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मुस्लिम और अकेली महिलाओं के लिए शहरों में घर पाना मुश्किल

भारतीय शहरों में मकान मालिकों के धर्म और खानपान के आधार पर घर किराए पर ना देने की घटनाओं ने अल्‍पसंख्‍यकों और अकेले रहने वाले लोगों के मुश्किल खड़ी कर दी है।

Author January 24, 2017 4:08 PM
ईपीएफओ अपने सदस्यों के लिये 2019 से पहले आवास योजना शुरू करेगी। (Representative Image)

भारतीय शहरों में मकान मालिकों के धर्म और खानपान के आधार पर घर किराए पर ना देने की घटनाओं ने अल्‍पसंख्‍यकों और अकेले रहने वाले लोगों के मुश्किल खड़ी कर दी है। इसके चलते देश की बहुसांस्‍कृतिक अवस्‍था पर भी असर पड़ रहा है। जानकारों का कहना है इन सबके चलते भारतीय शहर समुदायों के आधार पर बस्तियों में बंट गए हैं। पिछले दिनों एक भारतीय रियल एस्‍टेट कंपनी ने विज्ञापन चलाया था। इसकी पंचलाइन थी, ”घर जो भेदभाव नहीं करते।” इसके जरिए लिंग, धर्म, जाति और खानपान के आधार पर किए जाने वाले भेदभाव को खत्‍म किए जाने की मांग की गई। यह विज्ञापन चलाने वाली कंपनी नेस्‍टअवे टेक्‍नॉलॉजीज के ऋषि डोगरा ने बताया, ”यह 2017 है और हम भी भेदभाव का सामना कर रहे हैं। लोगों को देश में कहीं भी जाने और रहने की सुविधा होनी चाहिए।” डोगरा और उनके चार साथियों को बेंगलुरु में घर ढूंढ़ने में काफी दिक्‍कतों का सामना करना पड़ा था।

इस तरह के भेदभावों के चलते लोगों को उपनगरीय क्षेत्रों की ओर जाना पड़ता है। महंगे किराए ने पहले से ही दिक्‍कतें बढ़ा रखी हैं। मुंबई में पारंपरिक रूप से कैथोलिक, पारसी और बोहरा मुस्लिम समुदायों की कॉलोनियां थी। भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की सह संस्‍थापक जकिया सोमन ने बताया कि जैसे-जैसे शहर बढ़ता गया तो बाहर से कई लोग रोजगार और शिक्षा के लिए मुंबई आने लगे। 1992-93 के हिंदू-मुस्लिम दंगों के बाद माहौल और बिगड़ गया। उनके अनुसार, ”जब बात रहने की जगह की आती है तो हम काफी संकुचित हो जाते हैं। नतीजा यह हुआ कि शहर तेजी से बस्‍ती बन रहे हैं और हमारे सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचा।”

घर देने में भेदभाव के मामलों में कई बार अदालतों ने फैसले दिए लेकिन कुछ विरोधाभाषी फैसले भी हुए। साल 2005 में एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहमदाबाद में पारसी समुदाय के हक में फैसला देते हुए कहा कि वह अपनी सदस्‍यता पारसियों तक सीमित रख सकते हैं। रियल इस्‍टेट मामलों के वकील विनोद सम्‍पत ने बताया कि संविधान समानता के अधिकार की बात कहता है लेकिन हाउसिंग सोसायटी अपने हिसाब से नियम बना लेती हैं जो कि भेदभाव वाली हो सकती हैं। सरकार से जुड़े लोगों का कहना है कि भेदभाव के मामलों के निपटारे के लिए संविधान में प्रावधान हैं। अलग से नियम की जरुरत नहीं है।

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