दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में छात्रों और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अत्यधिक या गैरकानूनी बल प्रयोग के आरोपों से इनकार कर दिया है। दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में यह जानकारी दी है। पुलिस का कहना है कि 20 जुलाई को शुरू हुआ प्रदर्शन शांतिपूर्ण था लेकिन बैरिकेड तोड़े जाने और प्रदर्शनकारियों के संसद की ओर बढ़ने की कोशिश के बाद स्थिति हिंसक हो गई। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने इन आरोपों समेत अन्य मुद्दों की जांच के लिए उच्च स्तरीय कमेटी के गठन की बात कही है।
पुलिस के मुताबिक, प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए करीब 5000 पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई थी। प्रदर्शनकारी करीब 3 किलोमीटर के इलाके में मौजूद थे और उनकी संख्या 30000 से ज्यादा थी। पुलिस ने कहा कि भीड़ के नियंत्रण से बाहर होने के बाद हालात को संभालने के लिए चरणबद्ध तरीके से बल का इस्तेमाल किया गया।
बैरिकेड तोड़ने और पुलिस पर हमले का आरोप
दिल्ली पुलिस ने अपने हलफनामे में कहा कि नई दिल्ली जिले मे उस समय BNSS की धारा 163 के तहत आदेश लागू थे। पुलिस का दावा है कि प्रदर्शनकारियों को बार-बार चेतावनी दी गई और वहां से हटने की अपील की गई। लेकिन इन अपीलों को नजरअंदाज किया गया।
पुलिस के अनुसार, कई जगहों पर बैरिकेड तोड़े गए और कुछ प्रदर्शनकारियों ने पुलिसकर्मियों पर हमला किया। सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का आरोप भी लगाया गया है। पुलिस ने कहा कि अन्य सभी उपायों के काम ना करने के बाद ही न्यूनतम जरूरी बल का इस्तेमाल किया गया।
हलफनामे में टियर स्मोक और सीमित लाठीचार्ज के इस्तेमाल को भी उचित बताया गया है। पुलिस का कहना है कि कार्रवाई का उद्देश्य भीड़ को तितर-बितर करना और कानून-व्यवस्था बनाए रखना था।
240 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल
दिल्ली पुलिस ने बताया कि प्रदर्शन के दौरान 240 से अधिक पुलिसकर्मियों को चोटें आईं। करीब 218 प्रदर्शनकारियों का मेडिको-लीगल परीक्षण कराया गया।
पुलिस ने यह भी कहा कि प्रदर्शन स्थल पर सादे कपड़ों में अधिकारियों को ‘स्पॉटर्स’ के तौर पर तैनात किया गया था। इन अधिकारियों का काम हिंसा या आपराधिक गतिविधियों में शामिल लोगों की पहचान करना था।
फेस रिकग्निशन सिस्टम के इस्तेमाल का बचाव
दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन स्थल पर फेस रिकग्निशन सिस्टम के इस्तेमाल का भी बचाव किया है। पुलिस के मुताबिक, सिस्टम के जरिए 2873 लोगों का मिलान पहले से मौजूद आपराधिक रिकॉर्ड से हुआ। इनमें से 92 लोगों के खिलाफ 10 से अधिक मामलों में कथित संलिप्तता पाई गई।
पुलिस ने कहा कि आपराधिक तत्वों की भूमिका की जांच के लिए एक विशेष जांच टीम (SIT) गठित की जाएगी। साथ ही, पुलिस ने कहा है कि अगर सुप्रीम कोर्ट किसी समिति के गठन का फैसला करता है तो वह उसके साथ पूरा सहयोग करेगी।
‘चुनिंदा तस्वीरों और अधूरे वीडियो पर आधारित हैं याचिकाएं’
अपने जवाब में दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन के दौरान कथित पुलिस ज्यादती से जुड़ी याचिकाओं पर भी सवाल उठाए। पुलिस का कहना है कि याचिकाओं में चुनिंदा तस्वीरों और अधूरे वीडियो को आधार बनाया गया है जबकि पूरे घटनाक्रम और उस समय की परिस्थितियों को ध्यान में नहीं रखा गया।
पुलिस ने अपने हलफनामे में कहा है कि उसकी कार्रवाई कानूनी, सद्भावनापूर्ण और परिस्थितियों के अनुपात में थी। पुलिस ने यह भी स्पष्ट किया कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पहले चेतावनी, अपील और अन्य उपाय अपनाए गए और जब वे प्रभावी नहीं हुए तभी बल का इस्तेमाल किया गया।
अब सुप्रीम कोर्ट के सामने पुलिस के इस जवाब के साथ प्रदर्शनकारियों की ओर से लगाए गए बल प्रयोग के आरोपों और पुलिस के दावों पर सुनवाई होगी।
‘भीड़ में फंसने पर कांस्टेबल ने AK-47 से हवा में चलाई थीं 4 गोलियां’, सुप्रीम कोर्ट में बिहार पुलिस
बिहार में 25 जुलाई को बंद और ‘जंतर-मंतर’ विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा को लेकर बिहार पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया है। पुलिस ने अदालत को बताया कि सिवान में भीड़ में फंसने के बाद जिला इंटेलिजेंस यूनिट (DIU) के एक कांस्टेबल ने अपनी AK-47 राइफल से हवा में चार राउंड फायर किए थे। हालांकि इस फायरिंग में कोई घायल नहीं हुआ।
