पिछले महीने दिल्ली के जंतर-मंतर पर पेपर लीक के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन हुआ। धर्मेंद्र प्रधान के केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफे के साथ ही यह आंदोलन खत्म हो गया था लेकिन इसमें केंद्र और राज्य सरकारों ने भरोसा दिया था कि पुलिस जंतर-मंतर पर जुटे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं करेगी।

इसके बिल्कुल ठीक उलट हालात नोएडा में बने।

इस साल अप्रैल के महीने में वेतन में बढ़ोतरी की मांग को लेकर निजी कंपनियों के कर्मचारी या फैक्ट्री में काम करने वाले मजदूरों ने नोएडा में एक सप्ताह तक प्रदर्शन किया था। जंतर-मंतर के आंदोलन के बिल्कुल विपरीत नोएडा के फैक्ट्री मजदूरों को पुलिस कार्रवाई के मामले में कोई राहत नहीं दी गई।

पुलिस ने नोएडा में हुए विरोध-प्रदर्शन के मामले में करीब 200 लोगों को हिरासत में लिया। इनमें दो लोग ऐसे थे जिन पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत कार्रवाई की गई।

एनएसए के तहत बिना मुकदमा दर्ज किए किसी भी शख्स को एक साल तक हिरासत में रखा जा सकता है।

14 अप्रैल को उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने मजदूरों की मांग के मुताबिक वेतन में तो बढ़ोतरी की लेकिन प्रदर्शन करने वाले लोगों को राहत पाने के लिए अदालतों का सहारा लेना पड़ा।

106 मामलों की जांच में क्या सामने आया?

इंडियन एक्सप्रेस ने इस मामले में लंबी जांच-पड़ताल की है। अखबार की ओर से ऐसे 106 मामलों की जांच की गई जिनके तहत गिरफ्तार किए गए लोगों पर बेहद गंभीर आरोप जैसे- दंगा करना, आगजनी और हत्या के प्रयास जैसे गंभीर आरोप लगाए गए थे।

इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में सामने आया है कि औसतन एक प्रदर्शनकारी को 53 दिन तक जेल में रहना पड़ा। इस मामले में पुलिस ने सात एफआईआर दर्ज की और अदालतों ने जमानत से जुड़े कुल 222 आदेश दिए। इनमें से 188 मामलों यानी 84% मामलों में प्रदर्शनकारियों को राहत मिली।

अदालत के द्वारा दिए गए आदेशों में एक अहम बात यह सामने आई कि मामले की सुनवाई कर रहे जजों ने देखा कि पुलिस के द्वारा दर्ज किए गए मामले पूरी भीड़ को ही आरोपी मानने पर आधारित थे, जबकि यह साबित नहीं किया गया कि किसी एक कर्मचारी ने वास्तव में क्या किया था।

अदालतों ने जमानत से जुड़े जो अलग-अलग आदेश दिए उसमें तीन बड़ी बातें कहीं।

पहला- किसी भी विरोध-प्रदर्शन में अगर कोई व्यक्ति शामिल है तो सिर्फ उसकी मौजूदगी ही उसे जमानत देने से इनकार करने का सबूत नहीं है। दूसरा- ठोस सबूतों की कमी आरोपों की गंभीरता से ज्यादा बड़ी बात है। तीसरा- विरोध-प्रदर्शन में शामिल आम लोगों की तुलना हिंसा भड़काने या विरोध-प्रदर्शन आयोजित करने वालों से नहीं की जा सकती।

कई प्रदर्शनकारियों को बार-बार जमानत देने से इनकार कर दिया गया क्योंकि अभियोजन पक्ष या पुलिस ने जो सबूत पेश किए, उनमें ये थे कि आरोपियों ने विरोध-प्रदर्शनों में लोगों को बुलाया, WhatsApp ग्रुप्स के जरिये लोगों को बुलाया गया, हिंसा की साजिश रची, दूसरे लोगों को आंदोलन में शामिल होने के लिए उकसाया या फिर वे आगजनी जैसी घटनाओं में सीधे तौर पर शामिल थे।

द इंडियन एक्सप्रेस ने पड़ताल से मिली जानकारी को लेकर गौतम बुद्ध नगर की पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह को सवाल भेजे थे लेकिन उनकी ओर से कोई जवाब नहीं आया। इस मामले में जांच से जुड़े वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

अदालतों ने क्या कहा?

सेशन कोर्ट और इलाहाबाद हाई कोर्ट की ओर से दिए गए 222 जमानत आदेशों की जांच से पता चलता है कि अदालत के सामने रिकॉर्ड पर रखे गए सबूतों के आधार पर हर मामले की जांच कैसे की गई।

  1. 1- एफआईआर संख्या 149/2026, पुलिस स्टेशन: नोएडा फेज III

इस मामले में क्या आरोप था?

13 अप्रैल को लगभग 300-400 आरोपी लाठियों, डंडे, ईंटें, पत्थर और घातक हथियार लेकर सेक्टर 67 स्थित एमके इलेक्ट्रॉनिक्स के परिसर में घुस गए, नारे लगाए, गालियां दीं और जान से मारने की धमकी दी। आरोपियों ने दंगा किया, कंपनी के परिसर में अवैध रूप से प्रवेश किया और शिकायतकर्ता और कर्मचारियों पर जान से मारने की मंशा से हमला किया।

अदालत ने क्या कहा?

सबूतों से पता चला कि प्रदर्शन में शामिल लोग कंपनी के कर्मचारी थे। अदालत ने जमानत देते हुए कहा, “सिर्फ इस बात से कि वे भीड़ का हिस्सा थे, यह नतीजा नहीं निकाला जा सकता कि उनका भी वैसा ही आपराधिक इरादा था।”

अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष ने भीड़ की गतिविधियों को सामूहिक रूप से बताया था न कि हर व्यक्ति की अलग-अलग भूमिका को स्पष्ट किया। इनमें से 14 मामलों में हाई कोर्ट ने जमानत दी।

छह आरोपियों की जमानत याचिका खारिज

सेशन कोर्ट ने उन छह आरोपियों की जमानत याचिका खारिज कर दी, जिनका कंपनी के साथ कोई सीधा एम्प्लॉयर-एम्प्लॉई (मालिक-कर्मचारी) संबंध नहीं था। अदालत ने कहा कि आरोपी गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं और इस बात पर भी जोर दिया कि इन्हें जमानत मिलने से समाज में गलत संदेश जा सकता है।

  1. 2- एफआईआर संख्या 151/2026, पुलिस स्टेशन: नोएडा फेज III

इस मामले में क्या आरोप था?

आरोप यह था कि 13 अप्रैल को आरोपियों ने अलग-अलग कंपनियों के मालिकों और उनके कर्मचारियों पर जान से मारने की नीयत से पत्थर फेंके। पुलिस के मुताबिक, वे लाठी, डंडे, ईंट और पत्थर जैसे जानलेवा हथियारों के साथ गैर-कानूनी तरीके से कंपनी के परिसर में घुसे और सिक्योरिटी गेट, CCTV कैमरे, कांच और ऑफिस की संपत्ति में तोड़-फोड़ की और उसे भारी नुकसान पहुंचाया।

पुलिस ने इस मामले में मुखबिर के बयान, घटनास्थल का निरीक्षण और CCTV फुटेज की बात अदालत के सामने रखी।

सेशन कोर्ट ने क्या कहा?

आरोपियों को जमानत देते हुए अदालत ने कहा, “रिकॉर्ड पर ऐसी कोई CCTV फुटेज या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड पेश नहीं किया गया है जिसमें आरोपी को किसी भी हिंसक गतिविधि में शामिल होते हुए दिखाया गया हो।” इस मामले में 37 लोगों को जमानत मिली।

3- एफआईआर संख्या 163/2026, पुलिस स्टेशन: नोएडा फेज II

इस एफआईआर में तीन लोगों को जमानत मिली, 10 की याचिका खारिज कर दी गई।

इस एफआईआर में क्या आरोप था?

Paramount Exports, Anubhav Apparels और Richa Global के मजदूरों ने 10 और 11 अप्रैल को प्रदर्शन किया। पुलिस का आरोप था कि इस प्रदर्शन में हिंसक आंदोलन हुआ ताकि राज्य सरकार पर उनकी मांगें मानने का दबाव बनाया जा सके।

सेशन कोर्ट ने क्या कहा?

चार्जशीट दाखिल होने के बाद तीन आरोपियों को जमानत दे दी गई। अदालत ने माना कि आरोपी लंबे समय से जेल में थे और इस मामले में जांच के लिए उनका हिरासत में रहना जरूरी नहीं था।

अदालत ने इस एफआईआर के मामले में दस लोगों को जमानत देने से इनकार कर दिया गया। इन आरोपियों पर साजिश में सक्रिय भूमिका होने के आरोप थे। यह आरोप भी था कि उन्होंने कर्मचारियों को एकजुट करने के लिए कंपनियों के नाम से WhatsApp ग्रुप बनाए थे। पुलिस ने उनके घरों से आंदोलन से जुड़े बैनर, पोस्टर और पर्चे बरामद किए थे।

4- एफआईआर संख्या 165/2026, पुलिस स्टेशन: नोएडा फेज II

इस एफआईआर में क्या आरोप था?

13 अप्रैल को लगभग 450-500 मजदूर वेतन, ओवरटाइम और बोनस को लेकर विरोध करने के लिए सेक्टर 84 और कुछ अन्य जगहों पर इकट्ठा हुए। पुलिस के मुताबिक, सुबह करीब 8.30 बजे से रात 9.30 बजे तक चले इस विरोध प्रदर्शन में हिंसा हुई, प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर लाठियों और पत्थरों से हमला किया, सरकारी और प्राइवेट गाड़ियों को नुकसान पहुंचाया, कुछ गाड़ियों में आग लगा दी और सड़कों को जाम कर दिया।

अभियोजन पक्ष यानी पुलिस ने स्वतंत्र गवाहों के रूप में एक पानी बेचने वाले, चाउमीन का ठेला लगाने वाले और रिक्शा चालक के अलावा पुलिस के एक गवाह का भी हवाला दिया।

सेशन कोर्ट ने क्या कहा?

आरोपियों को जमानत देते हुए कोर्ट ने कहा कि यह स्पष्ट नहीं था कि चश्मदीद गवाह आरोपियों को पहले से कैसे जानते थे या उन्होंने कैसे उन्हें पहचान लिया। अदालत ने कहा कि घटना स्थल पर आरोपियों की मौजूदगी को दिखाने वाला कोई CCTV फुटेज, वीडियो या फोटो भी नहीं थी।

अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे अपराध करने में आरोपियों की सक्रिय भूमिका का पता चलता हो।

सात आरोपियों को जमानत नहीं मिली

कोर्ट ने कहा: “यह मामला मजदूरों के विरोध प्रदर्शन से जुड़ा है। मजदूरों के विरोध प्रदर्शन में आरोपियों की मौजूदगी कोई असामान्य बात नहीं है।” ऐसे छह मामलों में हाई कोर्ट ने आरोपियों को जमानत दी लेकिन सात अन्य आरोपियों को जमानत नहीं मिली। पुलिस ने इन्हें साजिशकर्ता बताया था।

  1. 5- एफआईआर संख्या 169/2026, पुलिस स्टेशन: नोएडा फेज II

एफआईआर में क्या आरोप था?

आरोप है कि Richa Global के कर्मचारियों ने 10 अप्रैल से वेतन बढ़ाने की मांगों के समर्थन में विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने कंपनी के गेट को गैर-कानूनी तरीके से ब्लॉक कर दिया, कर्मचारियों को अंदर जाने से रोका और कामकाज को रोका। इसके साथ ही तोड़-फोड़ और आगजनी करने की धमकी भी दी।

11 और 13 अप्रैल को भी ऐसी ही घटनाएं हुईं। पुलिस के मुताबिक, कर्मचारियों को WhatsApp ग्रुप में जोड़ा गया और बाहरी लोगों ने उन्हें प्रदर्शन करने के लिए उकसाया। अभियोजन पक्ष ने कहा कि एक आरोपी को मौके पर ही पकड़ लिया गया, जबकि वह कंपनी का कर्मचारी भी नहीं था।

सेशन कोर्ट ने क्या कहा?

26 लोगों को जमानत देते हुए कोर्ट ने कहा कि एफआईआर घटना के लगभग दस दिन बाद दर्ज की गई थी और कई आरोपियों के नाम एफआईआर में शामिल नहीं थे और इस देरी का कोई सही कारण भी नहीं बताया गया।

कोर्ट ने कहा, “एफआईआर में गलत तरीके से बंधक बनाने, तोड़-फोड़ करने और आगजनी की धमकी देने का आरोप है, लेकिन आगजनी या किसी को चोट लगने की कोई घटना सामने नहीं आई है।” हाई कोर्ट ने ऐसे छह मामलों में जमानत दे दी।

एक आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी गई क्योंकि उसके खिलाफ पुलिस ने CCTV फुटेज और अन्य सबूत पेश किए जिससे हिंसा में उसकी भूमिका साबित होती थी।

  1. 6- एफआईआर संख्या 172/2026, पुलिस स्टेशन: नोएडा फेज I

इस एफआईआर में क्या आरोप था?

ऑटो पार्ट्स बनाने वाली कंपनी के कर्मचारियों ने ज्यादा वेतन और अतिरिक्त छुट्टियों की मांग करते हुए सड़क को जाम कर दिया, सरकारी और कंपनी की संपत्ति को नुकसान पहुंचाया और पुलिसकर्मियों पर पत्थर फेंके, इसमें कई अफसर घायल हो गए। पुलिस ने कहा कि इससे डर और अशांति का माहौल बन गया।

सेशन कोर्ट ने क्या कहा?

21 लोगों को जमानत देते हुए कोर्ट ने कहा कि सिर्फ यह आरोप था कि आरोपी विरोध प्रदर्शन कर रही भीड़ में शामिल थे। कोर्ट ने कहा, “ऐसा लगता है कि वे कर्मचारियों के हितों से जुड़े विरोध प्रदर्शन का हिस्सा थे।”

कोर्ट ने कहा कि भीड़ में शामिल हर व्यक्ति की भूमिका को एक जैसा नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा, “भीड़ में सिर्फ मौजूदगी होने से ही हर आरोपी समान रूप से दोषी नहीं हो जाता।”

इस एफआईआर के तहत 21 लोगों को जमानत मिली जबकि 7 आरोपियों की याचिका खारिज कर दी गई।

  1. 7- एफआईआर संख्या 164/2026, पुलिस स्टेशन: नोएडा फेज II

इस एफआईआर से जुड़े अधिकतर मामलों में (41 में से 39) को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जमानत दे दी। हाई कोर्ट ने मामले के तथ्यों और परिस्थितियों, रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों और एक जैसी स्थिति वाले अन्य आरोपियों को मिली जमानत को ध्यान में रखा। इस मामले में 41 लोगों को जमानत मिली।

नोएडा में मजदूरों का विरोध प्रदर्शन क्यों शुरू हुआ?

  1. पहला- एलपीजी सिलेंडर की बढ़ती कीमत मतलब यह कि पश्चिम एशिया के संकट के बीच एलपीजी सिलेंडर की कीमतें बढ़ रही थीं और इससे मजदूरों पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा था।
  2. दूसरा- लेबर कोड को लेकर फैली अफवाह, मार्च के आखिर में WhatsApp पर अफवाह फैली कि नए लेबर कोड से कम से कम मजदूरी (मिनिमम वेज) बढ़ जाएगी।
  3. तीसरा- हरियाणा के मानेसर में वेतन बढ़ाने को लेकर हुए प्रदर्शन, हरियाणा के मानेसर में मजदूरों ने वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किया था। इसके बाद नोएडा के मजदूर भी आंदोलन पर उतर आए।

मजदूरों ने बढ़ते आर्थिक बोझ, ब्लैक मार्केट में एलपीजी की बढ़ती कीमतों, काम के टारगेट और प्रोविडेंट फंड जैसी सुविधाओं के न होने की बात कही। ज्यादातर लोगों को ठेकेदारों के जरिए अस्थायी तौर पर काम पर रखा गया था।

कर्मचारियों का कहना था कि उनकी शिफ्ट आठ घंटे की थी लेकिन वे 10-12 घंटे तक काम करते थे और इसमें भी उन्हें ज्यादा ब्रेक नहीं मिलता था। महिलाओं की सुरक्षा भी एक मुद्दा थी।

कितना वेतन बढ़ा?

हरियाणा के मानेसर में हुए विरोध प्रदर्शन के बाद राज्य की नायब सिंह सैनी सरकार ने 9 अप्रैल को कम से कम मासिक मजदूरी में 35% की बढ़ोतरी का ऐलान किया। इस बढ़ोतरी को 1 अप्रैल से लागू किया गया। अन स्किल्ड मजदूरों के लिए 15,220.71 और हाई स्किल्ड मजदूरों के लिए 19,425.85 रुपये मजदूरी रखी गई।

हरियाणा में वेतन बढ़ाए जाने के बाद नोएडा के मजदूरों का विरोध प्रदर्शन और तेज हो गया। बाद में यह प्रदर्शन हिंसक हो गया, जब मजदूर और कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आए। 14 अप्रैल को उत्तर प्रदेश सरकार ने भी अंतरिम मजदूरी में बढ़ोतरी की घोषणा की और इसके बाद नोएडा में हालात सामान्य हुए।

गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) और गाजियाबाद में अन स्किल्ड मजदूरों के लिए वेतन 11,313 से बढ़ाकर 13,690 और स्किल्ड मज़दूरों के लिए 13,940 से बढ़ाकर 16,868 रुपये कर दिया गया। नोएडा में अधिकारियों ने ठेकेदारों को चेतावनी दी कि उनके खिलाफ शिकायत मिली तो इससे सख्ती से निपटा जाएगा।

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नोएडा में फैक्ट्री कर्मचारियों ने इस साल अप्रैल के महीने में विरोध प्रदर्शन किया था। पुलिस प्रदर्शन में शामिल लोगों की तलाश कर रही थी। इसमें से दो लोगों को पुलिस ने उनके घर के पास से पकड़ा, एक को काम की तलाश करते समय और एक को पूरी सब्जी लेने के लिए घर से बाहर निकलते समय। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर।