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2019: मोदी सरकार के घोषित 13 में से 2 एम्स के ही पूरे होने की उम्मीद

यूपीए के दौरान निर्मित 6 एम्स भी फैकल्टी के अभाव से जूझ रहे हैं और उनमें आवश्यक 1830 पदों में से 1330 पद अभी भी खाली हैं।

Author नई दिल्ली | March 6, 2017 3:40 AM
नर्स यूनियन की मांग है कि मौजूदा भत्ता बढ़ाकर 7,800 रूपये कर दिया जाए। साथ ही बीमारियों और संक्रमण से जोखिम के चलते अलग से भत्ता दिया जाए।

मोदी सरकार ने अपने लगभग तीन सालों की अवधि में 13 एम्स (अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान) बनाए जाने की घोषणा की है, लेकिन सरकार के शीर्ष सूत्रों का कहना है कि इनमें से केवल 2 एम्स ही 2019 तक शुरू हो पाएंगे। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारी के मुताबिक, नए एम्स की स्थापना में जो सबसे बड़ी चुनौती है वह है दक्ष फैकल्टी बहाल करने की। यूपीए के दौरान निर्मित 6 एम्स भी फैकल्टी के अभाव से जूझ रहे हैं और उनमें आवश्यक 1830 पदों में से 1330 पद अभी भी खाली हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि इस साल के बजट में झारखंड और गुजरात के लिए घोषित एम्स क्या महज राजनीतिक फैसला है?

दिल्ली एम्स की तर्ज पर अन्य शहरों में एम्स की स्थापना की योजना वाजपेयी सरकार की थी, उसे अमली-जामा पहनाया मनमोहन सिंह सरकार ने जिसने 10 सालों के दौरान दो फेज में 7 एम्स की घोषणा की जिनमें से 6 चालू हैं, जबकि सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली के लिए 2010 में घोषित एम्स का निर्माण राज्य सरकार द्वारा 2013 तक जमीन आबंटित नहीं किए जाने के कारण शुरू ही नहीं हो पाया और निर्माण लागत बढ़ गई। केंद्रीय कैबिनेट ने अब जाकर फैसला किया है कि 2010 में आबंटित 823 करोड़ रुपए से ही कुछ कम सुविधाओं के साथ निर्माण शुरू किया जाए।

घोषणाओं की दुगुनी रफ्तार

मोदी सरकार द्वारा एम्स घोषणा की अभी तक की रफ्तार, मनमोहन सरकार की तुलना में लगभग दुगुनी है और 2014 से अब तक तीन फेज में 13 एम्स घोषित हो चुके हैं। लेकिन, सूत्रों के मुताबिक, ‘ केवल नागपुर (महाराष्ट्र) और गुंटुर (आंध्र प्रदेश) एम्स ही 2019 में सरकार की अवधि पूरा होने तक चालू हो पाएंगे। एम्स का निर्माण काफी कुछ राज्य के सहयोग पर निर्भर करता है और इन दो सरकारों का रवैया सहयोगात्मक है’। हालांकि, सरकार के एक्शन प्लान के मुताबिक इन दोनों के अलावा कल्याणी (पश्चिम बंगाल) एम्स के ओपीडी को भी सितंबर 2018 तक चालू करना है।

दक्ष संकाय की बहाली बड़ी चुनौती

राज्य सरकारों का जो भी रवैया हो, मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक दो चरणों के एम्स की स्थापना में निर्माण कार्य एक बड़ी चुनौती थी तो अब के चरणों में सबसे बड़ी चुनौती है दक्ष फैकल्टी को बहाल करना। यूपीए के दौरान निर्मित 6 एम्स में ही 70 फीसद से ज्यादा पद खाली हैं। पिछले साल सरकार ने लगभग 1300 पदों के लिए विज्ञापन निकाला था जिसके लिए पांच गुणा आवेदन आए, पर केवल 203 लोग ही एम्स के उच्च मानक पर खरे उतरे। स्वास्थ्य मंत्रालय में संयुक्त सचिव सुनिल शर्मा ने कहा, ‘हमने उपरी उम्र सीमा संबंधी एम्स के नियमों में बदलाव कर इसे 50 साल से बढ़ा कर 58 साल कर दिया है और इस आधार पर चयन प्रक्रिया जारी है जिससे फैकल्टी की संख्या में अच्छी खासी बढ़ोतरी होगी।’ बकौल शर्मा नए एम्स की स्थापना के लिए जगह के चुनाव में फैकल्टी की सभी जरूरतों को ध्यान में रखा जा रहा है।

तो कराएंगे ज्ञान की घर वापसी!
स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारी के मुताबिक 2017 में फैकल्टी की कमी को दूर करने के लिए सरकार कई अहम फैसले ले सकती है जिसमें ‘रिवर्स ब्रेन ड्रेन’ एक है। इस पर सक्रिय रूप से विचार चल रहा है और कोशिश होगी कि भारत से डिग्री हासिल कर यूएस, यूके, आस्ट्रेलिया जैसे जगहों पर काम कर रहे डॉक्टर वापस देश आएं और एम्स से जुड़ें। हालांकि, एम्स के डॉक्टरों के लिए निर्धारित वेतनमान एक बड़ी बाधा हो सकती है। इसके साथ ही मंत्रालय भारतीय मूल के डॉक्टरों को भी आकर्षित करने की सोच रहा है, लेकिन इसके लिए एमसीआइ अधिनियम में संशोधन की जरूरत होगी क्योंकि अभी भारत से डिग्री हासिल करने वाले ही यहां मेडिकल प्रैक्टिस कर सकते हैं। इसके साथ ही दूसरे मेडिकल कॉलेजों से एम्स में या एम्स संस्थानों के बीच आपस में फैकल्टी की प्रतिनियुक्ति पर भी विचार चल रहा है और यह जल्द ही लागू हो सकता है।

 

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