कश्मीर घाटी के सुंदरता को देखने 64 वर्षीय दिलीप देसाले अपनी पत्नी उषा देसाले के साथ गए थे। वे हवाई यात्रा के जरिए जम्मू एयरपोर्ट पहुंचे। उषा देसाले की यह पहली हवाई यात्रा थी। अपने बच्चों के साथ दिलीप ने पत्नी उषा के खिड़की वाली सीट पर बैठने का पल, फ्लाइट, भोजन और श्रीनगर स्थित ठहरने वाले होटल की फोटो अपनी मोबाइल में खींची थी।
दिलीप की छोटी बेटी योगिता यादव ने कहा, “मेरे पिता को फोटो और वीडियो बनाने का काफी शौक था। जब 21 अप्रैल की रात को वे अपने होटल के कमरे में पहुंचे तो उन्होंने वीडियो कॉल पर हमें वह कमरा दिखाया। उन्होंने मंकी कैप पहनी हुई थी और पैरों में सिर्फ चप्पल थी। मैंने उनसे कहा कि ठंड से बचने के लिए मोजे पहन लें।” योगिता का थोड़ा भी अंदाजा नहीं था कि यह उनकी अपनी पिता से आखिरी बात होगी।
10 दिन की यात्रा पर थे दिलीप
दिलीप और उनकी पत्नी निसर्ग पर्यटन टूअर्स द्वारा आयोजित एक टूर के तहत जम्मू-कश्मीर की 10 दिवसीय यात्रा पर थे, 22 अप्रैल को पहलगाम पहुंचे। पीठ दर्द के कारण उषा ने वहीं रुकने का फैसला लिया, जबकि दिलीप घाटी में ऊपर चले गए, जहां आतंकियों ने पर्यटकों पर गोलीबारी शुरू कर दी।
जैसे ही हमले की खबर मिली, उनके तीनों बच्चे योगिता यादव, कविता सांकपाल और नितिन देसाले टीवी देखने लगे। फिर रात करीब 8 बजे कविता ने एक न्यूज चैनल पर अपने पिता को देखा। कुछ मिनट बाद नितिन की कॉल आई, जिसमें उसने पिता की मौत की खबर सुनाई। पहलगाम आतंकी हमले में मारे गए 26 लोगों में दिलीप भी शामिल थे।
हमारी सारी खुशियां चली गईं- कविता
घटना के एक साल बीत जाने के बाद भी देसाले परिवार अभी तक इस नुकसान को एक्सेप्ट नहीं कर सका है। कविता ने कहा, “मेरे पिता हमारे करीबी दोस्त थे। उस घटना के बाद हमारी सारी खुशियां चली गईं। वे परिवार का सहारा थे और अब ऐसा लगता है जैसे किसी ने उस सहारे को ही हमसे छीन लिया हो।”
दिलीप टर्भे में लुब्रिजोल प्राइवेट इंडिया लिमिटेड में इलेक्ट्रीशियन के तौर पर काम करते थे, उन्हें घूमने का काफी शौक था, लेकिन वे अपना शौक रिटायरमेंट के बाद शुरू कर सके। कविता ने कहा, “60 साल की उम्र में उनकी जिंदगी की तो बस शुरुआत ही हुई थी अपनी सारी जिम्मेदारियां पूरी करने के बाद उन्होंने घूमना शुरू किया और केरल व हिमाचल प्रदेश की यात्रा भी की थी। कश्मीर की यह उनकी दूसरी यात्रा थी क्योंकि मेरी मां भी वहां जाना चाहती थीं।”
उनकी हत्या के कुछ दिनों बाद सरकार ने दिलीप का सामान उनके परिवार के घर, न्यू पनवेल पहुंचा दिया। इस सामान में उनके रक्त से सने धूप के चश्मे और बैग, एक सोने की अंगूठी,कुछ नकदी और एक स्कार्फ था, जो उन्होंने बैसरन घाटी से अपनी पत्नी के लिए खरीदा था।
नहीं मिला अभी तक फोन
परिवार ने कहा, “लेकिन उनका फोन रेडमी नोट 11 प्रो अब भी नहीं मिला, उनके मोबाइल में दिलीप के आखिरी पलों की यादें हो सकती हैं।”
योगिता ने कहा, “हम जानते हैं कि उन्हें फोटो खींचना और वीडियो बनाना कितना पसंद था। घाटी जाते समय उन्होंने हमें घोड़े पर बैठे, एक खरगोश के साथ पोज देते हुए फोटो भेजी थी। एनआईए समेत कई सरकारी एजेंसियों से बार-बार संपर्क करने के बावजूद हमें उनके फोन के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली। हम बस उनकी आवाज सुनना चाहते हैं और उनके आखिरी पलों को देखना चाहते हैं, जो उस फोन में हो सकते हैं।”
दिलीप के छोटे बेटे नितिन ने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि टूर ऑपरेटरों की मूल योजना 22 अप्रैल को गुलमर्ग जाने की थी, लेकिन आखिरी मिनट में हुए बदलाव के कारण उनके माता-पिता गुलमर्ग के बजाय पहलगाम चले गए। नितिन ने कहा, “उस एक बदलाव ने हमारी जिंदगी को बदल दी। अगर टूर ऑपरेटरों ने अपनी योजना न बदली होती तो हमारे पिता हमारे साथ होते।”
नहीं मिली अभी तक नौकरी
परिवार ने कहा कि उन्हें असम और महाराष्ट्र की राज्य सरकारों सहित विभिन्न एजेंसियों से आर्थिक मुआवजा मिला है। लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने हमलों में मारे गए पीड़ित के परिजनों को सरकारी नौकरी देने का जो वादा किया था, वह अब तक नहीं मिल पाया है
नितिन ने कहा, “हमने अलीबाग में जिला कलेक्टर से बात है। कई बार हम मंत्रालय भी गए, ताकि हमें उस ‘क्लास-I’ सरकारी नौकरी के वादे के बारे में कोई जानकारी मिल सके। पर विभाग का कहना है कि उनके पास इस नौकरी के वादे से जुड़ी कोई नई जानकारी नहीं है।” परिवार ने कहा कि उनकी बकेट लिस्ट में नेपाल और यूरोप की यात्राएं भी थीं।
दिलीप के बेटे ने याद करते हुए कहा, पापा को जिंदगी से बेपनाह प्यार था। उन्हें कोई बीमारी नहीं थी और वे सेहतमंद थे। वे अपना अच्छे से ध्यान रखते थे। कश्मीर की यात्रा पर जाने से पहले भी मेरे पिता और मां ने दक्षिण मुंबई के बॉम्बे हॉस्पिटल में पूरे बॉडी की जांच कराई थी।
उषा पति की मौत के बाद से टूट गई
पति की मौत के बाद से उषा पूरी तरह टूट गई हैं। वह दिलीप के साथ रोजाना योग क्लास से लेकर बाजार में खरीदारी करने जाती थी। परिवार ने कहा, जब से पिता की मौत हुई है वह शांत हो गई हैं। उन्होंने लोगों से मिलना-जुलना और अपनी योग क्लास जाना भी बंद कर दिया है।
आँखों में आँसू लिए कविता ने कहा, “मेरे पिता सभी की मदद करते थे, 2005 में 27/7 की बाढ़ के दौरान उन्होंने पनवेल स्थित अपने घर के दरवाजे 27 ऐसे लोगों के लिए खोल दिए थे जो वहां फंस गए थे। उन्होंने लगभग 3-4 दिनों तक उन्हें अपने घर में पनाह दी, और फिर उनकी इतनी बेरहमी से जान ले ली गई। हमें आज भी नहीं पता, उनके आखिरी पलों में क्या हुआ था। ये सोच कर मेरी रातों की नींद उड़ जाती है।”
रविवार को अक्षय तृतीया के अवसर पर, उषा ने पति की याद में, न्यू पनवेल स्थित अपने पारिवारिक घर में एक विशेष पूजा की। इससे एक दिन पहले, परिवार ने हिंदू तिथि के मुताबिक उनकी पहली पुण्यतिथि पर एक शांति पूजा भी की थी।
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पहलगाम हमले को एक साल पूरा हो गया है। इस एक साल में जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा हालात और पर्यटन की स्थिति को लेकर क्या बदलाव आया, यह सवाल बना हुआ है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि में कितने आतंकवादी मारे गए, कितने नागरिक और सुरक्षा बल के जवानों की मौत हुई, और सैलानियों की संख्या में क्या बदलाव दर्ज किया गया, इसकी तस्वीर सामने आती है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
