मध्य प्रदेश वन विभाग के एक अधिकारी ने 1800MW के पावर प्रोजेक्ट पर आपत्ति जताई थी और कहा था कि यह इलाका बाघों और दूसरे वन्यजीवों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इसके बावजूद राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (NBWL) की स्थायी समिति ने पन्ना-रानीपुर टाइगर कॉरिडोर में बनने वाली पनारी पंप्ड स्टोरेज जलविद्युत परियोजना को वन्यजीव मंजूरी देने की सिफारिश कर दी। यह जानकारी आधिकारिक दस्तावेजों से मिली है।

1800 मेगावाट की इस परियोजना के लिए 411.48 हेक्टेयर वन भूमि की जरूरत हगी। यह जमीन पन्ना-रानीपुर टाइगर कॉरिडोर और पन्ना टाइगर रिजर्व के सैटेलाइट कोर क्षेत्र में आती है। यह कॉरिडोर मध्य प्रदेश के पन्ना और सतना के जंगलों को उत्तर प्रदेश के चित्रकूट स्थित रानीपुर टाइगर रिजर्व से जोड़ता है। बाघ और अन्य वन्यजीव इसी रास्ते एक जंगल से दूसरे जंगल तक आते-जाते हैं।

परियोजना को मंजूरी देने से पहले राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति ने जनवरी 2026 में एक टीम को मौके पर भेजकर जांच कराने का फैसला किया था। इस टीम को यह देखना था कि प्रोजेक्ट का बाघों और अन्य वन्यजीवों पर कितना असर पड़ सकता है। 9 जुलाई 2026 की बैठक में टीम की रिपोर्ट पर विचार करने के बाद समिति ने परियोजना को आगे बढ़ाने की सिफारिश कर दी।

रिपोर्ट में अधिकारी ने क्या कहा?

हालांकि, डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (DFO) ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा कि प्रस्तावित परियोजना ऐसे इलाके में है जहां बाघ, तेंदुए और भालुओं की लगातार और बिना किसी रुकावट के आवाजाही होती है।

DFO ने यह भी चेतावनी दी कि यह परियोजना टाइगर कॉरिडोर को बाधित कर सकती है। उन्होंने कहा कि केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना लागू होने के बाद इस कॉरिडोर में वन्यजीवों की गतिविधियां और आवाजाही पहले से बढ़ गई है। साथ ही, वन्यजीवों के एक जंगल से दूसरे जंगल तक जाने के लिए कोई वैकल्पिक रास्ता भी उपलब्ध नहीं है।

इसके बावजूद, राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (SC-NBWL) ने कुछ शर्तों के साथ इस परियोजना को मंजूरी देने की सिफारिश की। 9 जुलाई की बैठक के कार्यवृत्त (मिनट्स) के अनुसार, समिति ने कहा कि परियोजना के दौरान ऐसे शमन (Mitigation) उपाय अपनाए जाएं जिससे वन्यजीव कॉरिडोर की निरंतरता और सुरक्षा बनी रहे।

प्रोजेक्ट की मंजूरी में कुछ अहम शर्तें

परियोजना को मंजूरी देते हुए समिति ने कुछ अहम शर्तें भी रखी हैं। इनमें सबसे प्रमुख शर्त बघैन नदी पर 30-30 मीटर चौड़े तीन वन्यजीव ओवरपास (Wildlife Overpasses) बनाने की है। इस नदी का इस्तेमाल बाघों समेत कई वन्यजीव अक्सर एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने के लिए करते हैं।

9 जुलाई की बैठक के कार्यवृत्त (मिनट्स) के अनुसार, राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति (SC-NBWL) ने यह भी निर्देश दिया कि मलबा (मक डंपिंग) फेंकने के लिए प्रस्तावित क्षेत्र का रास्ता बदला जाए ताकि जंगल के भीतर नई सड़क बनाने की जरूरत न पड़े।

इसके अलावा, जहां भी संभव हो, मलबा डंप करने वाले क्षेत्रों और परियोजना से जुड़ी कार्यस्थल (जॉब फैसिलिटी) साइटों को टाइगर कॉरिडोर से बाहर स्थानांतरित करने को कहा गया है।

हालांकि, परियोजना को मंजूरी देने की सिफारिश करते समय समिति ने यह भी माना कि मैदानी स्तर के वन अधिकारियों ने इस बात पर चिंता जताई थी कि परियोजना से टाइगर कॉरिडोर के कई हिस्सों में बाधा (Fragmentation) पैदा हो सकती है।

परियोजना पर चर्चा के दौरान केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के निदेशक, मध्य प्रदेश के मुख्य वन्यजीव संरक्षक (Chief Wildlife Warden) और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के सदस्य सचिव से उनकी राय मांगी।

NTCA के सदस्य सचिव ने कहा कि निरीक्षण समिति की रिपोर्ट और सुझाए गए शमन (Mitigation) उपायों को ध्यान में रखते हुए परियोजना को मंजूरी देने की सिफारिश की जा सकती है।

वहीं WII के निदेशक ने कहा कि इस परियोजना का वन्यजीवों के आवासों और उनके आपसी संपर्क (Habitat Connectivity) पर महत्वपूर्ण असर पड़ सकता है। हालांकि, यदि वैज्ञानिक तरीके से शमन उपाय लागू किए जाएं तो इस असर को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसलिए परियोजना को मंजूरी दी जा सकती है।

मध्य प्रदेश के मुख्य वन्यजीव संरक्षक (CWLW) ने भी चार सदस्यीय निरीक्षण समिति की सिफारिशों से सहमति जताई और कहा कि परियोजना के दौरान सभी शमन उपायों को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।

टाइगर कॉरिडोर में रेलवे लाइन को मिली हरी झंडी

देश में एक टाइगर कॉरिडोर के बीच रेलवे लाइन को हरी झंडी मिल गई है। नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ (SC-NBWL) की स्टैंडिंग कमिटी ने मध्य प्रदेश में जुझारपुर और चिचोंडा के बीच तीसरी रेलवे लाइन के लिए वाइल्डलाइफ क्लीयरेंस की सिफारिश की है। ऐसे में भारत का मुख्य टाइगर कॉरिडोर सतपुड़ा और मेलघाट टाइगर रिज़र्व के बीच बंट सकता है।