बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा में जाने की तैयारियों के बीच राज्य में बीजेपी को अपना पहला मुख्यमंत्री मिल सकता है। बीजेपी के नेताओं का मानना है कि इसका असर पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में भी हो सकता है।

उत्तर प्रदेश में बीजेपी के कुछ नेताओं का मानना है कि बिहार में अगर बीजेपी का मुख्यमंत्री बनता है तो इससे ओबीसी वर्गों का समर्थन पार्टी को मिल सकता है। इसके साथ ही पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी पार्टी मजबूत हो सकती है। ऐसा इसलिए क्योंकि पूर्वी उत्तर प्रदेश के सामाजिक और राजनीतिक रिश्ते बिहार से जुड़े हुए हैं।

बीजेपी के एक वर्ग का मानना है कि बिहार में मुख्यमंत्री के चुनाव का असर उत्तर प्रदेश के जातीय समीकरणों पर भी पड़ेगा। उत्तर प्रदेश में उच्च जाति समूह में ठाकुर समुदाय से आने वाले योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री हैं।

उत्तर प्रदेश में कुशवाहा, मौर्य, सैनी और शाक्य समुदायों को एक बड़े ओबीसी वर्ग में रखा जाता है और राज्य के अलग-अलग इलाकों में इनका असर है। सैनी समुदाय पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रभावशाली है, वहीं कुशवाहा और मौर्य समुदाय मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश में और शाक्य समुदाय का असर बुंदेलखंड और ब्रज क्षेत्र में है।

बीजेपी और जेडीयू के नेताओं को उम्मीद है कि नीतीश कुमार की जगह कुर्मी, कुशवाहा या अति पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) का कोई नेता सत्ता में आ सकता है। यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी जो कुशवाहा समुदाय से आते हैं, वह बिहार की बागडोर संभालेंगे।

बिहार से लगती है पूर्वी उत्तर प्रदेश की सीमा

पूर्वी उत्तर प्रदेश की सीमा बिहार से लगती है। इस इलाके में बिहार की राजनीति का असर माना जाता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के महाराजगंज, कुशीनगर, देवरिया, बलिया, गाजीपुर, चंदौली और सोनभद्र जैसे जिलों में कुल 41 विधानसभा सीटें हैं।

2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी और उसकी सहयोगी निषाद पार्टी ने इन सीटों में से 27 पर जीत हासिल की, जबकि सपा और उसकी सहयोगी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (एसबीएसपी) को 12 सीटें मिली थीं। कांग्रेस और बसपा ने एक-एक सीट जीती थी। 2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी को इस क्षेत्र में करारा झटका लगा। सपा ने बलिया, गाजीपुर, चंदौली, रॉबर्ट्सगंज और सलेमपुर सहित पांच सीटें जीतीं, जो इन जिलों के लगभग 40 विधानसभा क्षेत्रों को कवर करती हैं। बीजेपी केवल तीन सीटें ही बरकरार रख पाई- कुशीनगर, महाराजगंज और देवरिया।

बीजेपी नेताओं का कहना है कि बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के बीच मजबूत राजनीतिक समन्वय से यहां पार्टी को अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने में मदद मिल सकती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में लोगों का तमाम इलाकों में आना-जाना है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में विशेष रूप से गोरखपुर और वाराणसी में बिहार से बड़ी संख्या में लोग इलाज के लिए आते हैं।

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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जैसे ही राज्यसभा के लिए नामांकन करने का ऐलान किया, उनकी पार्टी जेडीयू के दर्जनों कार्यकर्ता विरोध प्रदर्शन पर उतर आए। इन कार्यकर्ताओं ने पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा और केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर।