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पाकिस्‍तानी हिंदुओं का दर्द: PAK में खेती करते थे, यहां पत्‍थर तोड़ते हैं; बंटवारा खत्‍म नहीं हुआ

साल 1947 में ब्रिटेन की गुलामी से आजादी मिलने के बाद 15 मिलियन (डेढ करोड़) से ज्यादा लोग भारत आए और महीनों तक चली हिंसा में कम से एक 10 लाख लोगों की मौत हुई।
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया।

बंटवारे के दौरान मुस्लिम पाकिस्तान में उत्पीड़न सह रहे लाखों लोगों ने भारत जाने का सपना देखा था। इन्हीं में एक है पाकिस्तानी से भारत आए जोगदास, लेकिन बॉर्डर के इस पार भी हकीकत उनके लिए किसी दर्द भरे सपने से कम नहीं है। बंटवारे के दौरान मानव इतिहास का सबसे बड़ा मास माइग्रेशन हुआ जो 70 साल बाद भी जारी है और बेहतर जीवन की चाहत लेकर पाकिस्तान से लोग अभी भारत आ रहे हैं। उस समय कई हजार लोगों को बॉर्डर के पास स्थित कैंपों में शिफ्ट किया गया लेकिन उन्हें काम करने का अधिकार नहीं दिया गया। उन्हीं में 81 साल के जोगदास भी शामिल हैं। जोगदास का कहना है कि यहां भारत में उनके पास न तो नौकरी है, ना घर, ना पैसा और ना खाना। वहां (पाकिस्तान) हम खेतों में काम करते थे। हम सब किसान थे। लेकिन यह हम जिंदगी जीने के लिए पत्थर तोड़ने को मजूबर है। जोधपुर कैंप में रह रहे जोगदास ने न्यूज एजेंसी एएफपी से कहा कि हमारे के लिए बंटवारा अभी भी खत्म नहीं हुआ। पाकिस्तान में रह रहे हिंदू अपने देश (भारत) आने की कोशिश कर रहे हैं और यहां हमारे लिए कुछ भी नहीं है।

साल 1947 में ब्रिटेन की गुलामी से आजादी मिलने के बाद 15 मिलियन (डेढ करोड़) से ज्यादा लोग भारत आए और महीनों तक चली हिंसा में कम से एक 10 लाख लोगों की मौत हुई। खूनी विवाद के बाद बने पाकिस्तान से हिंदू और सिखों ने पलायन किया जबकि मुसलमान पाकिस्तान में जाकर बसे। पलायन के बावजूद भी हिंदू पाकिस्तान में सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय है। पाकिस्तान में रह रहे हिंदुओं का कहना है कि उन्हें आए दिन भेदभाव यहां तक कि अगवा, रेप और जबरन शादी जैसी घटनाओं का सामना करना पड़ता है। जोगदास बताते हैं कि विभाजन के बाद से उत्पीड़न शुरू हो गया था। वहां पर एक दिन भी ऐसा नहीं जाता था जब हम शांति से जिंदगी गुजारे हो। मैं वापस आकर अपने हिंदू भाइयों के साथ रहना चाहता था।

ज्यादा प्रवासी पाकिस्तान के सिंध प्रांत से आए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक हकीकत में वह लोग अलग शिविरों में स्थानीय लोगों से दूर रहते हैं और प्रशासन द्वारा उन्हें संदेह की नजरों से देखा जाता है और बर्ताव किया जाता है। पीएम नरेंद्र मोदी की सरकार ने कहा कि वह भारत में शरण पाने के लिए आए लोग के लिए प्रकिया को आसान बनाने का विश्वास दिलाया। पिछले साल उन्होंने नियमों में परिवर्तन करते हुए केंद्र सरकार के माध्यम से जाने के बजाय आप्रवासियों को उस राज्य में नागरिकता के लिए आवेदन करने की इजाजत दी थी, जहां वह रह रहे हैं। पाकिस्तान से आए हिंदुओं ने सात वर्षों के बाद नागरिकता प्राप्त करने की प्रकिया में तेजी देखी। लेकिन नौकरशाही की ओर से विलंब का मतलब है कि इसे प्राप्त करने की प्रक्रिया को पूरा करने में अधिक समय लग सकता है।

64 साल के खनारामजी साल 1997 में पाकिस्तान से भारत आए और साल 2005 में उन्हें भारतीय नागरिकता मिली। उन्होंने कहा कि भारत में जीवन से मोहभंग होने के बहुत से लोगों ने सदस्यता की उम्मीद छोड़ दी और पाकिस्तान वापस चले गए। उन्होंने कहा, “सरकार की ओर से हमें कोई सहायता नहीं मिली. हम सिर्फ मवेशी की तरह है, जिसका कोई मालिक नहीं है। हम खुद से जीवित हैं। हमारे के लिए गरीबी से भी बदतर अधिकारियों द्वारा हम पर किया जाने वाला संदेह है।

 

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