सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड के हल्द्वानी में अतिक्रमण के मामले में कहा है कि रेलवे की जमीन पर अतिक्रमण करने वालों को वहां रहने का कोई कानूनी हक नहीं है। अदालत ने कहा है कि जिस जमीन को अतिक्रमण मुक्त करने की मांग की गई है वह जमीन रेलवे की है।

अदालत ने उत्तराखंड विधि सेवा प्राधिकरण को एक शिविर आयोजित करने का निर्देश दिया ताकि बेदखली का सामना कर रहे परिवार प्रधानमंत्री आवास योजना (पीएमएवाई) के तहत पुनर्वास के लिए आवेदन कर सकें।

सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने कहा कि जिन लोगों ने जमीन पर अतिक्रमण किया है, उन्हें वहीं पुनर्वासित किए जाने की मांग करने का कोई अधिकार नहीं है। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, “किसी भी महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए दोनों ओर खाली जगह की जरूरत होती है। वहां रहने वाले लोग यह तय नहीं कर सकते कि रेलवे लाइन कहां बिछाई जाए।”

यह राज्य का विशेषाधिकार- जस्टिस बागची

जस्टिस बागची ने कहा कि यह जमीन राज्य की है और इसका इस्तेमाल कैसे किया जाए, यह तय करना राज्य का विशेषाधिकार है। अदालत ने कहा कि लोगों का रेलवे लाइन के पास रहना असुरक्षित है। अदालत ने सुझाव दिया कि उन्हें किसी सुरक्षित जगह पर चले जाना चाहिए। सीजेआई ने कहा कि अदालत रेलवे से परियोजना को स्थानांतरित करने के लिए नहीं कह सकती, क्योंकि यह विशेषज्ञों का काम है।

शीर्ष अदालत उत्तराखंड हाई कोर्ट के 22 दिसंबर, 2022 के उस आदेश के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें रेलवे की जमीन पर रहने वालों को बेदखल करने का आदेश दिया गया था।

शीर्ष अदालत ने नैनीताल के जिलाधिकारी, हल्द्वानी के उप जिलाधिकारी और जिला स्तरीय विधि सेवा प्राधिकरण के सदस्यों सहित अन्य अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे इलाके का दौरा करें और शिविर लगाएं जिससे प्रभावित परिवारों की पीएमएवाई के फॉर्म भरने सहित अन्य औपचारिकताएं पूरी करने में मदद की जा सके।

प्रशांत भूषण ने क्या दलील दी?

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि उनके मुवक्किल हल्द्वानी रेलवे स्टेशन और उसके आसपास के क्षेत्र में पिछले चार से पांच दशकों से रह रहे हैं। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने पहले कहा था कि वह इस क्षेत्र को विनियमित करेगी लेकिन इस दिशा में कुछ नहीं किया गया।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश एक अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने कहा कि क्षेत्र में कई धार्मिक स्थल हैं और लोगों को वहां से हटाने से पहले उनका पुनर्वास किए जाने की जरूरत है। इस पर सीजेआई ने गोंजाल्विस से कहा, “इन लोगों पर दया कीजिए। ये लोग खराब हालात में रह रहे हैं, जहां पीने लायक पानी, बिजली और सीवेज की कोई व्यवस्था नहीं है। उन्हें खुद तय करने दीजिए कि वे पीएमएवाई योजना के तहत आवास चाहते हैं या नहीं। और अगर कोई मुश्किल आती है, तो अदालत उसे हल करेगी।”

केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि रेलवे के लिए विस्तार परियोजना जरूरी है क्योंकि हल्द्वानी से ऊपर पहाड़ियां शुरू हो जाती हैं। उन्होंने दलील दी कि कुछ साल पहले नदी का पानी पटरियों में घुस गया था, जिससे रेलवे के बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा था।

रेलवे ने 2024 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर पांच जनवरी 2023 के उस आदेश को रद्द करने का अनुरोध किया था, जिसके तहत हल्द्वानी में रेलवे के दावे वाली 29 एकड़ भूमि से अतिक्रमण हटाने के उत्तराखंड हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी गई थी। याचिका में अनुरोध किया गया था कि रेल परिचालन को सुगम बनाने के लिए जमीन का एक टुकड़ा तत्काल आधार पर उपलब्ध कराया जाए, क्योंकि पटरियों की सुरक्षा करने वाली एक दीवार 2023 के मानसून के मौसम के दौरान गिर गई थी।

50,000 लोग बसे हैं विवादित जमीन पर

रेलवे के मुताबिक, संबंधित जमीन पर 4,365 अतिक्रमणकारी हैं, जो हल्द्वानी में विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि वे इसके असली मालिक हैं। विवादित जमीन पर चार हजार से अधिक परिवारों के लगभग 50,000 लोग रहते हैं, जिनमें अधिकांश मुस्लिम हैं।

शीर्ष अदालत ने हल्द्वानी में रेलवे के दावे वाली 29 एकड़ जमीन से अतिक्रमण हटाने के उत्तराखंड हाई कोर्ट के आदेश पर पांच जनवरी, 2023 को यह करते हुए रोक लगा दी थी कि यह एक मानवीय मुद्दा है और 50,000 लोगों को रातोंरात बेदखल नहीं किया जा सकता।