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एक देश, एक चुनाव: पूर्ण सहमति से ही बनेगी बात

कुछ राजनीतिक पार्टियां इसके पक्ष में हैं। ज्यादातर राजनीतिक दलों ने इसका विरोध किया है। तय है कि जब तक इस पर पूर्ण सहमति नहीं बनती, इसे धरातल पर उतारना मुश्किल होगा।

Author June 25, 2019 3:29 AM
कुछ सरकारें अपना कार्यकाल खत्म होने से पहले गिर गईं।

दीपक रस्तोगी

कुछ समय से केंद्र सरकार ने लोकसभा और राज्यों की विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने के लिए अनुकूल माहौल तैयार करने की कोशिश शुरू की है। हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह प्रस्ताव रखा। उन्होंने सर्वदलीय बैठक में इस पर चर्चा की। संसद के बजट सत्र में राष्ट्रपति के अभिभाषण में भी यह मुद्दा प्रमुखता से छाया रहा। इस मुद्दे पर चुनाव आयोग, नीति आयोग, विधि आयोग और संविधान समीक्षा आयोग आपस में बातचीत कर चुके हैं। कुछ राजनीतिक पार्टियां इसके पक्ष में हैं। ज्यादातर राजनीतिक दलों ने इसका विरोध किया है। तय है कि जब तक इस पर पूर्ण सहमति नहीं बनती, इसे धरातल पर उतारना मुश्किल होगा।

क्या है प्रस्ताव
एक राष्ट्र, एक चुनाव की योजना के तहत देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाने का प्रस्ताव है। इसके तहत पूरे देश में पांच साल में एक बार ही चुनाव होगा। सरकार की दलील है कि इससे न सिर्फ समय की बचत होगी, बल्कि देश को भारी आर्थिक बोझ से भी राहत मिलेगी। वर्ष 2003 में भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि सरकार लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाने पर विचार कर रही है। उस समय भी केंद्र में भाजपा ही सत्ता में थी। अब नरेंद्र मोदी की सरकार ने इस मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक में प्रस्ताव रखा है। साथ ही, सरकारी एजंसियों ने इस प्रस्ताव की दिशा में काम करना शुरू कर दिया।

एक साथ चुनाव का चक्र
आजादी के बाद शुरुआती वर्षों में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होते थे। हालांकि, इसके लिए कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं थी। 1952 के पहले आम चुनाव के साथ ही राज्यों की विधानसभा के लिए भी चुनाव हुए थे। तकरीबन 15 साल तक विधानसभाओं के चुनाव लोकसभा चुनावों के साथ चले, लेकिन बाद में यह चक्र गड़बड़ा गया। कुछ राज्यों में राजनीतिक अस्थिरता की वजह से कुछ सरकारें अपना कार्यकाल खत्म होने से पहले गिर गईं। 1951-52, 1957, 1962 और 1967 में राज्य विधानसभा चुनावों का आयोजन लोकसभा चुनाव के साथ ही हुआ था।

पक्ष में दलीलें
बार-बार आदर्श आचार संहिता लागू नहीं करनी पड़ेगी। नीतिगत फैसले लिए जा सकेंगे। विकास कार्य प्रभावित नहीं होंगे। नए परियोजनाओं की घोषणा कम समय के लिए ही रुकेगी। भारी चुनावी खर्च में कमी आएगी। सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा। काला धन और भ्रष्टाचार पर रोक लगाने में मदद मिलेगी, क्योंकि चुनाव के दौरान कालेधन का इस्तेमाल खुलेआम होता है। सरकारी कर्मचारियों और सुरक्षा बलों को बार-बार चुनावी ड्यूटी पर लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। कई देशों में एक साथ चुनाव होते हैं। स्वीडन में पिछले साल सितंबर में आम चुनाव, काउंटी और नगर निगम के चुनाव एकसाथ कराए गए थे। इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका, जर्मनी, स्पेन, हंगरी, स्लोवेनिया, अल्बानिया, पोलैंड, बेल्जियम भी एक बार चुनाव कराने की परंपरा है।

विरोध में तर्क
संविधान में लोकसभा और विधानसभा चुनावों को लेकर पांच साल की अवधि तय है। संविधान में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने को लेकर कोई निश्चित प्रावधान नहीं है। एक साथ चुनाव मूल भावना के खिलाफ है। एक देश एक चुनाव खुद में महंगी प्रक्रिया है। विधि आयोग की माने तो 4,500 करोड़ रुपए के नए ईवीएम 2019 में ही खरीदने पड़ते अगर एक साथ चुनाव होते। 2024 में एकसाथ चुनाव कराने के लिए 1751.17 करोड़ रुपए सिर्फ ईवीएम पर खर्च करने पड़ेंगे। केंद्र सरकार के पास राज्य सरकारों को धारा 356 के तहत भंग करने का अधिकार है। इस अधिकार के होते हुए एक साथ चुनाव नहीं कराए जा सकते। चुनाव एक साथ कराने पर कुछ विधानसभाओं के कार्यकाल को बढ़ाया या घटाया जाएगा।

विधि आयोग के सुझाव
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने विधि आयोग को एक साथ चुनाव कराने के समर्थन में पत्र लिखा था। उन्होंने लगातार चुनावों पर खर्च के बोझ की दलील दी थी। उसके बाद अगस्त 2018 में विधि आयोग ने एक ड्राफ्ट रिपोर्ट तैयार की, लेकिन जम्मू कश्मीर को इससे बाहर रखा। विधि आयोग ने इसे अमली जामा पहनाने के लिए एक जटिल कानूनी ढांचे की जरूरत बताई है। विधि आयोग ने लोकसभा और विधानसभा के कार्यकाल वाले संविधान के अनुच्छेद 83(2) और अनुच्छेद 172(1) में संशोधन और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम लाने का सुझाव दिया था।

विधायिकाओं का कार्यकाल निर्धारित करने के लिए संविधान में संशोधन किए बिना इसे अमल में नहीं लाया जा सकता। जब तक सदन का कार्यकाल तय नहीं होगा, इसे लागू करना संभव नहीं है।
-टीएस कृष्णमूर्ति, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त

इस विचार को लागू करने के लिए संविधान संशोधन करना चाहिए। लेकिन क्या निकट भविष्य में इसे लागू किया जा सकता है? इस सवाल पर मेरा जवाब होगा- मुश्किल है।
– ओपी रावत, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त

यह अवधारणा अव्यवहारिक है। इसके जरिए लोगों के जनादेश को तोडाÞ-मरोड़ा जा सकता है। भाजपा एक राष्ट्र-एक संस्कृति-एक राष्ट्र-एक भाषा लागू करना चाहती है। यह प्रस्ताव अगली कड़ी है।
– डी राजा, नेता, भाकपा

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