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विपक्षी एकता को बिखेरने में सरकार को मिल रही है कामयाबी

नोटबंदी पर चर्चा से सत्ता पक्ष को नुकसान के बजाए फायदा दिख रहा है इसलिए अब वही चर्चा करवाने में लग गया है।

Author नई दिल्ली | December 6, 2016 5:38 AM
संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान लोकसभा में हंगामा करता विपक्ष। (PTI Photo/ TV GRAB)

पहले से बंटे हुए विपक्ष को सरकार(सत्ता पक्ष) साफ तौर पर बांटने में कामयाब होता दिख रहा है। नोटबंदी पर मत विभाजन के साथ चर्चा पड़ अडेÞ विपक्षी दलों में से ही सत्ता पक्ष ने अपने थोड़े अनुकूल टीआरएस और बीजू जनता दल को बिना मत विभाजन वाले नियम 193 के तहत नोटिस दिलवाकर चर्चा शुरू करवा दी। माना जा रहा है कि अगर तमिलनाडु की मुख्यमंत्री की गंभीर हालत के चलते रविवार को दिल्ली से चेन्नै चले गए एआइडीएमके के 37 सदस्य लोक सभा में होते तो चर्चा विधिवत शुरू हो जाती। माना जा रहा था कि पहले सत्ता पक्ष चर्चा को टालने में लगा हुआ था। सरकार को भरोसा था कि कुछ दिनों में हालात सामान्य हो जाएंगें, ऐसा न होने और हालात दिनप्रतिदिन कठिन ही होते जाने पर सरकार ने अपने रूख में बदलाव किया। लेकिन वह किसी भी तरह मतविभाजन कराकर विपक्ष को एकजूट दिखने का अवसर देना नहीं चाहती थी। इसलिए सोमवार नियम 56 के तहत चर्चा न स्वीकारे जाने पर कांग्रेस ने नियम 184 के तहत चर्चा करवाने की मांग की थी। अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने टीआरएस के एपी जितेन्द्र रेड्डी और बीजू जनता दल के भर्तृहरि महताब के नियम 193 के तहत नोटबंदी की चर्चा को मंजूर कर लिया था। यह अलग बात है कि कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस ने शोर करके जितेन्द्र रेड्डी को ठीक से बोलने नहीं दिया और लोक सभा मंगलवार 11 बजे तक के लिए स्थगित हो गई।

अब तो लगता यही है कि विपक्ष राज्य सभा जैसा लोक सभा में भी फंस गया। 16 दिसंबर को राज्यसभा में तो शून्यकाल में नोटबंदी पर चर्चा शुरू हो ही गई थी। कई नेताओं के भाषण के बाद विपक्ष को अपनी गलती का एहसास हुआ तब उन्होंने चर्चा के समय प्रधानमंत्री को मौजूद रहने और चर्चा का उनसे ही जबाब दिलवाने की मांग शुरू कर दी। बाद में उसमें सदन के बाहर प्रधानमंत्री के एक भाषण का हवाला देकर उनसे माफी की मांग शुरू कर दी, जो अब तक चल रही है और जिसके चलते राज्यसभा की कार्यवाही ठीक से नहीं चल पा रही है। लोक सभा का किस्सा दूसरा ही है। राज्यसभा में तो सरकार अल्पमत में है लेकिन उससे सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ रहा है। लोक सभा में सरकार को सामान्य बहुमत से ज्यादा समर्थन है, इसलिए किसी भी तरह से मतदान होने पर सरकार के गिरने का खतरा नहीं है।

विपक्ष की समस्या यह है कि सभी निजी एजंडे पर काम कर रहे हैं। पहले सत्ता पक्ष की शिव सेना ने सरकार का विरोध किया तो विपक्ष के नेताओं की बांछें खिल उठी। लेकिन जनता दल(एकी) अध्यक्ष नीतीश कुमार, बीजू जनता दल, टीआरएस,वाईआरएस कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस आदि के समर्थन से विपक्ष परेशान हुआ। विपक्ष में तृणमूल कांग्रेस और आप नोटबंदी की वापसी की मांग कर रहे हैं जबकि सदन में सबसे बड़ा दल कांग्रेस और एआइडीएमके आदि दल नोटबंदी के तरीके और लोगों को होने वाली परेशानी पर सवाल उठा रहे हैं। कांग्रेस, वामदल इसमें भ्रष्टाचार का मुद्दा भी उठा रहे हैं। बसपा और सपा भी सरकार का उसी तरह से अलग-अलग विरोध कर रहे हैं जिस तरह से तृणमूल कांग्रेस और वाम दल या एआइडीएमके और डीएमके। यह सूची काफी लंबी है और कई दल तो ऐसे हैं जिनका लोक सभा में कोई सदस्य ही नहीं है। विपक्षी नेताओं को लगता है कि चर्चा के बाद अगर मतदान होगा तो सरकार के खिलाफ वोट देने वालों में वे विपक्षी दल भी शामिल हो जाएंगें जो अनेक कारणों से सीधे सरकार के खिलाफ मोर्चाबंदी नहीं किए हुए हैं।

नोटबंदी पर चर्चा से सत्ता पक्ष को नुकसान के बजाए फायदा दिख रहा है इसलिए अब वही चर्चा करवाने में लग गया है। उसके नेताओं को लगता है कि जितना मन होगा उतना अपने लोगों से बुलवाएंगे तो माहौल पक्ष में दिखेगा लेकिन मतविभाजन न हो। सोमवार इसीलिए गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि चर्चा पर नियम को लेकर भी पूरा विपक्ष बंटा हुआ है। एकमत नहीं है। टीआरएस के जितेंद रेड्डी ने भी कहा कि चर्चा नियम 193 के तहत शुरू कराई जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि इसलिए मैं विपक्ष से विनम्रतापूर्वक अनुरोध करता हूं कि नियम का निर्णय अध्यक्ष पर छोड़ा जाए और वह जिस भी नियम के तहत चर्चा शुरू कराएं, उस पर तत्काल चर्चा शुरू की जाए। इस बीच सदन में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि सरकार के बयान से यह गलत संदेश नहीं जाना चाहिए कि हम चर्चा नहीं चाहते। हम मतविभाजन के नियम के तहत बहस शुरू करने को तैयार हैं। लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि मैं बिना नियम के चर्चा की अनुमति दे सकती हूं। आप सभी अभी चर्चा शुरू कर लें। खरगे ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुस गांधी के इशारे पर अपनी बात दोहराई कि विपक्ष ने नियम 184 के तहत चर्चा का तरीका निकाला है जिस पर चर्चा शुरू कराई जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि नोटबंदी के फैसले के बाद कितना नुकसान हुआ और कितना फायदा हुआ, इस बारे में चर्चा के बाद वोटिंग कराई जानी चाहिए।

समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने सोमवार सरकार पर आरोप लगाया कि उसने देश के एक-दो बड़े उद्योगपतियों की राय पर नोटबंदी का फैसला किया और राजनीतिक दलों को विश्वास में नहीं लिया गया। मुलायम ने कहा कि नोटबंदी के फैसले के बाद आ रही कठिनाइयों के चलते और कतारों में खड़े रहने से उत्तर प्रदेश में 16 लोगों की और देशभर में 105 लोगों की मौत के मामले सामने आए हैं। उन्होंने सरकार से कहा प्रधानमंत्री ने इस फैसले से पहले हममें से किसी को विश्वास में नहीं लिया गया। इस पर भाजपा के सदस्य ठहाका लगाने लगे।विपक्ष के अन्य नेता भी बोले लेकिन वे चर्चा के बाद मतविभाजन की मांग कर रहे थे। अध्यक्ष ने कहा कि पहले चर्चा शुरू हो, तब की तब देखेंगे। इस पर विपक्ष तैयार नहीं हुआ। सत्ता पक्ष की रणनीति कामयाब होती दिखने लगी जब जितेन्द्र रेड्डी नियम 193 में बोलने को खड़े हुए। सत्ता पक्ष भी चर्चा की भूमिका बनाने के लिए रेड्डी के भाषण के समय वित्त मंत्री अरूण जेटली को लोक सभा में बुला लिया था। उन्हें विपक्ष के दूसरे सदस्यों ने बोलने नहीं दिया लेकिन उनकी बातें तो रेकॉर्ड में आ गई। सोमवार को दृश्य में ज्यादा बदलाव नहीं दिखा तो सत्ता पक्ष अपने एजंडे के हिसाब से बिना मत विभाजन वाले नियम 193 के तहत चर्चा कल-परसों में करवाने में कामयाब हो जाएंगे।

 

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