धार भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर में नमाज अदा करने के लिए 2,000 से ज्यादा लोगों के इकट्ठा होने के 24 घंटे से भी कम समय के भीतर इसे पूरी तरह से हिंदू धार्मिक स्थल में बदलने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। यह सब मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के शुक्रवार को आए फैसले के एक दिन बाद हुआ।
शनिवार को परिसर के नक्काशीदार पत्थर के स्तंभों पर गेंदे के फूलों की मालाएं लटकी हुई थीं। श्रद्धालु नंगे पैर मेहराबों के नीचे कतार में खड़े होकर पूजा कर रहे थे, तस्वीरें ले रहे थे और काले पत्थर के फर्श पर फूलों की पंखुड़ियां बिखेर रहे थे। उन्होंने हनुमान चालीसा का पाठ किया और ‘माँ वाग्देवी’ की प्रार्थना की। एक गुप्त कक्ष में काली दीवार पर लगी एक नक्काशी के नीचे फूलों को ‘ओम’ के प्रतीक के रूप में सजाया गया था। हिंदुओं का मानना है कि यहां कभी देवी सरस्वती की मूर्ति स्थापित थी।
शुक्रवार को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने मध्ययुगीन परिसर को लेकर चल रहे लंबे विवाद पर अपने आदेश में फैसला सुनाया। हाई कोर्ट ने विवादित स्थल को मंदिर माना है और हिंदुओं को पूजा की अनुमति दे दी है। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ऐतिहासिक रिकॉर्ड भोजशाला को मंदिर साबित करते हैं। यानी यह देवी वाग्देवी (सरस्वती) के मंदिर का है।
हालांकि, साल 2003 में एक समझौता हुआ था। उस समझौते के तहत हिंदू हर मंगलवार को परिसर में पूजा करते थे, जबकि मुसलमान, जो इसे मस्जिद मानते हैं, वह हर शुक्रवार को पास की दरगाह में नमाज अदा करते थे।
अपने 242 पृष्ठों के फैसले में अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई), जो 1952 से इस स्मारक का प्रबंधन कर रहा है। उसको परिसर के संरक्षण और आवागमन के नियमन का प्रभार सौंपा। अदालत ने यह भी कहा कि मुसलमानों को अब इस स्थल पर नमाज अदा करने की अनुमति नहीं होगी और राज्य सरकार को इसके लिए धार जिले में वैकल्पिक भूमि आवंटित करने पर विचार करने का निर्देश दिया।
मुस्लिम पक्ष ने कहा है कि वे हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे। लेकिन जमीनी स्तर पर यह आदेश पहले ही प्रभावी होना शुरू हो गया है। राज्य के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी इसका समर्थन कर रहे हैं।
इस मामले में याचिकाकर्ताओं में से एक कुलदीप तिवारी प्रवेश द्वार के पास खड़े होकर समर्थकों को लड्डू बांट रहे थे। हाई कोर्ट के उस आदेश का जिक्र करते हुए, जिसमें केंद्र सरकार से ब्रिटेन के ब्रिटिश संग्रहालय में रखी सरस्वती प्रतिमा को वापस लाने पर विचार करने को कहा गया था (माना जाता है कि यही प्रतिमा कभी भोजशाला परिसर में स्थापित थी)। तिवारी ने कहा, “अब हम चाहते हैं कि सरकार प्रतिमा को वापस लाए और उच्च न्यायालय के फैसले का सम्मान करे।
तिवारी और परिसर में मौजूद अन्य हिंदू कार्यकर्ता पहले से ही अपने अगले अभियान की योजना बना रहे हैं। अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में बनी सीढ़ियों की ओर इशारा करते हुए तिवारी ने कहा कि इन्हें भी अंततः हटा दिया जाना चाहिए।
भोज उत्सव समिति नामक संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारी रवि सिकरवार ने भी इस बात से सहमति जताई। उन्होंने कहा कि मुसलमानों द्वारा निर्मित कई संरचनाएं हैं जिन्हें हटाना होगा। हमने इस स्थल पर प्रतिदिन पूजा करने के अपने अधिकार को पुनः प्राप्त करने के लिए 10 वर्षों तक संघर्ष किया। हम मुस्लिम समुदाय की सभी संरचनाओं को हटाने के लिए संघर्ष जारी रखेंगे।
इसके विपरीत, परिसर से सटे कमाल मौला दरगाह पर सफेद तंबुओं की छतरी के नीचे एक खामोशी छाई हुई है। इसके नीचे, योमुद्दीन शेख, एक खादिम जिनका परिवार लंबे समय से इस दरगाह से जुड़ा हुआ है। उन्होंने प्लास्टिक कवर में संरक्षित एक पुराना वंशावली वृक्ष निकाला।
वह कहते हैं कि मेरा परिवार सदियों से यहां नमाज़ अदा करने में मदद करता आया है। क्या वे इस परंपरा में आखिरी होंगे, वे सोचते हैं। वह आगे कहते हैं कि हमें नहीं पता कि हम कब दोबारा नमाज़ पढ़ पाएंगे। कल, हममें से 2,000 से ज़्यादा लोगों ने यहां आखिरी बार नमाज़ अदा की।
मुस्लिम पक्ष की ओर से याचिकाकर्ताओं में से एक, मौलाना कमाल वेलफेयर सोसाइटी के अध्यक्ष अब्दुल समद ने कहा कि यह नमाज़ अदा करने की अनुमति मांगने का मामला कभी नहीं था। समद ने जोर देकर कहा कि हम यहां सैकड़ों वर्षों से नमाज पढ़ते आ रहे हैं और हमें अनुमति की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि हाई कोर्ट ने केवल 2003 के एएसआई के समझौते को रद्द किया है। उन्होंने कहा कि हम आदेश का अध्ययन कर रहे हैं और एएसआई के साथ मिलकर यह समझने की कोशिश करेंगे कि नमाज़ कैसे जारी रह सकती है। हम नमाज़ केवल यहीं अदा करेंगे।
धार शहर के काजी वकार सिद्दीकी ने कहा कि परिसर में कई इस्लामी संरचनाएं हैं और वे उनके बारे में चिंतित हैं। उन्होंने कहा कि हमारे पास मेहराब, वज़ूखाना, कब्रें हैं। हम चाहते हैं कि एएसआई इन संरचनाओं की रक्षा करे।
कुछ किलोमीटर दूर, धार के पुराने इलाकों की मुस्लिम बहुल गलियों में शनिवार को अधिकांश दुकानें किसी भी प्रकार की गड़बड़ी से बचने के लिए बंद थीं। पुलिस के वाहन धीरे-धीरे गुजर रहे थे, तभी पुरुष समूहों में इकट्ठा होकर फैसले और सुप्रीम कोर्ट में संभावित चुनौती पर चर्चा कर रहे थे।
सूखे मेवों के व्यापारी रियाज अहमद ने कहा कि मेरे दादाजी और उनसे पहले उनके पिता यहां नमाज़ पढ़ते थे। हमें भी वही अधिकार मिलना चाहिए। मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि मेरे बेटे शायद इस ऐतिहासिक स्थल पर फिर कभी नमाज़ नहीं पढ़ पाएंगे।
धार कस्बा मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से करीब 250 किलोमीटर दूर स्थित है। इस कस्बे का आबादी 1.5 लाख है। यह धार कस्बा कभी मालवा सल्तनत और बाज बहादुर और रूपमती की कहानी से जुड़ा हुआ था। हालांकि, पिछले तीन दशकों में इसके पुराने व्यावसायिक क्षेत्रों में स्थित विवादित परिसर शहर के राजनीतिक और सांप्रदायिक जीवन की पहचान बन गया है।
परिसर के आसपास का इलाका इस वास्तविकता को दर्शाता है। यह के रहने वाले याद करते हैं कि दो दशक पहले इस क्षेत्र में कसाई की दुकानें, एक पशु बाजार, होटल और एक सिनेमा हॉल हुआ करते थे, जो मेलों और सप्ताहांतों के दौरान खचाखच भरा रहता था। 1990 के दशक और 2000 के दशक के आरंभ में परिसर के आसपास सामुदायिक आंदोलन तेज होने के साथ, कई व्यवसाय बंद हो गए या कहीं और स्थानांतरित हो गए। पुराने सिनेमाघर का टिकट काउंटर अब संवेदनशील समय के दौरान परिसर की ओर जाने वाले लोगों को नियंत्रित करने के लिए एक पुलिस चौकी के रूप में कार्य करता है।
हिंदू कानूनी अभियान के प्रमुख व्यक्तियों में से एक आशीष गोयल ने लगभग तीन दशक इस संघर्ष में बिताए हैं। एबीवीपी के पूर्व सदस्य, जो बाद में हिंदू जागरण मंच के धार जिला संयोजक बने। उन्होंने उच्च न्यायालय के आदेश का स्वागत करते हुए इसे कई दशकों के संघर्ष के बाद सनातन धर्म के लिए एक बड़ी जीत बताया है।
आशीष गोयल का कहना है कि उनके अभियान को नई गति 2019 में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले से मिली, जिसमें अयोध्या की विवादित भूमि हिंदू पक्ष को सौंपी गई थी। गोयल ने बताया कि इससे उन्हें विश्वास हो गया कि भोजशाला को भी निरंतर कानूनी कार्रवाई के माध्यम से हासिल किया जा सकता है। उन्होंने लखनऊ स्थित ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ से समर्थन मांगा और ऐतिहासिक अभिलेखों, भूमि दस्तावेजों और शाही परिवार के खातों को इकट्ठा करना शुरू किया। फिर, मई 2021 में हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस ने परिसर पर हिंदुओं के अनन्य अधिकारों की मांग करते हुए उच्च न्यायालय में याचिका दायर की।
यह मुद्दा 2000 के दशक के आसपास राज्य की राजनीतिक शब्दावली में शामिल हो गया, जब भाजपा ने कांग्रेस सरकार को सत्ता से हटाने के प्रयास में इसे अपना लिया। उमा भारती ने 2003 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले इस मुद्दे को बार-बार उठाया। कांग्रेस, जो पहले से ही भारी सत्ता-विरोधी लहर का सामना कर रही थी, उन चुनावों में हार गई और 2018-2020 को छोड़कर तब से सत्ता से बाहर है।
2022 में कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने के बाद सत्ता में लौटी शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली सरकार ने लंदन से सरस्वती प्रतिमा वापस लाने का वादा किया था। हाल ही में हुए लोकसभा चुनावों में भी, धार जिले भर में प्रचार भाषणों में भोजशाला का प्रमुख स्थान रहा।
किसी को भी यह उम्मीद नहीं है कि अदालत के इस आदेश से सब कुछ खत्म हो जाएगा। घटनास्थल पर तैनात एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, जिन्होंने अपना नाम न बताने की शर्त पर कहा कि हम सभी फैसले का अध्ययन कर रहे हैं और परिसर में पूजा शुरू करने की व्यवस्था कर रहे हैं। जून तक स्थिति सामान्य करने के लिए बड़ी संख्या में पुलिस बल मौजूद रहेगा।
‘धार भोजशाला मंदिर है’ हाईकोर्ट ने विवादित स्थल को मंदिर करार दिया, हिंदुओं को पूजा की अनुमति
इंदौर हाई कोर्ट ने धार-भोजशाला कमालमौला-मस्जिद मामले पर बड़ा फैसला सुनाया है। उच्च न्यायालय ने हिंदू पक्ष की दो जनहित याचिकाएं मंजूर कीं। हाई कोर्ट ने विवादित स्थल को मंदिर माना है और हिंदुओं को पूजा की अनुमति दे दी है। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ऐतिहासिक रिकॉर्ड भोजशाला को मंदिर साबित करते हैं। इंदौर हाई कोर्ट के जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की पीठ ने यह फैसला सुनाया। पढ़ें पूरी खबर।
