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मोदी सरकार को “राजधर्म” बताने के लिए यशवंत सिन्‍हा ने याद किया किस्‍सा- ऐसे वाजपेयी ने दूर किया था सदन का गतिरोध

सिन्हा ने लिखा है कि तब महान लोकतांत्रिक नेता और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने हमें राजधर्म की याद दिलाते हुए कहा था कि संसद सुचारू रूप से चले यह सरकार की जिम्मेदारी होती है।

भाजपा नेता यशवंत सिन्हा

पिछले तीन हफ्ते से संसद के दोनों सदनों में कामकाज ठप है। संसद का बजट सत्र भी समाप्ति की ओर है लेकिन विपक्ष के हंगामे की वजह से कई अहम बिल न सिर्फ अटके पड़े हैं बल्कि सदन में बिना चर्चा के ही वित्त विधेयक पास कर दिया गया है। मोदी सरकार और एनडीए से तलाक लेने के बाद आंध्र प्रदेश की सत्ताधारी तेलगु देशम पार्टी (टीडीपी) और वहां की विपक्षी वाईएसआर कांग्रेस लगातार केंद्र सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की मांग कर रही है लेकिन लोकसभा स्पीकर उनकी मांगें नहीं मान रही हैं। अब मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी मंगलवार (27 मार्च) को सदन में अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा कराने का नोटिस दिया है। ऐसे में पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता यशवंत सिन्हा ने मोदी सरकार को राजधर्म की याद दिलाते हुए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से जुड़ा वाकया याद दिलाया है।

एनडीटीवी. कॉम पर लिखे ब्लॉग में यशवंत सिन्हा ने पिछले 5 मार्च से संसद में चल रहे हंगामे के लिए मोदी सरकार और लोकसभा स्पीकर को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने साल 2003 का वाकया याद करते हुए लिखा है कि जब अमेरिका ने मार्च 2003 में इराक पर हमला बोल दिया था, तब भारत में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस समेत कई पार्टियां संसद में हंगामा कर रही थीं। बजट सत्र में अवकाश के बाद जब दोबारा 7 अप्रैल 2003 को संसद का सत्र शुरू हुआ था तब विपक्षी पार्टियां संसद में एक निंदा प्रस्ताव पारित कराने की मांग कर रही थी। उस वक्त सुषमा स्वराज संसदीय कार्य मंत्री थीं जबकि यशवंत सिन्हा खुद विदेश मंत्री थे। विदेश मंत्री के नाते यशवंत सिन्हा विपक्ष के इस प्रस्ताव के खिलाफ थे। हालांकि, विदेश मंत्रालय ने वक्तव्य जारी कर अमेरिकी हमले की निंदा की थी। बावजूद इसके संसद में हंगामा थमने का नाम नहीं ले रहा था।

यशवंत सिन्हा ने लिखा है कि तब महान लोकतांत्रिक नेता और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने हमें राजधर्म की याद दिलाते हुए कहा था कि संसद सुचारू रूप से चले यह सरकार की जिम्मेदारी होती है। उन्होंने लिखा है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बड़े नेताओं के बीच अक्सर संसद के इतर भी संवाद होता रहता है। कभी मीडिया के माध्यम से तो कभी अनौपचारिक तरीके से। इन्हीं बातचीत के क्रम में कई बार समस्याओं का समाधान छिपा होता है।

यशवंत सिन्हा ने लिखा है कि प्रधानमंत्री के निर्देश के बाद कोशिशें हुईं कि विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच गतिरोध खत्म हो जाय, मगर ऐसा नहीं हुआ। तब वाजपेयी जी ने उन्हें और उस वक्त की संसदीय कार्य मंत्री सुषमा स्वराज को बुलाया था और पूछा कि मामले में क्या प्रगति है। इसके बाद उन्होंने कहा था कि वो किसी भी कीमत पर संसद को चलाने के पक्षधर हैं। इसके बाद विपक्ष के नेताओं के साथ लोकसभा स्पीकर के चैम्बर में मीटिंग हुई और संसद से प्रस्ताव पारित करने पर रजामंदी हुई। प्रस्ताव में ‘निंदा’ शब्द को दोनों पक्षों ने स्वीकार किया और संसद ने इसे बाद में पारित कर दिया। इस वाकये के बाद संसद सुचारू रूप से चलने लगा था।

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