उत्तराखंड के कर्णप्रयाग में निहंग सिखों और स्थानीय लोगों के बीच हुआ छोटा सा झगड़ा बीजेपी के लिए बड़ी मुश्किल बन गया है। पंजाब और उत्तराखंड दोनों राज्यों में अगले कुछ महीनों के भीतर विधानसभा के चुनाव होने हैं और उत्तराखंड में बीजेपी की सरकार होने के चलते उसके सामने इस मामले में चुनौतियां ज्यादा हैं।

उत्तराखंड में स्थित श्री हेमकुंड साहिब यात्रा में हर साल हजारों सिख श्रद्धालु और निहंग सिखों के जत्थे जाते हैं। ऐसे में इस विवाद के भड़कने की वजह से स्थिति काफी संवेदनशील है।

पहले बात करते हैं कि यह लड़ाई शुरू कहां से हुई। 16 जून को कर्णप्रयाग के स्थानीय बाजार में निहंग सिखों और स्थानीय लोगों के बीच पार्किंग को लेकर झगड़ा हुआ था।

इस मामले में निहंग सिखों ने तलवार मारकर चार लोगों को घायल कर दिया था। उत्तराखंड की पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर पंजाब के मोहाली के रहने वाले चार निहंग सिखों को गिरफ्तार कर लिया था।

गुरुद्वारे पर कब्जे की कोशिश

इस घटना के बाद निहंग सिख बुरी तरह भड़क गए और उन्होंने अपने साथियों की रिहाई की मांग के लिए रुद्रप्रयाग जिले के नगरासू में स्थित गुरुद्वारे पर कब्जा करने की कोशिश की। निहंग सिख चार दिन तक गुरुद्वारे की छत पर चढ़े रहे और पुलिस और प्रशासन की काफी मशक्कत के बाद नीचे उतरे।

उत्तराखंड के लोगों का कहना है कि पुलिस और सरकार को निहंग सिखों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए थी। गुरुद्वारे पर कथित कब्जे के प्रकरण के बाद पंजाब से निहंग सिखों का जत्था आगे बढ़ा और पुलिस के रोकने के बाद भी जबरन उत्तराखंड में घुस गए। निहंग सिख इस बात पर अड़े हुए हैं कि उनके सभी साथियों को रिहा किया जाना चाहिए।

पंजाब के कई सिख संगठनों ने भी इस मामले को उठाया। उन्होंने उत्तराखंड के डीजीपी से मुलाकात की और निहंग सिखों को रिहा करने की मांग की।

बीजेपी के लिए मुश्किल क्यों है यह मामला?

बीजेपी के लिए मुश्किल है कि यह घटना उत्तराखंड शासित राज्य में हुई है। उत्तराखंड में उसकी सरकार है और इसलिए पंजाब में विपक्षी राजनीतिक दल और सिख संगठन इस मामले को उठाते हुए बीजेपी को घेर रहे हैं।

उत्तराखंड में सिखों का पवित्र स्थल श्री हेमकुंड साहिब है। यहां हर साल हजारों सिख श्रद्धालु आते हैं और जब से यह विवाद हुआ तो स्थानीय लोगों और निहंग सिखों को लेकर सोशल मीडिया पर पंजाब और उत्तराखंड के लोगों के वीडियो की बाढ़ आ गई है।

बीजेपी के लिए मुश्किल यह है कि अगर उत्तराखंड की सरकार कर्णप्रयाग में हुई तलवारबाजी की घटना में शामिल निहंग सिखों को रिहा कर देती है तो उसे उत्तराखंड के लोगों की भयंकर नाराजगी को झेलना पड़ेगा।

उत्तराखंड के लोगों का क्या कहना है?

उत्तराखंड के लोगों का कहना है कि निहंग सिखों ने स्थानीय लोगों के खिलाफ जिस तरह की आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया है, यह पूरी तरह उनकी पहचान और स्वाभिमान पर हमला है।

क्षेत्रीय मुद्दों की राजनीति करने वाले उत्तराखंड क्रांति दल ने भी इसे जोर-शोर से उठाया है। इसके अलावा भी कई लोगों ने सोशल मीडिया पर अपनी भावनाओं को जाहिर किया है और कहा है कि उत्तराखंड में इस प्रकार की अराजकता को बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। स्थानीय लोग इस बात से भी नाराज हैं कि चार दिन तक गुरुद्वारे में हंगामा करने के बाद निहंग सिखों को आसानी से पंजाब जाने दिया गया। उत्तराखंड सरकार का कहना है कि वह इस मामले में नियम और कानूनों के मुताबिक ही काम करेगी।

अब बात करते हैं पंजाब की। पंजाब में सिख समुदाय राजनीतिक रूप से बेहद प्रभावशाली है। लगभग 58 से 60% सिख आबादी वाले इस राज्य में बीजेपी चुनावी तैयारियों में जुटी है। उसने पंजाब की सभी 117 सीटों पर अकेले विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया है। बीजेपी पिछले कई सालों से पंजाब में खुद को मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

पंजाब में सरकार बनाने का है मिशन

दिल्ली और पश्चिम बंगाल में जीत के बाद बीजेपी का अगला मिशन पंजाब में सरकार बनाने का है। उसने पंजाब की राजनीति में ताकतवर जट सिख समुदाय से आने वाले केवल सिंह ढिल्लों को अध्यक्ष बनाया। इससे पहले वह इसी समुदाय से आने वाले रवनीत सिंह बिट्टू को मोदी सरकार में मंत्री बना चुकी है। पंजाब में हिंदू बिरादरी के बड़े नेता तरुण चुघ को राज्यसभा भेजा। इसके अलावा हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी को बीजेपी ने पंजाब में पूरी तरह एक्टिव किया हुआ है। सैनी लगातार पंजाब के दौरे पर हैं। पंजाब चुनाव की तैयारियों पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की पैनी नजर है।

इस तरह पार्टी पंजाब में सोशल इंजीनियरिंग बनाकर आगे बढ़ना चाहती है। बीजेपी चाहती है कि वह भले ही राज्य में सरकार ना बना सके लेकिन पंजाब में उसकी मौजूदगी बड़ी राजनीतिक ताकत के रूप में दर्ज हो।

उत्तराखंड फैक्टर भी है अहम

एक अहम बात यह है कि पंजाब के अलावा उत्तराखंड में भी सिख समुदाय की ठीक-ठाक आबादी है। उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले के रुद्रपुर, काशीपुर, गदरपुर विधानसभा में सिख समुदाय जीत-हार तय करने की ताकत रखता है। इसके अलावा देहरादून के मैदानी इलाकों में भी सिख समुदाय की मौजूदगी है। इसलिए ना सिर्फ पंजाब के लिए बल्कि उत्तराखंड के लिहाज से भी बीजेपी को सिख और पंजाबी वोटों की अहमियत को ध्यान में रखते हुए कोई फैसला लेना होगा।

ऐसे में बीजेपी की हालत आगे कुआं पीछे खाई वाली है। बीजेपी को पंजाब के विधानसभा चुनाव में सिख वोट बैंक को और साथ ही उत्तराखंड में भी आम लोगों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ना होगा। उसे उत्तराखंड के लोगों को भरोसा दिलाना होगा कि उसने कानून व्यवस्था के साथ कोई समझौता नहीं किया है और पंजाब का सिख उससे रुठे नहीं, इसे लेकर सतर्क रहना होगा।

चूंकि यह मामला सीधे तौर पर राजनीति और वोट बैंक से जुड़ा है, इसलिए काफी संवेदनशील है। देखना होगा कि बीजेपी इस राजनीतिक चुनौती से कैसे निपटती है?

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