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किताब में हिंदू महिलाओं और पुजारियों का अपमान! सुप्रीम कोर्ट ने कहा नहीं लगेगा बैन

सुप्रीम कोर्ट ने एस हरीश की मलयालम में लिखी गई किताब मीशा पर बैन लगाने की मांग वाली उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें कहा गया कि किताब में महिलाओं और मंदिर के पुजारियों का आपत्तिजनक चित्रण किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट (फोटो सोर्स- एक्सप्रेस आर्काइव फोटो)

सुप्रीम कोर्ट ने एस हरीश की मलयालम में लिखी गई किताब मीशा पर बैन लगाने की मांग वाली उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें कहा गया कि किताब में महिलाओं और मंदिर के पुजारियों का आपत्तिजनक चित्रण किया गया है। भारत के मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा की अगुवाई में सुप्रीम कोर्ट बेंच ने किताबों पर बैन को गलत संस्कृति बताया। कोर्ट ने कहा, ‘किताब को संपूर्णता में पढ़ा जाना चाहिए, न कि टुकड़ों में बांटकर।’ याचिकाकर्ता ने किताब के अंशों को हटाने की मांग की थी जिसे कोर्ट ने सही नहीं माना।

किताबों पर प्रतिबंध की संस्कृति गलत: कोर्ट
इस याचिका पर पिछली सुनवाई दो अगस्त को हुई थी जिसमें कोर्ट ने कहा था कि किताबों पर प्रतिबंध लगाने की संस्कृति गलत है क्योंकि इससे विचारों का प्रवाह बाधित होता है। उस समय इस याचिका पर फैसला कोर्ट ने सुरक्षित रख लिया था। इसके बाद अगली सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने एन राधाकृष्णन की याचिका को खारिज कर दिया।

याचिकाकर्ता की दलील खारिज
याचिका में एन राधाकृष्णन ने किताब के कुछ अंशों को यह कहते हुए हटाने की मांग की थी कि उनमें हिंदू महिलाओं के बारे में अपमानजनक बातें कही गई हैं। याचिका में यह भी कहा गया है कि ब्राह्मण के बारे में किताब में लेखक ने जो टिप्पणी की है उनमें जातिवादी और नस्लीय घृणा झलकती है। याचिका पर टिप्पणी करते हुए जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि इंटरनेट के युग में इन बातों को इतना ज्यादा महत्व देने की जरूरत नहीं है। इस याचिका का विरोध करते हुए एडिशन सॉलिसिटर जनरल पिंकी आनंद ने कहा था कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ है।

किताब का हो रहा विरोध
मलयालम लेखक एस हरीश ने ‘मीशा’ लिखा है। मीशा का अर्थ होता है मूंछ। इस किताब को एक मलयालम पत्रिका ने श्रृंखला में प्रकाशित किया था लेकिन विरोध की वजह से बाद में पत्रिका इसको किताब के रूप में प्रकाशित करने से पीछे हट गई। बाद में डीसी बुक्स ने इसे प्रकाशित किया। फिर विरोधी इस किताब पर प्रतिबंध पर मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए जहां उनको निराश हाथ लगी।

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