भारत के सबसे बड़े शहरों में महिलाओं के लिए सैलरी वाली नौकरी पाने के अवसर बेहतर हैं, अगर तुलना पूरे शहरी भारत से की जाए। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) की नई रिपोर्ट ‘लेबर मार्केट डायनॉमिक्स इन मिलियन-प्लस सिटीज’ में यह बात सामने आई है।
रिपोर्ट कहती है कि जिन शहरों की आबादी 10 लाख से ज्यादा है, वहां कामकाजी महिलाओं में 65.1% महिलाएं सैलरी वाली नौकरी कर रही हैं। वहीं, ऐसे शहरों में पुरुषों के बीच यह आंकड़ा 56.4% दर्ज किया गया है। इसका सीधा मतलब है कि बड़े शहरों में महिलाओं का नियमित नौकरी में हिस्सा पुरुषों के मुकाबले बेहतर है।
रिपोर्ट में यह भी पता चला है कि देश के 46 ऐसे शहर, जिनकी आबादी 2011 की जनगणना के मुताबिक 10 लाख से ज्यादा थी, वहां महिलाओं की नियमित नौकरी में भागीदारी 65.1% है। वहीं, अगर पूरे शहरी भारत की बात करें तो यह आंकड़ा 50.9% है।
वैसे, दूसरी तस्वीर भी यह रिपोर्ट पेश कर रही है। महिलाओं का वर्कर पॉपुलेशन रेशियो (WPR) यानी कुल आबादी में काम करने वाली महिलाओं का प्रतिशत आज भी काफी कम है। बड़े शहरों में पुरुषों का WPR 72.6% है, लेकिन महिलाओं का सिर्फ 25.5% दर्ज किया गया है। पूरे शहरी भारत में भी स्थिति लगभग ऐसी ही है। वहां पुरुषों का WPR 73% है और महिलाओं का 25.9%।
रिपोर्ट यह भी बता रही है कि बड़े शहरों और पूरे शहरी भारत के रोजगार के पैटर्न में बड़ा अंतर देखने को मिला है। 10 लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों में 58.5% लोग सैलरी वाली नौकरी कर रहे हैं, जबकि पूरे शहरी भारत में यह आंकड़ा 47.6% है। वहीं, अगर सेल्फ-एम्प्लॉयड (स्वरोजगार) और दिहाड़ी रोजगार की बात करें, तो पूरे शहरी भारत में इनकी हिस्सेदारी 52.4% है, जबकि बड़े शहरों में यह आंकड़ा 41.4% है।
अगर इनकम की बात करें, तो बड़े शहरों में पुरुषों और महिलाओं दोनों की कमाई पूरे शहरी भारत की तुलना में कम से कम 10% ज्यादा है। लेकिन यहां वेतन का अंतर भी बढ़ता हुआ दिख रहा है।
पूरे शहरी भारत में नियमित नौकरी करने वाले पुरुषों की औसत मासिक आय 27,984 रुपये है। वहीं, महिलाओं की औसत मासिक आय 21,664 रुपये दर्ज की गई है। इसका सीधा मतलब है कि दोनों के बीच अभी भी 6,320 रुपये का बड़ा अंतर है।
वहीं, देश के 46 सबसे बड़े शहरों में पुरुषों की औसत मासिक आय 30,707 रुपये है, जबकि महिलाओं की 23,707 रुपये है। इसका मतलब है कि यहां भी वेतन का अंतर 7,000 रुपये के करीब है। वहीं, महिलाओं की सैलरी पुरुषों की तुलना में दोनों ही मामलों में करीब 77.2% दर्ज की गई है।
वैसे, कुछ शहर ऐसे भी हैं जहां महिलाओं की कमाई पुरुषों के बराबर या उससे भी ज्यादा है। सबसे ऊपर प्रयागराज है, जहां महिलाओं की औसत मासिक आय 42,254 रुपये है, जबकि पुरुषों की 32,214 रुपये। इसका मतलब है कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में 131.2% कमाई कर रही हैं।
अगर श्रीनगर की बात करें, तो यहां महिलाएं पुरुषों की तुलना में 124% ज्यादा कमा रही हैं। लखनऊ में यह आंकड़ा 117.1%, पटना में 111.1%, मेरठ में 105.9% और वाराणसी में 102.4% है।
जानकारी के लिए बता दें कि ये सभी आंकड़े राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) 2025 का हिस्सा हैं। पहली बार इस सर्वे में देश के 10 लाख से ज्यादा आबादी वाले 46 शहरों के लिए अलग से श्रम बाजार के आंकड़े जारी किए गए हैं। यह सर्वे पूरे शहरी भारत के करीब 3.95 लाख लोगों से बातचीत के बाद तैयार किया गया है।
अगर महानगरों की बात करें, तो ग्रेटर मुंबई सबसे बेहतर स्थिति में दिखाई दे रही है। यहां महिलाओं की औसत मासिक आय 35,788 रुपये है, जबकि पुरुषों की 36,453 रुपये। यानी यहां महिलाओं की कमाई पुरुषों की 98.2% है और दोनों के बीच सिर्फ 665 रुपये का अंतर है।
दिल्ली में महिलाएं औसतन 31,644 रुपये कमा रही हैं, जबकि पुरुषों की औसत आय 35,708 रुपये है। यानी महिलाओं की कमाई पुरुषों की 88.6% है।
बेंगलुरु की बात करें, तो महिलाओं की औसत आय 28,325 रुपये है और पुरुषों की 37,430 रुपये। यहां महिलाओं की कमाई पुरुषों से 24.3% कम है।
अगर पांच बड़े महानगरों की बात करें, तो कोलकाता में सबसे बड़ा वेतन अंतर देखने को मिला है। यहां महिलाओं की औसत मासिक आय 13,784 रुपये है, जबकि पुरुषों की 21,534 रुपये। यानी महिलाएं पुरुषों से 36% कम कमा रही हैं।
दिहाड़ी मजदूरी की बात करें, तो यहां भी पुरुषों और महिलाओं की कमाई में बड़ा अंतर देखने को मिला है। 46 बड़े शहरों में पुरुष दिहाड़ी मजदूरों की औसत कमाई 643 रुपये प्रतिदिन है, जबकि महिलाओं की औसत दिहाड़ी 434 रुपये प्रतिदिन है।
पुरुष दिहाड़ी मजदूरों के मामले में सबसे ज्यादा कमाई वसई-विरार में होती है, जहां औसत मजदूरी 962 रुपये प्रतिदिन है। वहीं, महिलाओं के लिए सबसे ज्यादा औसत दिहाड़ी श्रीनगर में है, जहां उन्हें 800 रुपये प्रतिदिन मिलते हैं।
वहीं, फरीदाबाद में महिला दिहाड़ी मजदूरों की औसत मजदूरी सिर्फ 53 रुपये प्रतिदिन दर्ज की गई है। ऐसे में श्रीनगर और कोलकाता ऐसे शहर हैं, जहां महिला दिहाड़ी मजदूरों की कमाई पुरुषों से ज्यादा है।
वैसे, इस रिपोर्ट में महिलाओं की श्रम बाजार में भागीदारी को लेकर भी चिंता जताई गई है। पूरे शहरी भारत में 30 से 59 साल की 65% महिलाएं NEET श्रेणी में आती हैं। NEET का मतलब है नॉट इन एम्प्लॉयमेंट, एजुकेशन ऑर ट्रेनिंग यानी न नौकरी, न पढ़ाई और न ही किसी ट्रेनिंग में। वहीं, पुरुषों में यह आंकड़ा सिर्फ 4.4% है। जबकि 46 बड़े शहरों में महिलाओं का यह आंकड़ा 67% और पुरुषों का 4.3% है।
यानी कुल मिलाकर पूरे शहरी भारत में महिलाओं की लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट (LFPR) 27.7% है। वहीं, देश के 46 सबसे बड़े शहरों में यह घटकर 25.5% रह जाती है। यानी बड़े शहरों में नियमित नौकरी के अवसर ज्यादा हैं, लेकिन इसके बावजूद कुल कामकाजी महिलाओं की भागीदारी अब भी काफी कम है।
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