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मोदी की बचेगी, पर अविश्‍वास प्रस्‍ताव के चलते जा चुकी है इन प्रधानमंत्रियों की कुर्सी!

लाल बहादुर शास्त्री के बाद इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री बनीं। कुल 15 साल के कार्यकाल में उन्हें कुल पंद्रह बार यानी औसतन हर साल अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा लेकिन एक बार भी विपक्ष को सफलता हाथ नहीं लग सकी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

लोकसभा में नरेंद्र मोदी सरकार कल (20 जुलाई) पहला अविश्वास प्रस्ताव का सामना करेगी। हालांकि, विपक्ष का यह प्रस्ताव औंधे मुंह गिरना तय है लेकिन भारतीय संसदीय इतिहास में यह 26वीं बार होगा जब विपक्ष ने प्रधानमंत्री के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया है। इनमें से कई प्रधानमंत्रियों ने तो अपनी कुर्सी बचा ली लेकिन कई प्रधानमंत्रियों की कुर्सी चली गई। विपक्ष के विश्वास मत परीक्षण में कुर्सी गंवाने वालों में बीजेपी के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी शामिल हैं। 1999 में तो उन्हें एक वोट की वजह से कुर्सी गंवानी पड़ी थी।

संसदीय इतिहास पर नजर डालें तो सबसे पहला अविश्वास प्रस्ताव देश के पहले प्रधानंमत्री जवाहर लाल नेहरू के खिलाफ 1963 में आया था। कांग्रेस का दोबारा अध्यक्ष न बनाए जाने से नाराज जे बी कृपलानी ने कांग्रेस छोड़कर किसान मजदूर प्रजा पार्टी बना ली थी, जो बाद में सोशलिस्ट प्रजा पार्टी बनी। नेहरू सरकार के खिलाफ कृपलानी के अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में मात्र 62 वोट मिले थे जबकि नेहरू सरकार के पक्ष में 347 वोट पड़े थे। नेहरू के बाद प्रधानमंत्री बने लाल बहादुर शास्त्री को करीब दो साल के कार्यकाल में तीन बार अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा था लेकिन विपक्ष को उसमें भी सफलता हाथ नहीं लग पाई।

लाल बहादुर शास्त्री के बाद इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री बनीं। कुल 15 साल के कार्यकाल में उन्हें कुल पंद्रह बार यानी औसतन हर साल अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा लेकिन एक बार भी विपक्ष को सफलता हाथ नहीं लग सकी। विपक्ष को पहली बार अविश्वास प्रस्ताव पर 1978 में सफलता मिली जब मोरराजी देसाई की सरकार गिरी। उनके खिलाफ दो बार अविश्वास प्रस्ताव आया था, पहली बार तो उनकी सरकार बच गई लेकिन दूसरी बार पार्टी के अंतर्विरोधों की वजह से मोरारजी सरकार नहीं बच सकी।

देश में सबसे ज्यादा अविश्वास प्रस्ताव पेश करने का रिकॉर्ड सीपीएम नेता और पश्चिम बंगाल के दिवंगत मुख्यमंत्री ज्योति बसु के नाम दर्ज है जिन्होंने इंदिरा गांधी के खिलाफ कुल चार बार प्रस्ताव लाया था। पी वी नरसिम्हा राव सरकार के खिलाफ भी तीन बार अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था। हर बार उन्होंने इसे असफल करार दिया लेकिन 1993 में उनकी सरकार मात्र 14 वोट से बच सकी। हालांकि, उस वक्त राव सरकार पर झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को प्रलोभन देने के आरोप लगे थे।

अटल बिहारी वाजपेयी को भी तीन बार अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा था। पहली बार 1996 में उन्होंने विश्वास मत परीक्षण से पहले ही इस्तीफा दे दिया। दूसरी बार 1999 में एक वोट के अंतर से उनकी सरकार गिर गई लेकिन तीसरी बार 2003 में उन्होंने अविश्वास प्रस्ताव परीक्षण जीत लिया। 1990 के दशक में विश्वनाथ प्रताप सिंह, एचडी देवगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल की सरकार भी विश्वास मत प्रस्ताव नहीं जीत पाई। 1979 में भी चौधरी चरण सिंह की सरकार प्रस्ताव पर समर्थन नहीं जुटा पाई थी और उससे पहले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। साल 2008 में भी अमेरिका से परमाणु समझौते की वजह से तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था लेकिन कुछ वोटों से सरकार बच गई थी।

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