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मंशा तो बस हंगामे की थी, संसद में चर्चा की बात तो बस बहाना भर था

कई साल पहली बार ऐसा हुआ कि लोकसभा के पूरे सत्र को न चलने देने में सत्ता और विपक्ष की बराबर की भागीदारी रही।

Author नई दिल्ली | December 18, 2016 1:41 AM
लोकसभा का दृश्य।

कई साल पहली बार ऐसा हुआ कि लोकसभा के पूरे सत्र को न चलने देने में सत्ता और विपक्ष की बराबर की भागीदारी रही। पहले लगा कि मतविभाजन के बहाने विपक्ष नोटबंदी पर चर्चा से भाग रहा है लेकिन बाद में यह भी स्पष्ट हो गया कि सत्ता पक्ष ही किसी न किसी बहाने नोटबंदी पर चर्चा नहीं कराना चाहता। राज्यसभा में सत्र के पहले ही दिन शून्यकाल में नोटबंदी पर जितनी चर्चा हो पाई, उसका लाभ विपक्ष को मिला। विपक्ष के सदस्य उसे जारी रखते तो वे सत्ता पक्ष को बेनकाब करने में कामयाब हो जाते। वहीं, सत्ता पक्ष पहले तो यह मान कर चर्चा करवाने में लगा रहा कि नोटबंदी से लोगों की परेशानियां कम हो जाएंगी। ऐसा न होने और लगातार परेशानी बढ़ने के बाद ही सत्ता पक्ष कोई न कोई बहाना बना कर चर्चा को टालता रहा। आखिरी के चार दिन तो सत्ता पक्ष के हंगामे के कारण लोकसभा स्थगित हुई। यही बात भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कही। उन्होंने बहस नहीं होने और सदन न चलने पर कहा कि जीत-हार किसी की हो लेकिन कहीं ऐसा न हो कि संसद हार जाए।

आठ नवंबर को अचानक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हजार और पांच सौ के नोट चलन से बाहर करने की घोषणा के बाद सत्ता पक्ष को लगा होगा कि 16 नवंबर को शीतकालीन सत्र शुरू होने तक हालात सामान्य हो जाएंगे। पर ऐसा होने के बजाए हालात हर रोज बदतर होने लगे। पहले दिन से विपक्ष नोटबंदी पर नियम 56 के तहत चर्चा की मांग कर रहा था जिसे लोकसभा अध्यक्ष ने नहीं स्वीकारा और सत्ता पक्ष नियम 193 के तहत चर्चा करवाने का प्रस्ताव दे रहा था जो विपक्ष को नहीं स्वीकार था। नियम 56 में चर्चा के बाद मतविभाजन का प्रावधान है। माना जा रहा था कि सत्ता पक्ष मतविभाजन करा कर विपक्ष को एकजुट नहीं होने देना चाहता था। विपक्ष की समस्या यह थी कि सभी निजी एजंडे पर काम कर रहे हैं। पहले सत्ता पक्ष की शिव सेना ने सरकार का विरोध किया तो विपक्ष के नेताओं की बांछें खिल उठी। लेकिन जनता दल (एकी) अध्यक्ष नीतीश कुमार, बीजू जनता दल, टीआरएस, वाईआरएस कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस आदि के समर्थन से विपक्ष परेशान हुआ। विपक्ष में तृणमूल कांग्रेस और आप नोटबंदी की वापसी की मांग कर रहे हैं जबकि सदन में सबसे बड़ा दल कांग्रेस और एआइडीएमके आदि दल नोटबंदी के तरीके और लोगों को होने वाली परेशानी पर सवाल उठा रहे हैं। बसपा और सपा भी सरकार का उसी तरह से अलग-अलग विरोध कर रहे हैं जिस तरह से तृणमूल कांग्रेस और वाम दल या एआइडीएमके और डीएमके। विपक्षी नेताओं को लगता था कि चर्चा के बाद अगर मतदान होगा तो सरकार के खिलाफ वोट देने वालों में वे विपक्षी दल भी शामिल हो जाएंगे जिन्होंने कई कारणों से सीधे सरकार के खिलाफ मोर्चाबंदी नहीं कर रखी है।
अब तो लगता यही है कि राज्यसभा में विपक्ष ने चर्चा रोक कर गलती की। सोलह दिसंबर को राज्यसभा में तो शून्यकाल में नोटबंदी पर चर्चा शुरू हो ही गई थी। कई नेताओं के भाषण के बाद विपक्ष चर्चा के समय प्रधानमंत्री को मौजूद रहने और चर्चा का उनसे ही जवाब दिलवाने की मांग शुरू कर दी। बाद में उसमें सदन के बाहर प्रधानमंत्री के एक भाषण का हवाला देकर उनसे माफी की मांग शुरू कर दी, जो पूरे सत्र तक चलती रही। जिस तरह से अपने ही दल के शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी को 15 दिसंबर को सदन में बोलने नहीं दिया गया और उनके बोलने के प्रयास के समय संसदीय कार्यमंत्री अनंत कुमार ने यूपीए के घोटालों पर चर्चा की मांग करके अपने सदस्यों से हंगामा करवाया उससे तो यही लगता है कि सत्ता पक्ष नोटबंदी के मुद्दे पर फजीहत होने के डर से चर्चा नहीं करवाना चाहता था। वैसे चार दिसंबर को एआइडीएमके सदस्यों के पार्टी प्रमुख जयललिता के निधन के चलते बाद के दिनों में दिल्ली न आने से भी विपक्ष कमजोर दिखा। पहली बार ऐसा हुआ कि दोनों पक्ष चर्चा की बात तो हर रोज कर रहे हैं और वास्तव में चर्चा करवाना नहीं चाहते हैं। इस चक्कर में पूरा सत्र ही बेकार चला गया।

 

 

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