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श्रावण मास का पर्व एक, पर नाम हैं तीन

रक्षा के बांधने को ही रक्षा-बंधन कहते हैं। पुराने जमाने में यह कार्य पुरोहित करते थे। वे ऋग्वेद के रक्षोघ्न-सूक्त से अपने यजमान के राखी बांधते थे। पर अब प्राय: सर्वत्र बहन ही भाई की कलाई पर राखी बांध देती है।

सावन मास पर रक्षा का पर्व रक्षा बंधन समाज की उन्नति और समृद्धि का प्रतीक है।

शास्त्री कोसलेंद्रदास
प्रत्येक वर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा का आना पारंपरिक चेतना को जागृत करता है। इस दिन से जुड़ा इतिहास उतना ही सुदीर्घ है, जितना वैदिक सनातन धर्म। श्रावण पूर्णिमा को मनाया जाने वाला श्रावणी पर्व संवत्सर का सबसे पहला है। वैदिक काल से लेकर आज तक चले आ रहे चार पर्वों में इसकी महिमा सबसे अनूठी है। ये चार पर्व हैं – रक्षाबंधन, दशहरा, दीपावली और होली। आज श्रावण की पूर्णिमा पर आने वाले पर्व के तीन नाम हैं- श्रावणी, रक्षाबंधन और संस्कृत दिवस। इस नाते पुरातन काल से चले आ रहे इस पर्व का सामाजिक, सांस्कृति बौद्धिक और आध्यात्मिक महत्व अनूठा है।

श्रावणी है संस्कार पर्व
श्रावण की पूर्णिमा का ऐतिहासिक महत्व भारत के प्राय: सभी हिस्सों में है। इसे श्रावणी कहा जाता है। ज्योतिष के हिसाब से इस दिन श्रवण नक्षत्र होता है, जिससे पूर्णिमा का संयोग होने से यह श्रावणी कही जाती है। मनुस्मृति में यह दिन उपाकर्म करने का है – श्रावण्यां प्रौष्ठपद्यां वा उपाकृत्य यथाविधि। ब्राह्मण-पुरोहित इस दिन पवित्र तीर्थों और सरोवरों में स्नान करके तर्पण एवं पूजन करते हैं। नई यज्ञोपवीत धारण करते हैं। अपने यजमानों के हाथ पर राखी बांधते हैं और दक्षिणा प्राप्त करते हैं।

श्रावणी पूर्णिमा को पश्चिमी भारत (विशेषत: कोंकण एवं मलाबार) में न केवल हिंदू, प्रत्युत मुसलमान एवं व्यवसायी पारसी भी समुद्र तट पर जाते हैं और समुद्र को पुष्प एवं नारियल चढ़ाते हैं। श्रावण की पूर्णिमा को समुद्र में तूफान कम उठते हैं इसीलिए समुद्र के रूप में वरुण देवता को नारियल चढ़ाया जाता है।

रक्षासूत्र है सनातन
श्रावण की पूर्णिमा को सब जगह भाई और बहिन के प्रेम का पवित्र प्रेम का उत्सव होता है, जिसे रक्षा-बंधन कहते हैं। बहिन भाई की कलाई पर भाव और प्रेम के प्रतीक के रूप में न केवल राखी बांधती है बल्कि वह अनिष्ट से दूर रहे, यह कामना भी करती है। राखी का संस्कृत में नाम रक्षा है। रक्षा के बांधने को ही रक्षा-बंधन कहते हैं। पुराने जमाने में यह कार्य पुरोहित करते थे। वे ऋग्वेद के रक्षोघ्न-सूक्त से अपने यजमान के राखी बांधते थे। पर अब प्राय: सर्वत्र बहन ही भाई की कलाई पर राखी बांध देती है।

संस्कृत की सेवा
वेदों और पुराणों की भाषा के साथ ही संस्कृत ज्ञान-विज्ञान की भाषा है। संस्कृत दिवस मनाने के पीछे जो निहितार्थ हैं, वे इस प्राचीनतम भाषा के संरक्षण से जुड़े हैं। भारत सरकार ने संस्कृत के पारंपरिक अध्ययन-अध्यापन की जमीनी हकीकत जानने के लिए संस्कृत विद्वानों से परामर्श लिया। परिणामस्वरूप संस्कृत शिक्षा को मजबूती देने के लिए एक कमेटी बनी। इसमें सुनीति कुमार चटर्जी और वी राघवन जैसे बड़े विद्वान थे। कमेटी ने संस्कृत की अभिवृद्धि के लिए कई सिफारिशें की, उनमें एक यह थी कि केंद्र और राज्यों की सरकारें किसी एक विशेष दिन को संस्कृत दिवस के रूप में आरक्षित करे। निष्कर्ष स्वरूप 1969 से प्रतिवर्ष संस्कृत दिवस मनाने का परिपत्र जारी हुआ।

इंदिरा गांधी ने संस्कृत दिवस के लिए श्रावणी पूर्णिमा यानी रक्षाबंधन के दिन का ही चुनाव किया। इसके पीछे जो कारण था, उसका संबंध भारत और उसके शाश्वत धर्म से है। यह दिन शुरू से गुरुकुलों में वेदाध्ययन प्रारंभ करने का रहा है। प्राचीन काल में इस दिन से शिक्षण सत्र आरंभ होता था। अत: भारत सरकार ने इस पावन दिन को ही संस्कृत दिवस के रूप में चुना ताकि संस्कृत के अध्ययन-अध्यापन की परंपरा में यह दिन अक्षुण्ण रह सके।

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