगा। सरकार ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि वह राज्यों के बीच वर्तमान सीट अनुपात को बनाए रखना चाहती है। लेकिन संविधान का सिद्धांत “एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य” यह मांग करता है कि जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व समान हो। पिछले चार दशकों में उत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों की जनसंख्या वृद्धि में बड़ा अंतर आया है, जिससे यह संतुलन बनाना काफी जटिल हो गया है।

1971 की जनगणना के आधार पर परिसीमन के बाद से अब तक नया परिसीमन नहीं हुआ

खास बात यह है कि 1971 की जनगणना के आधार पर जो परिसीमन किया गया था, उसके बाद से अब तक कोई नया परिसीमन नहीं हुआ है। अब प्रस्ताव है कि अगला परिसीमन 2011 की जनगणना के आधार पर किया जाए। यह बदलाव भी बहस का विषय बन सकता है, क्योंकि इतने लंबे अंतराल के बाद जनसंख्या में बड़े बदलाव आ चुके हैं।

इन विधेयकों का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ये भविष्य में परिसीमन की प्रकृति को बदल सकते हैं। अभी तक संविधान में यह व्यवस्था थी कि हर जनगणना के बाद परिसीमन किया जाएगा। लेकिन नए प्रस्ताव में इस व्यवस्था को खत्म करने की बात कही गई है।

इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 82 में संशोधन प्रस्तावित है। नए मसौदे में इसका नाम “हर जनगणना के बाद पुनर्समायोजन” से बदलकर “निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्समायोजन” कर दिया गया है। साथ ही यह स्पष्ट अनिवार्यता भी हटा दी गई है कि हर जनगणना के बाद सीटों का पुनर्विन्यास और निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण किया जाएगा। इसका मतलब है कि अब परिसीमन एक नियमित और अनिवार्य प्रक्रिया नहीं रहेगा।

इसी तरह अनुच्छेद 81 में भी बदलाव प्रस्तावित है। इसमें ‘जनसंख्या’ की परिभाषा को बदलते हुए यह प्रावधान किया गया है कि सीटों के बंटवारे के लिए किस जनगणना के आंकड़ों का उपयोग किया जाएगा, यह संसद तय करेगी। पहले यह अनिवार्य था कि हाल की प्रकाशित जनगणना के आंकड़े ही आधार होंगे। अब यह निर्णय सरकार और संसद के विवेक पर निर्भर करेगा।

इन दोनों संशोधनों का संयुक्त प्रभाव यह है कि परिसीमन की प्रक्रिया अब संविधान से सीधे जुड़ी अनिवार्यता न होकर सामान्य कानून के जरिए संचालित की जा सकेगी। यानी, इसे लागू करने का समय और आधार सरकार साधारण बहुमत से तय कर सकेगी।

विधेयकों में यह भी कहा गया है कि परिसीमन आयोग का गठन किया जाएगा, जो ‘निर्धारित तरीके और निर्धारित जनगणना’ के आधार पर काम करेगा। इसका अर्थ यह है कि आयोग कब बनेगा और वह किस जनगणना के आंकड़ों का उपयोग करेगा, यह संसद के कानून के माध्यम से तय होगा।

बदलाव पहले की व्यवस्था से काफी अलग है

यह बदलाव पहले की व्यवस्था से काफी अलग है। 1970 के दशक से अब तक परिसीमन को टालने के लिए संविधान में संशोधन करना पड़ता था, जिसके लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत जरूरी होता था। उदाहरण के लिए, 1976 और 2001 में ऐसे संशोधन किए गए थे, ताकि उन राज्यों को नुकसान न हो, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता हासिल की थी। लेकिन नए प्रस्ताव के तहत यह प्रक्रिया आसान हो जाएगी और साधारण बहुमत से ही निर्णय लिया जा सकेगा।

हालांकि, इन विधेयकों में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि लोकसभा की सीटों का राज्यों के बीच बंटवारा किस सटीक फार्मूले से होगा, जबकि सरकार ने यह भरोसा दिया है कि मौजूदा संतुलन बनाए रखा जाएगा। यह एक बड़ा अंतर है – राजनीतिक आश्वासन और कानूनी प्रावधानों के बीच।

यह अंतर और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब हम संविधान के उस सिद्धांत को देखते हैं, जिसमें कहा गया है कि प्रत्येक राज्य की जनसंख्या और उसे मिली सीटों के बीच अनुपात पूरे देश में लगभग समान होना चाहिए। साथ ही, हर राज्य के भीतर भी निर्वाचन क्षेत्रों की जनसंख्या लगभग बराबर होनी चाहिए।

अब चुनौती यह है कि एक तरफ इस संवैधानिक सिद्धांत को बनाए रखा जाए और दूसरी तरफ राज्यों के बीच मौजूदा सीटों का संतुलन भी बरकरार रखा जाए। इन दोनों उद्देश्यों को साथ लेकर चलना आसान नहीं है और यही संसद में होने वाली बहस का मुख्य मुद्दा बन सकता है।

कुल मिलाकर, ये विधेयक महिलाओं के आरक्षण को लागू करने की दिशा में तो महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनके जरिए परिसीमन की पूरी प्रक्रिया को अधिक लचीला और राजनीतिक निर्णयों पर निर्भर बना दिया गया है। इससे भविष्य में सरकारों को अधिक अधिकार मिलेंगे, लेकिन साथ ही पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर चिंताएं भी बढ़ सकती हैं।

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केंद्र सरकार ने लोकसभा की सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव रखा है। इस कदम का उद्देश्य लंबे समय से लंबित महिला आरक्षण कानून को लागू करना और साथ ही परिसीमन का नया चरण शुरू करना है। इससे संबंधित विधेयक का ड्राफ्ट सांसदों के साथ साझा किया है। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत कोटा से संबंधित प्रावधानों में संशोधन करने और 2011 की जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन करने के लिए स्पेशल सेशन बुलाया गया है। प्रस्ताव के अनुसार, 815 सीटें राज्यों को और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों को आवंटित की जाएंगी। इससे कुल सीटों की संख्या 850 हो जाएगी। यह बदलाव 2029 के लोकसभा चुनावों से प्रभावी होने की उम्मीद है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक