आज के दौर में जहां तलाक की दर बढ़ती और परिवार की संख्या में बदलाव हो रहे हैं, वहीं ताजा डेमोग्राफिक डेटा एक अलग ही सच्चाई बयां कर रही है। इसके मुताबिक, देश में पिछले एक दशक में विधवा, तलाकशुदा या अलग-अलग रह रहे नागरिकों का अनुपात तेजी से कम हुआ है, जबकि कुछ दक्षिणी राज्य इससे उल्टी दिशा में चल रहे हैं।

सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम स्टैटिकल की 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक, देश की कुल आबादी में से 3.4 प्रतिशत आबादी विधवा, तलाकशुदा और अलग-अलग रहने वालों की है, जो कि 2014 की 4.1 प्रतिशत के कम है यानी दस साल में ऐसे लोगों की संख्या में गिरावट दर्ज हुई है।

सबसे ज्यादा तेजी से संख्या उत्तराखंड में गिरी

सबसे अधिक संख्या उत्तराखंड में गिरी है, यहां विधवा, तलाकशुदा और अलग-अलग रहने वालों की संख्या 6.2 से गिरकर 3.5 प्रतिशत रह गई है। दूसरे नंबर छत्तीसगढ़ है, यहां भी ये आबादी 5.2 से 3.6 प्रतिशत पर आ गए हैं। देश की राजधानी दिल्ली में भी ये आबादी 3.6 प्रतिशत से गिरकर दो फीसदी हो गई है। इसके अलावा, गुजरात में भी 4.8 प्रतिशत से 3.1 प्रतिशत हो गई है। बिहार, जो पहले से ही देश के सबसे निचले अनुपात में से एक था, में यह आबादी अब 2.3 प्रतिशत से घटकर केवल 1.5 प्रतिशत रह गया।

दक्षिण भारत में बढ़ी आबादी

दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में यह अंतर दस सालों बढ़ा है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में देश की सबसे अधिक विधवा, तलाकशुदा और अलग-अलग रहने वालों की आबादी तमिलनाडु में दर 7.2 प्रतिशत दर्ज की गई, जो एक दशक पहले की 5.7 प्रतिशत की दर से काफी ज्यादा है। केरल एकमात्र ऐसा दूसरा बड़ा राज्य था जहाँ यह दर बढ़ी; यह 6.2 प्रतिशत से बढ़कर 6.3 प्रतिशत हो गई। जबकि तेलंगाना में यह दर 4.6 प्रतिशत पर पहले की तरह जस की तस यानी स्थिर है।

हालांकि इस डेटा में विधवाओं की संख्या को तलाक और अलग रहने वालों की संख्या से अलग नहीं किया गया है, जिससे यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि दक्षिणी राज्यों में इन आँकड़ों की बढ़ने की सही वजह क्या है।

इधर उत्तरी राज्यों में अंतर सामान्य ही रहे। उत्तर प्रदेश में इनकी आबादी 2.2 प्रतिशत, हरियाणा में 1.9 प्रतिशत, जम्मू-कश्मीर में 1.7 प्रतिशत और बिहार में 1.5 प्रतिशत दर्ज की गई।

अकेले जीवन बिताने में महिलाएं आगे

2024 के इस रिपोर्ट से सबसे अहम बात यह पता चलती है कि भारत में अकेले जीवन अधिकतर महिलाएं ही बिता रही हैं। ये आंकड़े एक गंभीर असमानता को उजागर करते हैं- जिन पुरुषों का तलाक हो जाता है या जिनकी पत्नी की मृत्यु हो जाती है, उनके दोबारा शादी करने की संभावना बहुत अधिक होती है, जबकि महिलाओं को विधवा/तलाकशुदा/अकेले स्थिति में जीवन बिताने का सामाजिक और आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है।

एक दशक पहले, कुल महिला आबादी का 6.5 प्रतिशत हिस्सा इस श्रेणी में आता था, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा केवल 1.9 प्रतिशत था। हालांकि कुल आंकड़ों में थोड़ा सुधार हुआ है, लेकिन लिंग-आधारित अंतर अभी भी बना हुआ है। आज सभी भारतीय महिलाओं में से 5.4 प्रतिशत इस स्थिति में हैं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा केवल 1.6 प्रतिशत है।

जबकि उत्तर, पूर्व और पश्चिम भारत के लगभग सभी राज्यों में विधवा/तलाकशुदा/अलग रहने वाली आबादी में कमी का राष्ट्रीय ट्रेंड देखा गया, जबकि दक्षिण भारत के आंकड़ों में एक बड़ा बदलाव देखा गया। भारत के दो सबसे विकसित राज्यों (तमिलनाडु और केरल) ने राष्ट्रीय ट्रेंड से बिल्कुल अलग रुख दिखाया और वहां शादी टूटने और पार्टनर को खोने की घटनाओं में तेजी से बढ़ोतरी हुई।

महिलाओं के अकेले जीवनयापन करने में यह भी एक बड़ा कारण

महिलाओं में साक्षरता का उच्च स्तर, ज्यादा आर्थिक आजादी और बेहतर सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था के कारण तलाक और अलग होने को समाज में अधिक स्वीकार किया जा रहा है। इसके अलावा, इन राज्यों में बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के कारण लोगों की औसत उम्र (लाइफ एक्सपेक्टेंसी) भी बढ़ी है। चूंकि अधिकतर शादियों में पुरुष की उम्र महिला से अधिक होती है, इसलिए इन राज्यों में बड़ी संख्या में महिलाएं अपने पतियों के बाद भी जीवित रहती हैं, जिससे विधवाओं की संख्या बढ़ जाती है।

केरल में बुजुर्गों की संख्या अधिक

इसके अलावा, देश में सबसे अधिक बुजुर्ग जनसंख्या केरल में हैं, यहां बुजुर्गों की संख्या राज्य की कुल आबादी की 15.1 फीसदी है; इसके बाद दूसरे नंबर पर तमिलनाडु हैं, यहां यह आबादी का 14.2 प्रतिशत है।

बिहार में सबसे कम इनकी आबादी

दक्षिणी राज्यों के विपरीत, उत्तर और पूर्वी भारत के कुछ इलाकों में शादी टूटने की दर बहुत कम है, जिससे राष्ट्रीय औसत नीचे आ जाता है। बिहार में देश की सबसे कम विधवा/तलाकशुदा/अलग रहने वाली महिलाओं का दर है। 2014 में इस आबादी की दर पहले से ही कम यानी 2.3 प्रतिशत थी, लेकिन 2024 में यह और घटकर 1.5 प्रतिशत पर आ गई। जम्मू-कश्मीर भी इसके करीब है, जहाँ यह दर 2014 के 2.5 प्रतिशत से घटकर आज 1.7 प्रतिशत हो गई है। हालाँकि ये आँकड़े विधवा, तलाक और अलग रहने की संख्या कम दिखाते हैं, लेकिन जानकार चेतावनी देते हैं कि ये आँकड़े तलाक के लिए कानूनी और आर्थिक मदद तक सीमित पहुँच, ज्यादा पारंपरिक सामाजिक ढाँचे और दक्षिणी राज्यों की तुलना में कम उम्र की आबादी को भी दिखा सकते हैं।

कुछ राज्यों में पिछले दशक में काफी बड़े बदलाव देखे गए हैं। उत्तराखंड में देश की सबसे बड़ी गिरावटों में से एक देखी गई, जहाँ इनकी आबादी 2014 के 6.2 प्रतिशत से लगभग आधी होकर 2024 में 3.5 प्रतिशत रह गई। छत्तीसगढ़ में भी काफी गिरावट दर्ज की गई, जहाँ इसी दौरान यह अनुपात 5.2 प्रतिशत से घटकर 3.6 प्रतिशत हो गया।

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