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जनसत्ता विशेष: काम के लिए गांव-दर छूटने का मलाल नहीं, पर अब तो दवा भी मयस्सर नहीं

बिहार के इमरान एक मैकेनिक हैं। किराए के एक कमरे में वह अपने तीन बच्चों और पत्नी के साथ रहते हैं। बड़े दुखी मन से इमरान बताते हैं, ‘मेरा तीन साल का छोटा बेटा रूमान बार-बार बोलता है कि पापा कुछ ला दो। अब इसे कैसे समझाऊं कि बंदी चल रही है।’

Author Published on: April 1, 2020 2:42 AM
विषाणु से नहीं हम अपने लोगों की प्रताड़ना से ज्यादा मरेंगे।

तमन्ना अख्तर
‘घर में न राशन हैं और न ही मेरी रोजमर्रा की लेने वाली दवाइयां। …क्या करूं…आज घर से निकला और सुबह के 8 बजे से 10 बजे तक इधर-उधर घूमता रहा। पर न कहीं राशन मिला, न ही दवाइयां। हार कर जब घर वापसी का रुख किया तो अचानक निगाह पड़ी कि नीचे की गली में एक दुकानदार दुकान का आधा दरवाजा खोल कर कुछ सामान बेच रहा है। तब जाकर राहत मिली और मैं कुछ राशन ले आया। दवा तो अभी दूर की बात ही लग रही है।’

यह बताते हुए आंध्र प्रदेश के आनंद राव के चेहरे पर बेबसी साफ झलक रही थी। वह यहां किराए के घर में रहते हैं। राव को तो फिर भी कुछ मिल गया पर अचानक घोषित संपूर्ण बंदी से प्रभावित अन्य लोग रोजमर्रा के सामान के लिए काफी दिक्कतों का सामना कर रहे हैं।

गैमन कंपनी में कार्यरत फहीम अहमद ट्रक चलाते हैं। उन्होंने बताया, ‘वैसे भी कंपनी हमे समय पर वेतन नहीं देती। पिछले महीने होली के कारण दो महीने बाद 10 तारीख से पहले वेतन मिला। इस महीने हमें बहुत चिंता हो रही है। मैं यहां पत्नी और दो बेटों के साथ रहता हूं। वैसे भी इस महीने कुछ काम नहीं रहा। पता नहीं कंपनी कितनी तनख्वाह देगी। चिंता के मारे मेरी रातों की नींद उड़ी हुई है। थोड़े बहुत पैसे तो है मेरे पास…पर इनके खत्म होने के बाद पता नहीं क्या करूंगा।’
निखत (बदला हुआ नाम ) पहलगाम से अपने बच्चों के साथ हर साल की तरह इस साल भी उधमपुर में छुट्टियां मनाने आई हुई है। बकौल निखत, ‘मेरी लड़की पहली कक्षा में पढ़ती है। साल पूरे होने को है और वह स्कूल तक नहीं गई। पहले धारा 370 हटाने के कारण स्कूल बंद पड़े थे और अब कोरोना के कारण।

बिहार के इमरान एक मैकेनिक हैं। किराए के एक कमरे में वह अपने तीन बच्चों और पत्नी के साथ रहते हैं। बड़े दुखी मन से इमरान बताते हैं, ‘मेरा तीन साल का छोटा बेटा रूमान बार-बार बोलता है कि पापा कुछ ला दो। अब इसे कैसे समझाऊं कि बंदी चल रही है।’

जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग के नीचे के रास्ते गली में रह रहे बाशिंदों के लिए जग्गा (स्थानीय दुकानदार) एकमात्र सहारा हैं। थोड़ी बहुत सब्जियां, राशन का सामान वह अपनी छोटी से दुकान में रख रहा है। संपूर्ण बंदी के सातवें दिन स्थानीय निवासी सब्जी लेने पहुंची हलीमा कहती है, ‘सात दिन हो गए संपूर्ण बंदी को… अबतक कोई भी सब्जियां या राशन पहुंचाने घर नहीं आया। हैरानी की बात तो यही थी प्रशासन के निर्देशों के बावजूद निर्धारित समय पर दवाइयों की दुकानें बंद था।’

कोट
स्थानीय लोग प्रशासन के साथ सहयोग कर रहे हैं। अप्रवासी मजदूर तबके के लिए हमने सामाजिक रसोई का इंतजाम किया है। साथ ही हमने ऐसे लोगो के मालिकों को आदेश जारी किए है कि वे इस समय इन लोगों की भरपूर मदद करें। लोगो से आग्रह है कि वे हड़बड़ाहट मे खरीददारी न करें। जमीनी स्तर पर जांच करने के लिए हमने निगरानी दलों की नियुक्ति की हुई है। सबसे अच्छी बात यह है कि यहां लोग जागरूक है और इसी कारण यदि कोई यह छुपाता है कि वह पिछले दिनों कहां की यात्रा करके आया है, तो लोग खुद फोन कर हमे उसकी जानकारी देते हैं।
डॉ. पीयूष सिंगला, उपायुक्त

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