Punjab News: पंजाब यूनिवर्सिटी कैंपस स्टूडेंट्स काउंसिल चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की लगातार दूसरी जीत को पंजाब में युवा वोटरों के बीच बीजेपी की बढ़ती लोकप्रियता के प्रमाण के तौर पर देखा जा रहा है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एबीवीपी की जीत की सराहना करते हुए इसे नेशन फर्स्ट की विचारधारा में युवा शक्ति के अटूट विश्वास का प्रमाण बताया।

पंजाब में ‘जेन जी’ के बजाय एक रणनीतिक और फायदेमंद गठबंधन की ज्यादा चर्चा थी, एबीवीपी का आखिरी समय में शिरोमणि अकाली दल के स्टूडेंट विंग, ‘स्टूडेंट ऑर्गनाइजेशन ऑफ इंडिया’ के साथ गठबंधन। पंजाब विधानसभा चुनाव से छह महीने से भी कम समय पहले हुए इस गठबंधन को कुछ लोग राज्य में बीजेपी और सुखबीर बादल के नेतृत्व वाली शिअद के बीच इसी तरह के गठबंधन का संभावित संकेत मान रहे थे।

फिर भी, एक और महत्वपूर्ण सवाल बना हुआ है, पंजाब सरकार और केंद्र के बीच लंबे समय से चल रही खींचतान में फंसी प्रतिष्ठित संस्था पंजाब विश्वविद्यालय के बारे में पीयूसीएससी चुनाव परिणाम क्या बताते हैं? और इसे राज्य के मतदाताओं के फैसले के रूप में क्यों नहीं देखा जाना चाहिए? इसे समझने के लिए विश्वविद्यालय के इतिहास पर एक नजर डालनी चाहिए।

पंजाब विश्वविद्यालय का लंबा सफर

कलकत्ता विश्वविद्यालय से अलग होकर 14 अक्टूबर, 1882 को लाहौर में स्थापित पंजाब विश्वविद्यालय को अंजुमन-ए-पंजाब नामक साहित्यिक और सांस्कृतिक आंदोलन का सहयोग प्राप्त था। इस आंदोलन का नेतृत्व डॉ. गॉटलीब विल्हेम लेटनर ने किया था, जो उस समय लाहौर गवर्नमेंट कॉलेज के प्रिंसिपल थे। इसे कश्मीर, पटियाला, कपूरथला और बहावलपुर जैसी रियासतों से आर्थिक सहायता प्राप्त थी।

शुरू से ही, पीयू का स्वरूप अत्यंत स्वायत्त रहा है। यह किसी सरकारी खजाने पर निर्भर नहीं था, बल्कि एक परीक्षा निकाय के रूप में अपनी खुद की आय पर निर्भर था। फिर विभाजन हुआ। पीयू संभवतः भारत का एकमात्र विश्वविद्यालय बन गया जिसका विभाजन हुआ। भारतीय हिस्से में पुनर्जन्म लेकर, यह होशियारपुर और शिमला से होते हुए अंततः 1949 में चंडीगढ़ में स्थापित हुआ, जहां इसने पियरे जेनरट द्वारा डिजाइन किए गए आधुनिक परिसर के निर्माण के लिए 3000 रुपये प्रति एकड़ की दर से 500 एकड़ से ज्यादा जमीन खरीदी।

पिछले कई दशकों में पीयू ने कई प्रख्यात हस्तियों को जन्म दिया है। इनमें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह (जिन्होंने यहां अर्थशास्त्र भी पढ़ाया), पूर्व प्रधानमंत्री आई.के. गुजराल, पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा, नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई और नोबेल पुरस्कार विजेता हरगोबिंद खुराना शामिल हैं। इस क्षेत्र के लगभग हर मुख्यमंत्री और उल्लेखनीय राजनेता का शैक्षणिक करियर पीयू से ही जुड़ा हुआ है।

वरिष्ठ वकील एमएल सरीन याद करते हैं कि 1960 के दशक के आखिर में पीयू हॉस्टल के कमरे को किसी अमीर घर के बेडरूम से भी ज्यादा शानदार माना जाता था। लेकिन विश्वविद्यालय का स्वर्णिम युग जल्द ही खत्म हो गया। 1966 में पंजाब के पुनर्गठन ने वित्तीय संकट को जन्म दिया। नए राज्य विश्वविद्यालयों ने अपने कॉलेजों की संबद्धता समाप्त कर दी और 2000 तक, पंजाब ने पीयू को दी जाने वाली वार्षिक धनराशि को 20 करोड़ रुपये पर स्थिर कर दिया, शेष राशि चंडीगढ़ (एक केंद्र शासित प्रदेश) द्वारा दी गई।

1976 में गठित एक पैनल ने पंजाब विश्वविद्यालय के वित्तपोषण के लिए केंद्र-पंजाब का 60:40 का अनुपात तय किया था, विश्वविद्यालय के घाटे को केंद्र के यूजीसी पर डालने के प्रयास विफल रहे।

एक संभावित समाधान तब सामने आया जब पूर्व छात्र मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री बनने के बाद पीयू को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा देने का प्रस्ताव रखा। भौतिक विज्ञानी प्रोफेसर अरुण ग्रोवर कहते हैं कि जहां अकाली मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल सहमत हो गए, वहीं कांग्रेस पार्टी के तत्कालीन नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह ने इस प्रस्ताव को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि विश्वविद्यालय पंजाब का हिस्सा है और रहना चाहिए।

पीयू अब एक अनाथ संस्थान बन गया – ग्रोवर

कानूनी विवाद के बाद, केंद्र सरकार ने पीयू के शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों के वेतन भुगतान का भार उठाने की पेशकश की। ग्रोवर अफसोस जताते हुए कहते हैं, “पीयू अब एक अनाथ संस्थान बन गया है।” आज विश्वविद्यालय अपनी जरूरत के लगभग आधे नियमित शिक्षकों के साथ किसी तरह चल रहा है।

विश्वविद्यालय की खराब वित्तीय स्थिति ने आखिरकार इस पर नियंत्रण के लिए एक जटिल संघर्ष का द्वार खोल दिया। 2025 में स्थिति तब और बिगड़ गई जब केंद्र ने विश्वविद्यालय के प्रशासन में व्यापक संरचनात्मक सुधारों का प्रस्ताव रखा, जिसमें सीनेट के सदस्यों की संख्या 90 से घटाकर 31 करना और स्नातकों के मतदान अधिकार छीन लेना शामिल था। केंद्र ने विश्वविद्यालय की निर्णय लेने वाली संस्था, निर्वाचित सिंडिकेट को भी अपने द्वारा नियुक्त सदस्यों से बदल दिया।

पंजाब सरकार ने ऐसे प्रस्तावों पर कड़ी आपत्ति जताई। आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने इस कदम को असंवैधानिक करार दिया। छात्रों और शिक्षकों ने पंजाब विश्वविद्यालय बचाओ मोर्चा के नेतृत्व में एकजुट होकर आंदोलन शुरू किया। इसके परिणामस्वरूप कैंपस ठप हो गया और परीक्षाएं स्थगित करनी पड़ीं। अंत में केंद्र सरकार ने अपना आदेश वापस ले लिया।

केंद्र और राज्य के बीच मतभेद

लेकिन केंद्र और राज्य के बीच मतभेद लगातार सामने आते रहते हैं। इस साल की शुरुआत में जब विश्वविद्यालय प्रशासन ने चुपचाप कैंपस के साइनबोर्ड से पंजाबी भाषा हटा दी, तो क्षेत्रीय छात्र समूह SATH (जिसका नाम ही पंजाबी में सामुदायिक सभा के लिए इस्तेमाल होता है) ने विरोध में बोर्ड पर कालिख पोत दी। विश्वविद्यालय ने अंततः पंजाबी भाषा को फिर से बहाल कर दिया।

कैंपस की राजनीति में भी इसी तरह की दरारें दिखाई देती हैं। पंजाब विश्वविद्यालय छात्र संगठन (SOPU) और पंजाब विश्वविद्यालय छात्र संघ (PUSU) जैसे पुराने छात्र संगठन फीके पड़ गए हैं और उनकी जगह एबीवीपी और एनएसयूआई जैसे राष्ट्रीय स्तर के दलों ने ले ली है, साथ ही आम आदमी पार्टी की स्टूडेंट विंग एसोसिएशन ऑफ स्टूडेंट्स फॉर अल्टरनेटिव पॉलिटिक्स भी सक्रिय हो गई है। वामपंथी दल एसएफएस के माध्यम से एक प्रहरी की भूमिका निभाते हैं, जिसने 2018 में पीयूसीएससी की पहली महिला अध्यक्ष कनुप्रिया को चुनकर इतिहास रच दिया था।

क्षेत्रीय पहचान की राजनीति स्थानीय छात्र संगठनों जैसे कि साथ और साखी को भी जन्म देती रहती है। साथ ने 2025 में छात्र संघ चुनाव में उपाध्यक्ष पद जीतने के बाद छात्र शिक्षा संस्थान में अपने शुभंकर जसवंत सिंह खालरा की एक विशाल तस्वीर फहराई।

छात्र राजनीति के इस परिदृश्य में पीयूसीएससी अध्यक्षीय चुनाव में एबीवीपी की लगातार दूसरी जीत को राज्य के राजनीतिक हलकों के एक वर्ग द्वारा विश्वविद्यालय में बीजेपी के उदय के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, इस बार एबीवीपी का एसओआई के साथ अंतिम समय में हुआ गठबंधन एक महत्वपूर्ण कारक बना रहा। तो इसका क्या अर्थ है जब एबीवीपी को एसओआई की आवश्यकता होती है और इसके विपरीत?

जब उनके विरोधी इस जीत को कमतर दिखाने की कोशिश कर रहे थे, तब एबीवीपी और एसओआई ने सबको साथ लेकर चलने की कोशिश की। उन्होंने कैंपस के मशहूर स्टूडेंट सेंटर में भारत माता की जय और उसके बाद “जो बोले सो निहाल” के नारे लगाए।

पंजाब के ग्रामीण इलाकों के युवा मतदाताओं पर पीयूसीएससी के नतीजों का क्या असर होगा, यह कहना मुश्किल है, खासकर तब जब सांसद अमृतपाल सिंह की अकाली दल (वारिस पंजाब दे) जैसे नए राजनीतिक दलों के कारण मुख्यधारा की पंथिक पार्टियों से मोहभंग और बढ़ रहा है। क्या एबीवीपी-एसओआई का गठबंधन बीजेपी और शिअद के बीच भी ऐसा ही गठबंधन बना पाएगा, यह एक अनसुलझा सवाल है।

यह भी पढ़ें: गैंगस्टर से नेता बने गुरप्रीत सिंह सेखों को AAP में मिलेगी एंट्री? 

पंजाब चुनाव से पहले सभी दल राज्य में खुद को मजबूत करने में लगे हैं। ‘सियासत पंजाब दी’ में बात करेंगे गुरप्रीत सिंह सेखों के बारे में, जिनके आम आदमी पार्टी में शामिल होने के कयास लगाए जा रहे हैं। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर …