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‘आसानी से नहीं मिलता अधिकार’

केंद्र में कांग्रेस की अगुआई वाली सरकार रहते हुए दिल्ली के अधिकारों में बढ़ोतरी न होने पर उन्होंने जनसत्ता से निजी बातचीत में कहा था कि कोई आसानी से अधिकार नहीं देता।

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आधुनिक दिल्ली की शिल्पकार शीला दीक्षित ने 17 साल बाद दोबारा दिल्ली कांग्रेस की अध्यक्ष बनने के बाद कहा था कि बहुत सारे काम अधूरे रह गए हैं। अगर दोबारा कांग्रेस को दिल्ली की जनता मौका देगी तो उसे पूरा करने का प्रयास किया जाएगा। मुख्यमंत्री रहते हुए उनके दिल की सर्जरी हुई थी। यही बीमारी 81 साल की उम्र में उनके निधन का कारण बनी।

दिल्ली में पैदा हुर्इं शीला दीक्षित का राजनीतिक जीवन 1984 में कन्नौज से लोकसभा चुनाव जीतकर शुरू हुआ। वे राजीव गांधी के प्रधानमंत्री कार्यालय की राज्यमंत्री बनीं। ससुर पंडित उमाशंकर दीक्षित की राजनीतिक सीख ने परिपक्व बनाया। 1998 में पूर्वी दिल्ली से लोकसभा चुनाव हारने के बाद जब उन्हें चौधरी प्रेम सिंह की जगह दिल्ली कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया तो कांग्रेस के मठाधीशों को लगा कि वे तो रेलयात्री की तरह कुछ दिनों में चली जाएंगी। विधानसभा चुनाव जीतने के बाद वे मुख्यमंत्री बनीं और धीरे-धीरे नौकरशाही के बीच काम करने के अपने पुराने अनुभव का लाभ उठा कर फैसले करना शुरू किया तो पार्टी नेताओं ने उनके खिलाफ अभियान शुरू कर दिया लेकिन आलाकमान ने उनका साथ दिया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से दिल्ली के सभी व्यावसायिक वाहनों को तय सीमा में सीएनजी पर लाने की चुनौती उन्होंने स्वीकारी। अदालत की अवमानना का खतरा लेकर उसे पूरा किया। पार्टी के परंपरागत दिग्गज या तो उनके साथ हो गए या घर बैठ गए।

2003 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी ने दिल्ली में दलित वोट बसपा के साथ न जाने देने के लिए चौधरी प्रेम सिंह को फिर से प्रदेश अध्यक्ष बनाया तो वे अपने को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार मान बैठे। चुनाव के बाद उन्होंने विधायकों की राय से मुख्यमंत्री चुनने का आग्रह आलाकमान से किया तो पार्टी ने प्रणब मुखर्जी को पर्यवेक्षक बनाकर विधायकों की राय लेने भेजा। विधायकों ने दीक्षित के पक्ष में राय दी। दिल्ली के हर कोने में डॉक्टर अशोक वालिया, अजय माकन, अरविंदर सिंह लवली, हारून यूसुफ के सहयोग से हर विभाग में काम तेजी से होने लगा था।

2002 में उनका टकराव तब के उप राज्यपाल विजय कपूर से हुआ। उन्होंने गृह मंत्रालय से दो परिपत्र जारी करवाकर दिल्ली सरकार के अधिकारों में कटौती करवा दी। इसके विरोध में पहली बार शीला दीक्षित ने सचिवालय से विधायकों के साथ पदयात्रा की और विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने का प्रस्ताव पास किया। लेकिन बाद में वे उसी उपराज्यपाल से कई बड़े फैसले मंजूर करवा पार्इं। केंद्र में कांग्रेस की अगुआई वाली सरकार रहते हुए दिल्ली के अधिकारों में बढ़ोतरी न होने पर उन्होंने जनसत्ता से निजी बातचीत में कहा था कि कोई आसानी से अधिकार नहीं देता।

तीसरी बार 2008 में मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी में पूरी ताकत लगा दी। राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में दिल्ली सरकार पर जो घोटाले के आरोप लगे उसकी सफाई में उन्होंने विस्तार में अपनी बात पूर्व सीएजी वीके शुंगलू जांच आयोग को दी। मुख्यमंत्री बनते हुए उनकी प्राथमिकता दिल्ली में बिजली की दशा सुधारने की थी। वह उन्होंने बिजली का निजीकरण करके की। लेकिन बड़ी समस्या दिल्ली में बिजली उत्पादन का था। दिल्ली में बिजली की सीमित उपलब्धता को बढ़ाने के लिए उन्होंने दूसरे राज्यों में दिल्ली के लिए बिजली के समझौते किए। आज करीब आठ हजार मेगावाट बिजली की मांग होने के बावजूद दिल्ली किसी राज्य का मोहताज नहीं है।

दिल्ली में अधिकारों के लिए लड़ने वाले ‘आप’ के नेताओं के लिए शीला दीक्षित के काम करने का तरीका बेहतर उदाहरण होगा। दुखद यह हुआ कि जब उनका निधन हुआ तब दिल्ली कांग्रेस उससे बदतर हाल में है जिस हाल में पहली बार उनके अध्यक्ष बनने के समय थी। दिल्ली उन्हें आसानी से नहीं भुला पाएगा। उन्होंने 21वीं सदी की दिल्ली की बेहतर बुनियाद रखी।

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