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राज्यों ने की प्रस्तावित एनएमसी में अधिक प्रतिनिधित्व की मांग

नीति आयोग के साथ विचार-विमर्श में राज्यों ने प्रस्तावित राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) में अधिक प्रतिनिधित्व की मांग की है।

Author नई दिल्ली | September 26, 2016 12:09 AM
नरेंद्र मोदी सरकार ने योजना आयोग का नाम बदलकर नीति आयोग कर दिया था। (फाइल फोटो)

नीति आयोग के साथ विचार-विमर्श में राज्यों ने प्रस्तावित राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) में अधिक प्रतिनिधित्व की मांग की है। यह प्रस्तावित आयोग भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआइ) की जगह ले सकता है। सूत्रों के मुताबिक आयोग ने इस महीने की शुरुआत में राज्यों के साथ बैठकें की थी और राज्य सरकारों ने अपनी राय जाहिर की कि उन्हें एनएमसी के तहत संचालन मंडल में अधिक अधिकार मिलने चाहिए। राज्य सरकारों को लगता है कि एनएमसी के कामकाज में अधिक भागीदारी से ऐसे नीतियों और नियमों को बनाने में मदद मिलेगी जो अधिक व्यापक होंगे और राज्यों की आकांक्षाओं को पूरा करने में सहायक होंगे।

नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति ने विवादास्पद एमसीआइ को समाप्त करके उसकी जगह एनएमसी बनाने का प्रस्ताव रखा है। एमसीआइ के मुद्दे को देख रही समिति में पनगढ़िया के साथ प्रधानमंत्री के अतिरिक्त प्रधान सचिव पीके मिश्रा, नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत और स्वास्थ्य सचिव भी हैं। एमसीआइ की मौजूदा संरचना के तnहत प्रत्येक राज्य से एक सदस्य होता है और केंद्र सरकार एक केंद्रशासित प्रदेश को नामित करती है।

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एनएमसी प्रमुख नियामक संस्था होगी और एमसीआइ की सभी भूमिकाओं और जिम्मेदारियों को संभाल लेगी। नए आयोग में प्रतिष्ठित चिकित्सक और क्षेत्र के विशेषज्ञ होंगे जो देश में चिकित्सा शिक्षा के लिए काम करेंगे जिसमें वैश्विक मानदंडों का ध्यान रखा जाएगा। एनएमसी में करीब 19-20 सदस्य होंगे। इनमें एक अध्यक्ष होगा और सभी का कार्यकाल करीब पांच साल का होगा। इसमें अर्थशास्त्र और कानून जैसे दूसरे क्षेत्रों से भी सदस्य होंगे। एनएमसी में चार बोर्ड होंगे जिसमें स्नातक चिकित्सा बोर्ड, परास्नातक चिकित्सा बोर्ड, मान्यता और मूल्यांकन बोर्ड व मेडिकल कॉलेजों के पंजीकरण व व्यवसाय में आचरण पर निगरानी के लिए एक बोर्ड होगा। इस साल की शुरुआत में संसद की एक समिति ने एमसीआइ में आमूल-चूल बदलाव की सिफारिश की थी। उसका कहना था कि एमसीआइ नियामक की अपनी भूमिका निभाने में विफल रही है जिसकी वजह से भारत की चिकित्सा शिक्षा प्रणाली का स्तर गिरा है।

 

 

 

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