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पटना में हुए जुटान का दिल्ली में असर नहीं

बिहार की नई सरकार के पटना के गांधी मैदान में हुए शपथ ग्रहण समारोह में जुटे नेताओं में दिल्ली के धुरी विरोधी कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) के नेता भी शामिल हुए।

बिहार की नई सरकार के पटना के गांधी मैदान में हुए शपथ ग्रहण समारोह में जुटे नेताओं में दिल्ली के धुरी विरोधी कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) के नेता भी शामिल हुए। इससे देश में एक नई राजनीति शुरू होने की झलक दिखी। लेकिन दिल्ली में तनाव बढ़ गया। अंधाधुंध विज्ञापनों और नगर निगम के उप चुनाव टालने जैसे मुद्दों पर कांग्रेस आप सरकार को घेरने में लगी है। बावजूद इसके मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और आप के अन्य नेता कांग्रेस को नजरंदाज कर भाजपा पर हमला करते हैं। जिससे दिल्ली की राजनीति दो दलों में ही सिमट जाए।

अभी जिस तरह आप सरकार विधान को दर किनार कर केंद्र सरकार की बिना इजाजत के कई बिल विधानसभा में पेश कर रही है और जनलोकपाल बिल लाने वाली है। उसके खिलाफ भी भाजपा से ज्यादा कांग्रेस मुखर है। विधानसभा में भाजपा के महज तीन विधायक हैं। कांग्रेस का कोई विधायक नहीं है। इसके बाद भी आप नियमों को दरकिनार कर नया विवाद शुरू करना चाहती है। उसके नेता कह रहे हैं कि विपक्षी दल जनलोकपाल से डर रहे हैं, जबकि कांग्रेस और भाजपा लगातार इसकी मांग कर रहे हैं। दिल्ली की राजनीति में आप का प्रवेश कांग्रेस और भाजपा की कमियों से ही हुआ। साल 2008 में कांग्रेस लगातार तीसरी बार चुनाव जीती और शीला दीक्षित मुख्यमंत्री बनी। इतना ही नहीं ज्यादातर मंत्री भी पुराने ही रहे। विधायक भी कम बदले। कांग्रेस के नेताओं ने मान लिया कि दिल्ली की आबादी के बदले समीकरण में भाजपा को आसानी से जीत हासिल नहीं होगी। सरकार ने तमाम जनउपयोगी योजनाएं चलाईं लेकिन सरकार और कांग्रेस नेताओं की दूरी आम लोगों से ही नहीं कांग्रेसजनों से भी बढ़ती गई। बिजली,पानी, अनधिकृत कालोनी, सरकारी दफ्तरों और पुलिस के भ्रष्टाचार पर सीधा हमला कर आप नेताओं ने कांग्रेस के वोट बैंक से सीधा संवाद कर लिया। इसका लाभ उन्हें 2013 के चुनाव में मिला। अल्पसंख्यकों के वोट से उन्हें आठ सीट मिली। लेकिन 2015 के चुनाव में अल्पसंख्यकों ने भी भाजपा को हराने के लिए आप को वोट देकर कांग्रेस का सफाया कर दिया। यही हालत भाजपा की रही जो अब तक बनी हुई है।

डा. हर्षवर्धन 2008 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए मुख्यमंत्री पद के स्वाभाविक दावेदार थे। लेकिन भाजपा ने विजय कुमार मल्होत्रा को मुख्यमंत्री पद का दावेदार बना दिया था। इस वजह से बिना किसी अतिरिक्त तैयारी के शीला दीक्षित तीसरी बार मुख्यमंत्री बन गईं। इसी तरह 2013 में प्रदेश अध्यक्ष विजय गोयल के बजाए डॉक्टर हर्षवर्धन को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया। उस चुनाव में अल्पसंख्यकों ने गलत फहमी से कांग्रेस को वोट दे दिया अन्यथा उसी चुनाव में आप को पूरा बहुमत मिल जाता। भाजपा ने लोकसभा चुनाव को देखते हुए जोड़तोड़ से सरकार बनाने से इनकार किया तो आप की कांग्रेस के बिना मांगे समर्थन से सरकार बनी, जो केवल 49 दिन ही चली। उसके बाद आप ने पार्टी को राष्ट्रीय बनाने के चक्कर में दिल्ली में अपना जनाधार कम कर लिया। लोकसभा चुनाव में दिल्ली में एक भी सीट न मिलने पर आप लगभग बिखर गई। लेकिन भाजपा की गलत रणनीति ने उसे फिर से खड़ा होने का मौका दे दिया। कांग्रेस के बड़े धड़े से मिले समर्थन से सरकार नहीं बनाने के बाद फैसला लेने में देरी कर भाजपा ने खुद बाजी पलट दी।

भाजपा ने तय किया कि आप को महत्व नहीं देंगे लेकिन 10 जनवरी की रामलीला मैदान की सभा में प्रधानमंत्री मोदी सबसे ज्यादा अरविंद केजरीवाल पर बोले। इससे आप के लोगों की मनचाही मुराद पूरी हो गई। वे चाहते थे कि चुनाव मोदी बनाम केजरीवाल हो, वही होता चला गया। जिन हालातों में किरण बेदी का नाम घोषित किया गया, वह उल्टा पड़ गया। हालात ऐसे हो गए जैसे अरविंद केजरीवाल मुद्दा तय कर रहे हैं और भाजपा उसके हिसाब से चुनाव प्रचार कर रही है। सीधा चुनाव होने से कांग्रेस अप्रसंगिक हो गई। उसे केवल 9.7 फीसद वोट मिले और आप को 67 सीटें मिल गईं। कांग्रेस का खाता नहीं खुला। भाजपा को महज तीन सीटें मिलीं।

इस हार से उबरने के लिए कांग्रेस ने कुछ प्रयोग भी किए, भले ही वह अटपटा साबित हुए। 2013 के विधानसभा चुनाव के बाद जयप्रकाश अग्रवाल को हटाकर युवा अरविंदर सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। फरवरी 2015 के विधानसभा चुनाव के बाद उन्हें हटाकर अजय माकन को प्रदेश की बागडोर सौंपी गई। अगर माकन को ही प्रदेश अध्यक्ष बनाना था तो थोड़े दिनों के लिए लवली को क्यों बनाया गया और अगर लवली को बनाया गया तो उन्हें भी कुछ और मौका दिया जाता। निश्चत रूप से माकन इस समय कांग्रेस को सक्रिय करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं लेकिन पार्टी को शून्य से शिखर पर लाने में काफी समय लगेगा।
भाजपा ने चुनाव हारने के बाद कुछ किया ही नहीं। प्रदेश के नेताओं की बयानबाजी जारी है। कई बार उन मुद्दों पर भी बयान जारी कर दिए जाते हैं जिनका औचित्य नहीं होता है। दिल्ली में अभी सबसे पहले अगर निगम के उप चुनाव नहीं हुए तो पहला चुनाव 2017 के शुरू में नगर निगमों का होगा। उसमें सवा साल की देरी है। इस समय आप को शीर्ष पर बने रहने की कोशिश करनी है। कांग्रेस और भाजपा को अपनी ताकत बढ़ाना है। इसलिए भले ही बिहार के जश्न में कांग्रेस के साथ आप भी शामिल हुई हो। लेकिन दिल्ली में कांग्रेस और आप एक-दूसरे के जानी दुश्मन हैं।

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