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मोदी सरकार के एक साल और सवाल

मोदी सरकार का पहला साल गैरसरकारी संगठनों (एनजीओ) से तकरार का साल भी रहा। यह देश की पहली सरकार रही जिसने विदेशी चंदों के बाबत पारदर्शिता न बरतने और विदेशी चंदा कानून नियमन कानून...

Author Published on: May 25, 2015 10:27 AM

एनजीओ बनाम विदेशी चंदे पर ठनी

प्रियरंजन
मोदी सरकार का पहला साल गैरसरकारी संगठनों (एनजीओ) से तकरार का साल भी रहा। यह देश की पहली सरकार रही जिसने विदेशी चंदों के बाबत पारदर्शिता न बरतने और विदेशी चंदा कानून नियमन कानून (एफसीआरए) का पूर्ण पालन न करने के लिए नौ हजार से ज्यादा एनजीओ पर नकेल कस दिया। ज्यादातर के खाते सील कर दिए गए। विदेशी चंदे लेने पर पाबंदी लगा दी गई। यूपीए-2 के कार्यकाल में बने इस कानून का उल्लंघन करने वालों पर राजग-2 की नकेल ने देश में तूफान खड़ा कर दिया। संसद में सरकार ने चौंकाने वाले तथ्य पेश किए। गैरसरकारी संगठनों का एक दूसरा पहलू सामने आया। सरकार ने मजबूत आंकड़े व तर्क पेश किए। नतीजतन सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सरकार से ‘अच्छे और बुरे एनजीओ’ में फर्क करने और सबके साथ एक जैसा बरताव न करने की अपील की।

गंगा के घाट से सीमा पार तक हर काम में जनसहभागिता का दम भरने वाली मोदी सरकार ने यह कदम क्यों उठाया? संसद में गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू के बयान के मुताबिक, 164 देशों से 11,838 करोड़ रुपए एक साल में गैर सरकारी संगठनों के पास आए। संगठनों ने या तो इसका जिक्र आयकर रिटर्न में नहीं किया या फिर अपने घोषित कार्यक्षेत्रों से इतर धन खर्च किया। गृह मंत्रालय ने 30 हजार से ज्यादा एनजीओ को एफसीआरए कानून के उल्लघंन के आरोप में नोटिस जारी किए। नौ हजार से ज्यादा एनजीओ पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। कई गैर सरकारी संगठनों का नाम लेकर सरकार ने संसद में लिखित तौर पर दावा किया है कि खुफिया एजंसियों से उनके खिलाफ ‘विपरीत रपटें’ मिली हैं।

तथ्य यह भी है कि कई संगठनों जैसे वर्ल्ड विजन (चेन्नई) को दो साल में 442.68 करोड़ रुपए विदेशों से मिले। उसी तरह आक्सफॉम को 71 करोड़, बाल रक्षा भारत को 69 करोड़ मिले। दावा ऐसे सैकड़ों संगठनों का है जिन्होंने विदेशी चंदों का जिक्र तक आयकर रिटर्न में नहीं किया। सबसे ज्यादा पैसे अमेरिका से आए। दूसरे नंबर पर ब्रिटेन फिर जर्मनी दानदाता रहे। देश में हर साल करीब दस हजार करोड़ विदेशी चंदा गैर सरकार संगठनों के खाते में आ रहे हैं। राजनीतिक दलों या लाभ कमाने वाले संगठनों को चंदा देने के आरोप में सरकार ने फोर्ड फाउंडेशन को निगरानी सूची में रखा।

सरकार के शिकंजे के खिलाफ गैरसरकारी संगठन लामबंद हैं। कुछ लोग अदालत की दहलीज पर हैं। करीब पौने दौ सौ संगठनों ने आठ मई को दिल्ली में मोदी सरकार के खिलाफ ‘खुला पत्र’ जारी किया। कई संगठनों ने एलान किया कि वे मोदी सरकार की नीतियों की पोल खोलने के लिए एक महीने तक देश भर में कार्यक्रम करेंगे। कुल मिलाकर इस समय समूचे देश में ‘सरकार बनाम एनजीओ’ का माहौल खड़ा हो चुका है। गैरसरकारी संगठनों का आरोप है कि उन्होंने मोदी सरकार की नीतियों मसलन भूमि अधिग्रहण बिल, सामाजिक सरोकारों (मनरेगा, शिक्षा, स्वास्थ, आदि) वाले मदों में कटौती के खिलाफ सड़क से संसद तक के खिलाफ संघर्ष किया, इसलिए सरकार नाराज है। सरकार इसे एफसीआरए की धारा-तीन की उपधारा 5 (1) का उल्लंघन मान बैठी है क्योंकि यह धारा राजनीतिक क्रियाकलापों पर विदेशी चंदे का उपयोग करना निषेध करती है।

ग्रीनपीस ने कहा है कि उसके खाते नहीं खोले गए तो वह अपने कर्मचारियों को वेतन नहीं दे पाएगी। भारत जैसे प्रजातंत्रिक देश में सरकार और संगठन दोनों की साख दांव पर है। सरकार से ‘अच्छे व बुरे एनजीओ’ में फर्क की मांग हो रही है। एफसीआरए कानून में 24 धाराएं और 90 से ज्यादा उपधाराए हैं, बेहतर होता कि सरकार अपराध के अनुरूप सजा का प्रवधान करती। कानून का उल्लंघन करने वालों के साथ सरकार सख्ती से निपटे। साथ ही खुफिया एजंसियों से उनके खिलाफ जो ‘विपरीत रपटें’ मिली हैं उनका खुलासा करे।

सरकार के रडार पर 30 हजार संगठन
संसद में सरकार ने कहा कि एक साल में 164 देशों से 11,838 करोड़ रुपए गैर सरकारी संगठनों के पास आए। संगठनों ने या तो इसका जिक्र आयकर रिटर्न में नहीं किया या फिर अपने घोषित कार्यक्षेत्रों से इतर धन खर्च किया। गृह मंत्रालय ने 30 हजार से ज्यादा एनजीओ को एफसीआरए कानून के उल्लघंन के आरोप में नोटिस जारी किए। नौ हजार से ज्यादा एनजीओ पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। कई गैर सरकारी संगठनों का नाम लेकर सरकार ने संसद में लिखित तौर पर दावा किया है कि खुफिया एजंसियों से उनके खिलाफ ‘विपरीत रपटें’ मिली हैं।
नीतियों की मुखालफत का खमियाजा
सरकार के शिकंजे के खिलाफ गैरसरकारी संगठन लामबंद हैं। कुछ अदालत की दहलीज पर हैं। गैरसरकारी संगठनों का आरोप है कि उन्होंने मोदी सरकार की नीतियों मसलन भूमि अधिग्रहण बिल, सामाजिक सरोकारों (मनरेगा, शिक्षा, स्वास्थ, आदि) वाले मदों में कटौती के खिलाफ सड़क से संसद तक के खिलाफ संघर्ष किया, इसलिए सरकार नाराज है। ग्रीनपीस ने कहा है कि उसके खाते नहीं खोले गए तो वह अपने कर्मचारियों को वेतन नहीं दे पाएगी।
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विदेश दौरों पर विवाद के बाद अब परिणाम पर नजर

अनिल बंसल
नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो अमेरिका ने उन्हें वीजा देने से इनकार कर दिया था। वे वहां रहने वाले गुजरातियों के बुलावे पर जाना चाहते थे। यह 2007 की बात है। उसी अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा मोदी के चमत्कारी व्यक्तित्व से पिछले साल सितंबर में इस कदर अभिभूत हो गए कि उन्हें ‘मैन आॅफ एक्शन’ कहा। अमेरिकी पत्रिका ‘टाइम’ के कवर पर मोदी की तस्वीर छपने को भी भाजपा नेता एक उपलिब्ध मान रहे हैं। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने अपनी विदेश यात्राओं से ऐसा माहौल बनाया कि विरोधी त्रस्त हो उठे।

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने तो 29 अप्रैल को लोकसभा में कटाक्ष करते हुए यहां तक कह दिया कि मोदीजी का हिंदुस्तान का टूर लगा है। कांग्रेस के दूसरे नेता आनंद शर्मा ने प्रवासी प्रधानमंत्री बता कर उनका मजाक उड़ाया। पर भाजपा के नेताओं ने ऐसी आलोचनाओं को कांग्रेसी नेताओं की कुंठा कह कर खारिज कर दिया। मोदी के मंत्री रविशंकर प्रसाद बोले-यूपीए शासन में हमारे पड़ोसी देशों तक से रिश्ते खराब थे। मोदी ने न केवल देश के बाहर रह रहे भारतीयों का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया बल्कि अपनी कुशल रणनीति, वाकपटुता और सक्रियता से जहां गए वहीं अपनी लोकप्रियता का लोहा मनवाया।

मोदी ने पड़ोसियों से बेहतर रिश्तों की अपनी प्राथमिकता तो अपने शपथ ग्रहण समारोह में सार्क देशों के सत्तारूढ़ नेताओं को बुलाकर ही साबित कर दी थी। अपने दस साल के कार्यकाल में मनमोहन सिंह ने सबसे ज्यादा यात्राएं अमेरिका की कीं। वे दस बार वहां गए। लेकिन अमेरिका परस्त दिखते हुए भी मोदी ने विदेश यात्रा का पहला कार्यक्रम छोटे पर अहम पड़ोसी देश भूटान का बनाया। वही भूटान, जो भारत से नाराजगी के कारण अतीत में उल्फा के आतंकवादियों का प्रशिक्षण स्थल बन गया था। मोदी ने सामरिक नजरिए से अहम भूटान के लोगों का दिल जीत लिया।

भूटान के बाद मोदी ब्राजील, नेपाल, जापान, अमेरिका, म्यामां, ऑस्ट्रेलिया, फिजी, सेशेल्स, मारीशस, श्रीलंका, सिंगापुर, फ्रांस, जर्मनी और कनाडा गए। उनकी पिछली यात्रा चीन से शुरू होकर बरास्ता मंगोलिया दक्षिण कोरिया में पूरी हुई। कुल मिलाकर एक साल में उन्होंने 45 दिन ही अपनी इन यात्राओं पर खर्च किए होंगे। लेकिन विरोधियों को हजम नहीं हुआ। भाजपा के राष्ट्रीय सचिव अरुण सिंह की मानें तो मोदी ने सारी दुनिया में भारत का गौरव बढ़ाया है। अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका और आस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ जहां अहम व्यापारिक समझौते किए वहीं पड़ोसी देशों नेपाल, भूटान और श्रीलंका जाकर भारत के प्रति उनके नजरिए को बदला। नेपाल में आए भूकम्प के बाद जिस तरह भारतीय सेना ने वहां बचाव और राहत के काम को अंजाम दिया उससे भी मोदी की साख और धाक बढ़ी है।

विदेश नीति के मोर्चे पर अगर अभी मोदी पूरी तरह सफल नहीं हो पाए हैं तो भी उन्होंने सकारात्मक, कारगर और ठोस प्रयास तो किए हैं। बांग्लादेश के साथ दशकों पुराने सीमा विवाद को सर्वदलीय सहमति के बाद सुलझाने में वे सफल हुए हैं और इसे उनके विरोधी भी उनकी उपलब्धि मानेंगे। भले इस दिशा में प्रयास यूपीए सरकार के वक्त ही शुरू हो गए थे।

मोदी जानते हैं कि भारत में पर्यटन उद्योग की पर्याप्त संभावनाएं हैं। मेक इन इंडिया के तहत विदेशी निवेश को जुटाना तो उनकी प्राथमिकता है ही, विदेश में रह रहे भारतीयों को भी वे भारत में निवेश के लिए आकर्षित करने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं। चीन जाकर उन्होंने वहां के निवासियों के लिए जिस तरह आन एराइवल वीजा की सुविधा का एलान किया, उससे साफ संकेत मिलता है कि सीमा विवाद अपनी जगह है पर आर्थिक विकास का सवाल हो तो उनके लिए कोई अछूत नहीं। हां, उनके दौरों पर विवाद खूब हुए हैं और अब इनके परिणामों पर नजर है।
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किसानों के लिए कौड़ी भी नहीं

शीशपाल सिंह
उत्तर प्रदेश में पिछले एक साल के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का रुतबा घटा है। इसका कारण मौसम की मार से बर्बाद किसानों पर सरकार की चुप्पी साधना है। केंद्र के मंत्री अच्छी बातों के अलावा कोई ठोस पहल नहीं कर पाए।

पिछले एक साल के दौरान प्रदेश के लोगों की मोदी ने कोई सुध नहीं ली है। हर सांसद को एक गांव के विकास की जिम्मेदारी देना भी कागजों पर चल रहा है। इसके लिए सांसदों को दो से ढाई करोड़ रुपए की पहली किस्त दे दी गई है। लेकिन गांवों में एक रुपया भी नहीं लगाया गया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर आजमगढ़ तक के किसान मोदी को ‘हवाई नेता’ कहने लगे हैं।

फसलों की तबाही के बाद सैकड़ों किसानों के पास खुदकुशी के अलावा कोई रास्ता नहीं दिखा। लेकिन मोदी ने मुआवजा तो दूर सहानुभूति के दो बोल भी नहीं बोले। पिछले लोकसभा चुनाव में नौजवान से लेकर बूढ़े और महिलाओं की जुबान पर मोदी का नाम था। लेकिन देश का सबसे बड़े लोकसभा सीट और जनसंख्या वाले उत्तर प्रदेश के किसान मोदी सरकार से निराश हैं।

भूमि अधिग्रहण अध्यादेश किसानों की नाराजगी का बड़ा कारण है। इसके खिलाफ कई जगह किसान आंदोलन चल रहे हैं। उत्तर प्रदेश सरकार का कहना है कि कुछ किसानों को जो मुआवजा राशि दी गई है उसमें केंद्र ने एक कौड़ी भी नहीं दी है। प्रदेश सरकार ने यह राशि अपने बलबूते पर दी। वैसे भी एक जिले के तीन या चार गांवों के किसानों को ही मुआवजा मिला है। बाकी बचे बेबस किसान मोदी सरकार को सबसे ज्यादा कोस रहे हैं।

कुछ किसानों का कहना है कि मोदी से बेहतर तो अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी, जिसने प्रदेश के लोगों की सुनी और समस्याओं का समाधान कराया।
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केंद्र-राज्य की फिसड्डी जोड़ी

राजीव जैन
मोदी सरकार का पहला साल राजस्थान की जनता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा है। राज्य की कई योजनाओं में केंद्र से मदद नहीं मिलने से वसुंधरा सरकार को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। बेमौसम बारिश से किसानों की फसल खराब होने के बाद अभी तक उन्हें मुआवजा राशि नहीं मिलने और भूमि अधिग्रहण कानून के कारण केंद्र सरकार की छवि को इस पहले साल में खासा धक्का पहुंचा है।

किसानों की खुदकुशी के मामलों ने हालात बदतर किए। अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगती सड़कों की जर्जर हालत सुधारने के लिए राज्य ने केंद्र से 352 करोड़ रुपए की मदद मांगी है। इस पर भी केंद्र के टालमटोल से भाजपा सरकार में बैचेनी है। अब भाजपा के विधायक भी ‘अच्छे दिनों’ को लेकर बागी तेवर अपना रहे हैं।

विधानसभा के बजट सत्र में जोधपुर के तीन विधायकों ने तो सरकार के कामकाज पर सीधे सवाल उठाए। मोदी सरकार में प्रदेश से तीन राज्यमंत्री होने के बावजूद केंद्रीय मदद के मामले में राजस्थान की लगातार अनदेखी होना खासा अखर रहा है। राजस्थान कैडर के आइएएस अफसरों की केंद्र में अहम पदों पर तैनाती होने के बावजूद प्रदेश को कई मामलों में गुहार ही लगानी पड़ रही है।
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कमजोर पड़ रही गठबंधन की गांठ

गणेश नंदन तिवारी
केंद्र की भाजपा नीत सरकार में महाराष्ट्र के चार दल शामिल हैं। 18 सांसदों वाली शिवसेना, एक-एक सांसद वाला राष्ट्रीय समाज पक्ष और स्वाभिमानी पक्ष व रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया (आरपीआइ), जिसने लोकसभा चुनाव में कोई सीट नहीं जीती मगर दलित मतों को भाजपा के पाले में डालने में अहम भूमिका निभाई। सरकार ने इन दलों की जमकर उपेक्षा की है। एक साल बाद शिवसेना समेत ये सभी छोटे दल सरकार के तौर-तरीकों से खुश नहीं हैं। शिवसेना जैतापुर परमाणु संयंत्र और भूमि अधिग्रहण विधेयक को लेकर केंद्र सरकार का खुला विरोध कर रही है।
आरपीआइ सत्ता में भागीदारी नहीं मिलने से नाराज है और गोहत्या प्रतिबंधक कानून के खिलाफ है। स्वाभिमानी पक्ष के राजू शेट्टी आरोप लगा रहे हैं कि पवार एंड कंपनी ने सहकारी चीनी मिलों, सहकारी बैंकों आदि को खोखला कर दिया है और भाजपा उन्हीं शरद पवार के साथ खड़ी है। ये छोटे दल एक होकर भाजपा छोड़ने की धमकी भी दे चुके हैं। एक साल में केंद्र सरकार के करिश्मे इस सूबे की जनता ने दो बार देखे।

पहली बार तो केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने संसद में बताया कि महाराष्ट्र में इस साल तीन किसानों ने आत्महत्या की है। जबकि सूखे और बेमौसम बरसात से 600 किसान आत्महत्या कर चुके थे। दूसरी बार फिर केंद्रीय कृषि मंत्री ने ही जानकारी दी कि बरसात से हुई तबाही के लिए महाराष्ट्र सरकार ने केंद्रीय आपदा प्रबंधन कोष से कोई मदद नहीं मांगी है, जबकि सूबे के मुख्यमंत्री ने इसे गलत बताया। एलबीटी नहीं हटने से व्यापारियों में अविश्वास है। सत्ता में भागीदारी नहीं मिलने से दलित उखड़े हुए हैं तो मुसलिम आरक्षण के बेमौत मरने के बाद मुसलमानों को भरोसा नहीं है।

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सिकुड़ते सामाजिक सरोकार

प्रतिभा शुक्ल
मोदी सरकार के कई फैसलों से घोषणापत्र के गरीब हिमायती वादे के उलट कॉरपोरेट क्षेत्र को तवज्जो देने वाली तस्वीर ही उभर रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला व बाल कल्याण सहित सरकार की सामाजिक जिम्मेदारियों में कई स्तर पर बड़ी कटौती की। स्वामीनाथन समिति की सिफारिशों पर तो सरकार ने सुप्रीम कोर्ट तक में हलफनामा देकर उस पर अमल में असमर्थता जता कर पल्ला झाड़ लिया।

भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता धर्मेंद्र के मुताबिक, किसानों को लागत में 50 फीसद मुनाफा जोड़ कर लाभकारी मूल्य देने के वादे के उलट सरकार ने रबी की फसलों में जो समर्थन मूल्य (गेहूं व चावल पर 40-50 रुपए की बढ़ोतरी) दिए वह परंपरागत रूप से मिल ही रहा था। राज्यों को भी किसानों को बोनस देने से मना कर दिया। कहा गया कि जो राज्य बोनस देंगे वे खरीद खुद करेंगे, भारतीय खाद्य निगम उनकी खरीद नहीं करेगा। सरकार के निराशाजनक रुख से एक साल में 6000 किसानों ने आत्महत्या कर ली।

अलायंस फॉर सस्टेनेबल एंड होलिस्टिक एग्रीकल्चर की संयोजक कविता कुरुगंटी के मुताबिक, रमेश चंद्र समिति की शिफारिशें लटकी पड़ी हैं। जीएम फसलों पर सरकार की घोषणा से ठीक उलट रुख हैरान करने वाले हैं। भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ किसान लामबंद हैं। जैविक खेती निगम अभी तक नहीं बना। खेत बीमा पायलट परियोजना के तौर पर शुरू किया गया है।

पंचायती राज मंत्रालय के बजट में डेढ़ हजार करोड़ की कटौती सत्ता के विकेंद्रीकरणके दावे के उलट है। कुल बजट 94 हजार करोड़ कर दिया। महिला व बाल विकास मंत्रालय के बजट में 30 फीसद कमी कर दी गई। सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की निदेशक डाक्टर रंजना कुमारी ने ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ योजना को अच्छा कदम बताया है। इसके लिए सौ करोड़ का बजट दिया है। महिला आरक्षण व आर्थिक विकास पर सरकार वादे के उलट चुप है।

निर्मल गंगा के लिए खास पहल करते हुए 20 हजार करोड़ का बजट तो दिया पर गंगा में पानी कहां से आएगा इस पर सरकार न केवल मौन है बल्कि गंगा के और दोहन के लिए बंद पड़ी तमाम घातक बांध परियोजनाओं को फिर से शुरू करने की कोशिश कर रही है। रीवर फ्रंट डेवलपमेंट योजना में हर 100 किलोमीटर पर बांध बनाने का प्रस्ताव है। सबको सस्ता व सुलभ स्वास्थ्य सेवा देने के वादे के उलट स्वास्थ्य बजट में 15 फीसद की कटौती की गई। तमाम राष्ट्रीय योजनाओं को राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में डाल दिया। लेकिन इसके लिए पैसा नहीं दिया। नतीजा सभी योजनाएं बंद पड़ी हैं। बच्चों के टीकाकरण के लिए ‘इंद्रधनुष योजना’ में नया कुछ नहीं है।

विदेशी पूंजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए पर्यावरण मंत्रालय के कई प्रावधानों में बदलाव किए गए ताकि उनके अनुकूल माहौल बने। लिहाजा आदिवासी कल्याण मंत्रालय की योजनाएं अधर में हैं। गरीबों के लिए जनधन योजना शुरू हुई पर 70 फीसद खाते खाली पड़े हैं। शिक्षा के बजट में 16 फीसद की कटौती हुई। कार्ययोजना का भारी अभाव लगभग हर क्षेत्र में नजर आ रहा है।
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सत्ता की बिसात पर संघ और सरकार

नरेंद्र भंडारी
नरेंद्र मोदी की सरकार और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बीच पिछले एक साल से शतरंज की बिसात बिछी हुई है। दोनों अपनी-अपनी मनवाने के लिए पासे फेंकते रहते हैं। साल 2014 के आम चुनाव से पहले जब देश में कांग्रेस के विरोध में लहर उठी तो उस समय संघ को अहसास हुआ कि अभी नहीं, तो कभी नहीं। इसे ध्यान में रखकर संघ ने युवा कार्ड खेला। मकसद था भाजपा के बुजुर्ग नेताओं को किनारे लगाना। उसकी पहली पसंद गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी थे। संघ ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाया।

प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद मोदी की राह में सबसे पहले संघ आया। उन्हें इस पद तक ले जाने वाले संघ का खास एजंडा था। मोदी संघ को समझाने में सफल रहे कि पहले विकास के एजंडे को आगे बढ़ाएं। मोदी के विकास के नारे संघ से जुड़ी संस्थाओं को नागवार गुजर रहे। भाजपा खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के हक में आ गई है। स्वदेशी जागरण मंच इसका विरोध कर रहा है। मोदी ने इस मामले में विकास एजंडे का हवाला दे संघ को मना लिया। वहीं, किसान संघ ने भूमि अधिग्रहण अध्यादेश का विरोध किया तो संघ की दखलंदाजी से इस बिल के कुछ हिस्सों को मोदी सरकार को बदलना पड़ा।

रामजन्म भूमि मुद्दे पर संघ समर्थित इंद्रप्रस्थ विश्व हिंदू परिषद से जुड़े नेता प्रवीण तोगड़िया फिर से आंदोलन शुरू करने वाले थे। यह सरकार की छवि पर भारी पड़ता। मोदी के दूत फिर संघ अधिकारियों के दर पर गए और विकास के मुद्दे की हरी झंडी दिखा कर अपनी सरकार की गाड़ी आगे बढ़ाई। संघ और सरकार के बीच पिछले एक साल से यह झुकने और झुकाने का खेल चल रहा है।

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