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हिंदू विधवा के मायके वालों को भी मिल सकती है संपत्ति, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- महिला के भाई भी हकदार

सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार कानून पर टिप्पणी करते हुए कहा कि कानूनन परिवार शब्द को संकीर्ण अर्थ नहीं दिया जा सकता। इसे विस्तृत अर्थ में देखना होगा, जिसमें हिंदू महिला के परिजन भी शामिल होंगे।

Author Edited By कीर्तिवर्धन मिश्र नई दिल्ली | February 25, 2021 8:56 AM
supreme courtसुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो- इंडियन एक्सप्रेस)।

सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू महिलाओं की संपत्ति पर उत्तराधिकार को लेकर अहम फैसला सुनाया है। इसके मुताबिक, हिंदू महिलाओं के पिता की ओर से आए लोगों को उसकी संपत्ति में उत्तराधिकारी माना जा सकता है। यानी ऐसे परिजनों को परिवार से बाहर का व्यक्ति नहीं माना जा सकता और हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत विधवा महिला की संपत्ति उन्हें भी मिल सकती है।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस आर सुभाष रेड्डी की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि हिंदू उत्तराधिकार कानून की धारा 15(1)(डी) के तहत हिंदू महिला के पिता की ओर से आए परिजन भी उत्तराधिकारियों के दायरे में आएंगे। ऐसे परिजनों को अजनबी करार देकर महिला का परिवार मानने से इनकार नहीं किया जा सकता।

क्या कहती है हिंदू उत्तराधिकार कानून की धारा 15 (1)(डी)?: हिंदू उत्तराधिकार कानून, 1956 की धारा 15(1)(डी) के तहत अगर किसी महिला की मृत्यु बिना वसीयत तय किए हुई है, तो उसकी संपत्ति का उत्तराधिकार धारा 16 के तहत होगा। इसमें पहला हक (a) उसके अपने बेटे और बेटियों का होगा। (b) इसके बाद पति के परिजनों का हक होगा। (c) महिला के माता-पिता का हक होगा। (d) महिला के पिता के परिजनों का हक होगा और (e) आखिर में महिला की मां के परिजनों का हक होगा।

हिंदू उत्तराधिकार कानून पर क्या रही सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी?: सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार कानून की धारा 15(1)(डी) की व्याख्या करते हुए कहा कि हिंदू महिला के पिता की ओर से आए परिजन अजनबी नहीं है, वे भी परिवार का हिस्सा ही मानें जाएंगे। कानूनन परिवार शब्द को संकीर्ण अर्थ नहीं दिया जा सकता। इसे विस्तृत अर्थ में देखना होगा, जिसमें हिंदू महिला के परिजन भी शामिल होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि ऐसे संपत्ति जिसमें पहसे से ही अधिकार सृजित हैं, उस पर अगर कोई संस्तुति होती है, तो उसे रजिस्ट्रेशन ऐक्ट की धारा 17.2 के तहत रजिस्टर कराने की जरूरत भी नहीं है।

किस मामले में आई सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी?: कोर्ट ने यह फैसला ऐसे मामले में दिया, जिसमें विधवा महिला जग्नो को अपने पति की संपत्ति मिली थी। पति की 1953 में ही मौत हो गई थी। उनका कोई बच्चा नहीं था, इसलिए महिला को कृषि संपत्ति का आधा हिस्सा मिला। उत्तराधिकार कानून, 1956 बनने के बाद धारा 14 के तहत पत्नी संपत्ति की एकमात्र पूर्ण वारिस बन गई। इसके बाद जग्नो ने संपत्ति का एग्रीमेंट किया और संपत्ति अपने भाई के बेटों के नाम कर दी। इस मामले में जग्नो के पति के भाइयों ने आपत्ति जताई थी और मामले को चुनौती दी थी।

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