जून, 1984 में भारतीय सेना ने खालिस्तान समर्थक जरनैल सिंह भिंडरांवाला और उसके समर्थकों को स्वर्ण मंदिर या गोल्डन टेंपल से बाहर निकालने के लिए ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया था। इसके दो साल बाद ही आखिर ऐसा क्या हुआ था कि नेशनल सिक्योरिटी ग्रुप (एनएसजी) और पंजाब पुलिस को ऑपरेशन ब्लैक थंडर करना पड़ा।
खालिस्तान बनाने का ऐलान
29 अप्रैल, 1986 को पांच सदस्यों वाली पंथक समिति ने भारत से अलग एक सिख राष्ट्र यानी खालिस्तान बनाए जाने का ऐलान किया। इससे पहले उन्होंने गोल्डन टेंपल में बैठक भी की। इस घोषणा के बाद ही गोल्डन टेंपल में छिपे अलगाववादियों और हथियारबंद उग्रवादियों को बाहर निकालने के लिए ऑपरेशन ब्लैक थंडर का पहला चरण शुरू किया गया।
इस ऑपरेशन में आर्मी की कोई सीधी भूमिका नहीं थी लेकिन सेना के दो शीर्ष अफसर- मेजर जनरल नरेश कुमार और मेजर जनरल पीपी मनकोटिया ने एनएसजी की टीमों का नेतृत्व किया था।
रमेश इंदर सिंह की किताब ‘Turmoil in Punjab’
पंजाब के पूर्व आईएएस अफसर रमेश इंदर सिंह ने इस ऑपरेशन के बारे में कई जानकारियां सामने रखी थीं। पंजाब में आतंकवाद के दौर में रमेश इंदर सिंह अमृतसर में डिप्टी कमिश्नर के पद पर तैनात थे। वह अपनी किताब ‘Turmoil in Punjab’ में लिखते हैं कि पंथक कमेटी के सदस्यों के द्वारा खालिस्तान बनाए जाने के ऐलान को तत्कालीन राज्य सरकार ने बेहद गंभीरता से लिया था।
ऐसा नहीं था कि खालिस्तान बनाए जाने का ऐलान पहली बार किया गया था। इससे पहले भी 12 जनवरी, 1984 को काउंसिल आफ खालिस्तान के स्वयंभू महासचिव बलबीर सिंह संधू ने गोल्डन टेंपल के गुरु नानक निवास से ऐसा ही ऐलान किया था। ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद भी खालिस्तान समर्थकों के द्वारा ऐसा ऐलान किए जाने की वजह से पंजाब की तत्कालीन राज्य सरकार वाकई चिंतित थी। सरकार को इस बात की चिंता थी कि ऐसे ऐलान से खालिस्तान की मांग को बढ़ावा मिल सकता है।
राजा सांसी एयरपोर्ट पर मिले सीएम-डीजीपी
29 और 30 अप्रैल की दरमियानी रात को ही तत्कालीन मुख्यमंत्री सुरजीत सिंह बरनाला, केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री अरुण सिंह, एनएसजी के महानिदेशक आरटी नागराणी, कांग्रेस उपाध्यक्ष अर्जुन सिंह और पंजाब के डीजीपी जेएफ रिबेरो अमृतसर के राजा सांसी एयरपोर्ट पर मिले।
रमेश इंदर सिंह अपनी किताब में लिखते हैं कि एयरपोर्ट में जो बैठक हुई, उसमें फैसला लिया गया कि आतंकवादियों को गिरफ्तार किया जाएगा और इसके लिए पुलिस को गोल्डन टेंपल के परिसर के अंदर भेजा जाना चाहिए। अमृतसर के तत्कालीन एसएसपी विर्क ने किसी कार्रवाई से पहले पुलिस और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) को तैयार करने के लिए 48 घंटे का वक्त मांगा।
सीएम बरनाला ने रखी शर्त
बैठक में फैसला लिया गया कि इस अभियान को एनएसजी और पुलिस बल मिलकर करेंगे। बैठक में पंजाब के मुख्यमंत्री बरनाला ने स्पष्ट रूप से कहा कि गोल्डन टेंपल के मुख्य गर्भगृह के अंदर कोई नहीं जाएगा और गोली भी नहीं चलाई जाएगी।
इस बात पर भी सहमति बनी कि न सिर्फ गोल्डन टेंपल बल्कि अमृतसर में स्थित गुरुद्वारा बाबा दीप सिंह और तरनतारन के एक ऐतिहासिक गुरुद्वारे से भी उग्रवादियों को बाहर निकाला जाएगा।
30 अप्रैल, 1986 को भारतीय वायु सेना के विमानों ने अमृतसर के लिए 14 उड़ानें भरी। उड़ानों के जरिए सीएपीएफ और एनएसजी के कमांडो को अमृतसर पहुंचाया गया। ऑपरेशन के पहले चरण में लगभग 300 एनएसजी कमांडो और सीएपीएफ के 1,200 जवानों को भी अमृतसर लाया गया।
रमेश इंदर सिंह बताते हैं कि एनएसजी को गोल्डन टेंपल के परिसर के मुख्य इलाके से उग्रवादियों को बाहर निकालने की जिम्मेदारी दी गई थी। इस मुख्य इलाके में लंगर हॉल, मंजी साहिब दीवान हॉल, रामगढ़िया बंगा, स्वर्ण मंदिर की परिक्रमा और अकाल तख्त साहिब शामिल थे। एनएसजी को गुरुद्वारा बाबा दीप सिंह, गुरु राम दास सराय, गुरु नानक निवास, तेजा सिंह समुंदरी हॉल और तरन तारन के गुरुद्वारे को भी खाली कराना था।
ब्रह्म बूटा अखाड़े की छत पर एनएसजी का कंट्रोल रूम बनाया गया था। कंट्रोल रूम में दोनों मेजर जनरल- नरेश कुमार और पीसी मनकोटिया, पंजाब के डीजीपी रिबेरो, आईजी ऑपरेशंस डीएस मंगत, जालंधर के डीआईजी पीसी डोगरा, सीआरपीएफ के डीआईजी सी. पॉल, अमृतसर के एसएसपी और उपायुक्त रमेश इंदर सिंह तैनात थे।
अमृतसर में लगा दिया गया था कर्फ्यू
ऑपरेशन शुरू करने से पहले अमृतसर में 30 अप्रैल को दोपहर 3 बजे कर्फ्यू लगा दिया गया और आसपास की इमारतों को खाली कराने के लिए शाम 5 बजे से ऑपरेशन शुरू किया गया। गोल्डन टेंपल के अंदर मौजूद श्रद्धालुओं से अपील की गई कि वे बाहर आ जाएं। लगभग 100 श्रद्धालु बाहर आ गए।
ऑपरेशन से ठीक पहले क्यों हुई बहस?
रमेश इंदर सिंह अपनी किताब में लिखते हैं कि एनएसजी को रात 12 बजे स्वर्ण मंदिर के अंदर जाना था लेकिन उससे पहले इस बात पर बहस शुरू हो गई कि अगर एनएसजी के जवानों पर गोलियां चलाई गईं तो वे भी इसका जवाब देंगे। रमेश इंदर सिंह के मुताबिक, सेना के अफसरों ने कहा कि अगर एनएसजी जवानों पर गोलियां चलाई गई तो वे भी जवाबी कार्रवाई में गोलियां चलाएंगे।
रमेश इंदर सिंह उस समय अमृतसर में डिप्टी कमिश्नर थे और उन्होंने सेना के अफसरों से कहा कि वह राज्य सरकार की ओर से एनएसजी की मांग को वापस ले रहे हैं। रमेश इंदर सिंह ने किताब में लिखा, “तुम सब अपना बोरिया-बिस्तर समेटो और जहां से आए हो वहीं वापस चले जाओ।” आखिरकार मुख्यमंत्री बरनाला के दखल के बाद ऑपरेशन शुरू हुआ।
आधी रात के आसपास यह ऑपरेशन शुरू हुआ। एनएसजी ने रात करीब 1:30 बजे तक स्वर्ण मंदिर परिसर के अधिकतर हिस्से को खाली करा लिया लेकिन गर्भगृह में छिपे उग्रवादी बाहर नहीं आए थे। सेना के अफसरों ने राज्य सरकार के अफसरों से कहा कि परिसर खाली कराने की जिम्मेदारी उनकी है न कि एनएसजी की। इसके बाद रमेश इंदर सिंह और एसएसपी एस. एस. विर्क खुद तैयार हुए।
दोनों ने लाउडस्पीकर से अपील की कि अंदर छिपे हुए लोग बाहर आ जाएं। कई घंटों बाद आखिरकार अंदर मौजूद लोगों ने 1 मई की सुबह आत्मसमर्पण कर दिया। रमेश इंदर सिंह के मुताबिक, इस ऑपरेशन में 55 उग्रवादी पकड़े गए।
इसके दो साल बाद, मई 1988 में ऑपरेशन ब्लैक थंडर-II हुआ। यह ऑपरेशन पहले चरण के मुकाबले बड़ा था और सुरक्षा बलों के लिए मुश्किल साबित हुआ।
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अमृतसर में 13 अप्रैल, 1978 को बैसाखी के दिन निरंकारियों और सिखों के बीच खूनी संघर्ष हुआ था। इस संघर्ष में सिख समुदाय के 13 लोगों की मौत हुई थी। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर।
