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3 में से 1 कृषि कानून को लाएं अमल में- किसान आंदोलन के बीच संसदीय स्टैंडिंग कमेटी ने कहा, TMC नेता हैं समिति अध्यक्ष

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस कानून के जरिए कृषि क्षेत्र में बढ़े हुए निवेश तैयार करने में मदद मिलेगी, जिससे कृषि मार्केटिंग में न्यायपूर्ण और उत्पादक प्रतियोगिता होगी और किसानों की तनख्वाह में इजाफा होगा।

Author Edited By कीर्तिवर्धन मिश्र नई दिल्ली | Updated: March 20, 2021 9:41 AM
Farm Laws, Farmers Protestकृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब में तेज हो रहा प्रदर्शन। (एक्सप्रेस फोटो- हरमीत सोढ़ी)

कृषि कानूनों को लेकर केंद्र सरकार और किसान संगठनों के बीच गतिरोध खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। मौजूदा समय में विपक्ष की ज्यादातर पार्टियां किसान आंदोलन के साथ खड़े होने की बात कहते हुए तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग उठाती रही हैं। हालांकि, इन सबके बीच संसद की एक स्थायी समिति ने सरकार से कहा है कि तीनों कृषि कानूनों में से वह एक को ‘भाषा और भाव’ में लागू करे।

गौर करने वाली बात यह है कि संसद में खाद्य, उपभोक्ता मामले और सार्वजनिक वितरण मामलों की स्थायी समिति में भाजपा, कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, आप, राकांपा और शिवसेना समेत 13 अलग-अलग पार्टियों के नेता शामिल हैं। इसकी अध्यक्षता भी टीएमसी नेता सुदीप बंदोपाध्याय कर रहे हैं। बताया गया है कि स्थायी समिति की रिपोर्ट शुक्रवार को ही लोकसभा में पेश की गई। इसमें कहा गया है कि समिति उम्मीद करती है कि हाल ही में लागू किया गया आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून 2020, देश के कृषि क्षेत्र में अनछुए संसाधनों को खोलने में मददगार साबित होगा।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस कानून के जरिए कृषि क्षेत्र में बढ़े हुए निवेश तैयार करने में मदद मिलेगी, जिससे कृषि मार्केटिंग में न्यायपूर्ण और उत्पादक प्रतियोगिता होगी और किसानों की तनख्वाह में इजाफा होगा। कमेटी ने इन फायदों को गिनाते हुए सरकार को आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून 2020 लागू करने का प्रस्ताव दिया है। पैनल का कहना है कि सरकार को बिना किसी रुकावट के इसे लागू करना चाहिए, ताकि किसानों और कृषि क्षेत्र से जुड़े अन्य स्टेकहोल्डरों को इस कानून में बताए गए फायदे जल्द से जल्द मिल सकें।

संसदीय पैनल की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जहां देश में अधिकतर कृषि उत्पादों की अतिरिक्त पैदावार होने लगी है, वहीं किसानों को अभी भी कोल्ड स्टोरेज, वेयरहाउसेज, और एक्सपोर्ट सुविधाओं में खराब निवेश के चलते अपनी फसल के बेहतर दाम पाने में मुश्किल होती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि आवश्यक वस्तु कानून 1955 में किसानों के लिए प्रोसेसिंग और एक्सपोर्ट की सुविधा को बढ़ावा नहीं दिया जाता था, जिससे बंपर फसलें आने के बावजूद किसानों को बड़े नुकसान उठाने पड़ते हैं।

कमेटी में कौन-कौन सी पार्टियां शामिल?: जिस कमेटी ने यह रिपोर्ट निकाली है, उसमें संसद के दोनों सदनों से 13 पार्टियों के सांसद शामिल हैं। इनमें आम आदमी पार्टी, भाजपा, कांग्रेस, द्रमुक, जदयू, नागा पीपुल्स फ्रंट, राकांपा, नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीएमके, शिवसेना, सपा, तृणमूल कांग्रेस और वाईएसआर कांग्रेस के सांसद शामिल हैं। इसके अलावा एक नामित सदस्य भी कमेटी का हिस्सा हैं।

अहम खाद्य पदार्थों की कीमत पर नजर रखे सरकार: कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में आगे कहा, “आलू, प्याज और दाल जैसी चीजें लोगों की रोजाना डाइट का हिस्सा हैं और लाखों लोग जिन्हें पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम का फायदा नहीं मिलता, उन्हें नए कानून के लागू होने के बाद बुरा प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए सरकार को सभी अहम वस्तुओं की कीमतों पर करीब से नजर रखनी चाहिए और कानून में मौजूद प्रावधानों को जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल करना चाहिए।”

बताया गया है कि कमेटी के अध्यक्ष सुदीप बंदोपाध्याय कुछ कारणों से समिति की आखिरी मीटिंग में शामिल नहीं हो पाए थे। इसके चलते कमेटी ने इस रिपोर्ट को भाजपा के अजय मिश्र तेनी की कार्यकारी अध्यक्षता में स्वीकार किया।

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