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रेल दुर्घटनाओं पर ‘बेबाक बोल’ : हादसों की पटरी

देश में रेल दुर्घटनाएं क्यों होती हैं, इसकी वजह किसी से छुपी नहीं। न तो सरकार से और न ही आम आदमी से। लेकिन इसकी पूरी जानकारी होने के बाद भी ये हादसे हर साल सैकड़ों लोगों को शिकार बना लेते हैं...

Author नई दिल्ली | August 29, 2015 08:53 am
5 अगस्त 2015 को मध्यप्रदेश में हरदा के निकट हुए ट्रेन हादसे की एक तस्वीर। (पीटीआई फोटो)

देश में रेल दुर्घटनाएं क्यों होती हैं, इसकी वजह किसी से छुपी नहीं। न तो सरकार से और न ही आम आदमी से। लेकिन इसकी पूरी जानकारी होने के बाद भी ये हादसे हर साल सैकड़ों लोगों को शिकार बना लेते हैं। जब भी कोई हादसा होता है, यह मुद्दा गरमा जाता है और बैठकों का एक सिलसिला शुरू होता है जो ऐसे मसलों पर गौर करने के लिए अगली बैठक तक के लिए स्थगित हो जाता है। इस बार भी आंध्र प्रदेश में एक हादसा हुआ जिसकी चपेट में और लोगों के साथ एक कांग्रेस विधायक भी आ गए। संयोग से यह हादसा भी उसी कारण से हुआ जिससे देश में 80 फीसद रेल हादसे होते हैं। एक क्रॉसिंग पर एक लारी से रेलगाड़ी की टक्कर हो गई।

दरअसल रेल दुर्घटना का असर बाकी किसी भी हादसे से कई गुना ज्यादा होता है। इसका सीधा कारण यात्रियों की संख्या है। भारत में अंतर्देशीय परिवहन के लिए रेल सबसे बड़ा माध्यम है। दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क में से एक भारत में हर रोज सवा दो करोड़ से भी ज्यादा यात्री सफर करते हैं जबकि 87 लाख टन के आसपास सामान ढोया जाता है। कुल 64,600 रूट के ट्रैक पर जरा-सी गफलत लाखों लोगों की जान को जोखिम में डाल सकती है। ऐसे में इन पटरियों पर यात्रियों और इनके आसपास से गुजरने वालों की सुरक्षा पर खास ध्यान देने की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन यह हो नहीं पाता, और यही वजह है कि हर साल हादसों से दो-चार होना पड़ता है।

देश की रेल व्यवस्था की खास बात यह है कि पहले से पता खामियों को दूर किए बिना ही हर साल रेल नेटवर्क के विस्तार पर जोर होता है। राजनीतिक कारणों से नए स्टेशन बनाए जाते हैं। नई पटरियां घोषित की जाती हैं, नए कोच कारखाने लगाए जाते हैं, पुराने स्टेशनों का दर्जा बढ़ाया जाता है। रेल बजट में भी बढ़ोतरी होती है। लेकिन घाटा बरकरार रहता है। एक मुद्दत से रेल विभाग में पैसे का टोटा है। पिछला वर्ष भी ऐसा था। लेकिन जहां से पैसा आ सकता है, वहां से इकट्ठा करने के राजनीतिक जोखिम हैं। जाहिर है कि यही वजह है कि 2015 के रेल बजट में किराए में बढ़ोतरी का कोई प्रस्ताव नहीं था। लेकिन अगले पांच वर्ष में 1,38,000 किलोमीटर नई पटरियां बिछाने का प्रस्ताव जरूर था।

रेलवे विभाग में होने वाले हादसों पर अब तक के मनन-मंथन के बाद यह पाया गया है कि 80 फीसद दुर्घटनाएं मानवीय चूक के कारण होती हैं। और इसका आधे से ज्यादा बड़ा हिस्सा मानवरहित क्रॉसिंग पर ही घटित होता है। सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो 2011-12 में जो 115 रेल दुर्घटनाएं हुर्इं, उनमें से 87.78 फीसद मानवीय भूल के कारण हुर्इं। उनमें से भी 52 रेलवे विभाग के कर्मचारियों और 63 दूसरे लोगों की गलती से हुर्इं। लेकिन इसमें राहत की यही बात रही कि वैश्विक स्तर पर मान्य रेलवे सुरक्षा मानकों की कसौटी पर दुर्घटनाओं में कमी हुई और तालिका में यह कमी 0.15 से कम होकर 0.13 हो गई। लेकिन असल में यह राहत बड़ी मामूली है और इससे कोई प्रशस्ति हासिल करने की उम्मीद करना भी बड़ी भूल है। देश की

रेलवे व्यवस्था में जो चीज दुर्घटनाओं का बायस बन रही है, वह है मानवरहित रेलवे फाटक। देश में दो वर्ष पहले तक 30 हजार से भी ज्यादा रेलवे क्रॉसिंग थे। उनमें 11563 मानवरहित और 18785 दूसरे रेलवे फाटक थे। करीब 40 फीसद हादसे इन फाटकों पर ही होते हैं। इस बजट में भी यह प्रावधान रखा गया है कि 3000 मानवरहित फाटक खत्म किए जाएंगे जबकि 917 ओवरब्रिज बनाए जाएंगे। लेकिन यह आंकड़ा कभी भी पूरी कामयाबी से दर्ज नहीं होता और ज्यादातर पर काम साल पूरा होने तक भी अधूरा ही रहता है। भारतीय रेलवे के ‘विजन 2020’ में यह प्रण है कि मानवरहित फाटक पूरी तरह खत्म करने हैं।

दर हकीकत, यह इतना आसान भी नहीं। लगभग हर साल ही सरकार ऐसी कसम खाती है और फिर व्यवस्था में ऐसी विषमता है कि यह कभी भी पूरी नहीं हो पाती। रेलवे की एक समीक्षा समिति ने 2012 में अपनी एक रिपोर्ट में पाया था कि हर साल 1500 लोग इन फाटकों पर अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं। इनमें से ज्यादातर लोग इन्हें पार करने की जल्दी में अपने प्राण दे बैठते हैं। इन मौतों पर आरोप-प्रत्यारोप और कानूनी पेचीदगियां अपनी जगह, लेकिन यह तथ्य अपनी जगह कायम है कि देश की रेल व्यवस्था का यह एक ऐसा पहलू है जिस पर काबू पाकर इसे ‘सामूहिक जनसंहार’ के आरोप से तो एक हद तक बचाया जा ही सकता है। फिलहाल ऐसी योजना है कि 2017 तक 30,348 रेलवे क्रॉसिंग में से 10,797 को तो सिरे से ही खत्म कर दिया जाए। यह फैसला भी किया जा चुका है कि कोई और नई क्रॉसिंग भविष्य में पटरियों पर न हो।

रेलवे फाटकों जैसा ही एक और भी घुन है जो विभाग को खोखला कर रहा है। महकमे में हर कदम पर भ्रष्टाचार का बोलबाला है। हाल में खुद रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने माना कि यहां भ्रष्टाचार का आलम है जिसे दूर किया जाएगा। यह भ्रष्टाचार ठेके आबंटित करने से लेकर ई-टिकट और आरक्षण तक फैला हुआ है। पिछले कुछ सालों में इस भ्रष्टाचार में दिनोंदिन बढ़ोतरी ही हुई है। खास बात यह है कि भ्रष्टाचार के मामलों में कथित संलिप्तता के कारण 6000 से भी ज्यादा अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय मामले चल रहे हैं। इन मामलों में कई आला अफसर भी संलिप्त बताए जाते हैं।

देश के नागरिकों के स्मृतिपटल पर रेलवे के हालिया भ्रष्टाचार का एक मामला अभी ताजा ही है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार के रेलमंत्री पवन कुमार बंसल को भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण ही अपना पद छोड़ना पड़ा था। यह मामला रेलवे की मौजूदा स्थिति का पर्दाफाश करने वाला था। सीबीआइ ने बंसल के भानजे विजय सिंगला को 90 लाख की रिश्वत लेने के आरोप में दबोचा। रिश्वत रेलवे बोर्ड के एक मौजूदा सदस्य की ओर से बड़ा ओहदा हासिल करने के एवज में दी जा रही थी। अब 90 लाख की रिश्वत देकर जो ओहदा हासिल किया जाएगा, उससे कितना लाभ होगा इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

इसके अलावा जो चीज रेलवे को नुकसान पहुंचा रही है, वह है इसका राजनीतिकरण। सबसे ज्यादा सियासत इसी विभाग को लेकर होती है। कहना न होगा कि अगर केंद्र में त्रिशंकु सरकार है तो इस महकमे के लिए घटक दल सिर-धड़ की बाजी लगा देंगे। तारीख गवाह है कि इस महकमे के लिए कभी तृणमूल कांग्रेस तो कभी राष्ट्रीय जनता दल तो कभी शिवसेना ने सरकार की नाम में दम कर दिया। इस बार केंद्र में स्पष्ट बहुमत से बनी भाजपा सरकार में तो खैर ऐसे किसी बाहरी दबाव की स्थिति ही नहीं थी। इसके बावजूद विभाग में कभी कोई ऐसा बड़ा सुधार देखने को नहीं मिला है। इस सरकार के पास न तो अपने बहुमत और न ही इच्छाशक्ति की कमी है, लिहाजा यह कार्यकाल रेलवे के लिए खास हो सकता है। लेकिन कितना हो पाएगा, यह देखने की बात है।

सुप्रीम अदालत में रेलवे क्रॉसिंग:
इस साल 28 फरवरी को एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे को कहा कि भले ही आपको बजट की दिक्कत हो, लेकिन आपको मानवरहित क्रॉसिंग पर हो रही मौतों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने ही होंगे। कोर्ट ने कहा कि कुछ क्रॉसिंग ऐसी हैं, जहां ऐसे हादसे हो रहे हैं, जो खतरनाक हैं। रेलवे को ऐसी खतरनाक क्रॉसिंग का पता लगाकर कोर्ट को बताना चाहिए।

इसके अलावा जहां नई पटरियां बिछाने की योजना है, वहां पहले से ही इसके लिए इंतजाम किए जाने चाहिए। जनहित याचिका में कहा गया था कि देशभर में करीब 13,500 मानवरहित क्रॉसिंग हैं, जिनकी वजह से आए दिन हादसे हो रहे हैं। याचिका में कहा गया है कि पिछले 25 सालों में करीब पांच हजार लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।

हादसे रोकेगा इसरो का ‘गगन’!:
मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग पर हादसे रोकने के लिए इसरो (इंडियन रिसर्च स्पेस आॅर्गेनाइजेशन) भी जुट गया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, इसरो जल्द ही रेलवे के इंजनों में गगन (जीपीएस) नामक चिप लगाएगा, जो सेटेलाइट सिस्टम से जुड़े होंगे। रेल लाइन की ध्वनि से ही चिप को आगे मानवरहित क्रॉसिंग का आभास हो जाएगा और हॉर्न बजने लगेगा। लगातार हॉर्न बजने पर लोग खुद ही अलर्ट होकर लाइन से हट जाएंगे।

मौत की क्रॉसिंग पर पिछला साल:

* 16 दिसंबर 2014 : बिहार के नवादा जिले में किउल-गया रेलखंड पर शफीगंज गांव के पास मानव रहित क्रॉसिंग पर गया-हावड़ा एक्सप्रेस ट्रेन की एक बोलेरो जीप से टक्कर हो गई। इसमें 5 लोग मारे गए और 3 घायल हो गए।

*7 फरवरी 2014 : उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले में मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग पर संपर्क क्रांति एक्सप्रेस ने एक बुलेरो को टक्कर मार दी, जिसके कारण उसमें सवार सात लोगों की मौत हो गई। घटना रामपुर रेलवे स्टेशन के पास गोकुलनगरी रेलवे क्रॉसिंग की है।

*19 मई 2014 : उत्तर प्रदेश सरकार में दर्जा प्राप्त मंत्री सतईराम यादव की कार को जौनपुर जिले में एक मानव रहित क्रॉसिंग पर ट्रेन ने टक्कर मार दी थी। हादसे में मंत्री की मौत हो गई थी। गौरा बादशाहपुर थाना क्षेत्र के सलसहा गांव में मानवरहित क्रॉसिंग पर सतईराम की कार को जौनपुर-औडहिर पैसेंजर ट्रेन ने टक्कर मार दी थी। हादसे में मंत्री के साथ ड्राइवर और गनर की भी मौत हो गई। बताया जा रहा है कि रेलवे क्रॉसिंग के पास मंत्री की कार खराब हो गई जिससे तेज गति से आती रेलगाड़ी ने टक्कर मार दी।

*24 जुलाई 2014 : तेलंगाना में मेडक जिले के चेगुंटा में मानव रहित रेलवे फाटक पर रेल और बस की टक्कर में बस चालक और स्कूली बच्चों सहित 18 लोगों की मौत हो गई। हादसे में 21 बच्चे घायल हुए थे। तत्कालीन रेल मंत्री सदानंद गौड़ा ने कहा था कि स्कूली बस के चालक की लापरवाही से यह हादसा हुआ था। ककातिया टेक्नो स्कूल के बच्चों को ले जा रही बस की निजामाबाद-सिकंदराबाद सेक्शन में वाडियाराम और माइसाइपेट स्टेशन के बीच नांदेड-हैदरबाद पैंसेजर गाड़ी से टक्कर हुई थी।

*19 अगस्त 2014 : बिहार के मोतीहारी में रेलवे क्रॉसिंग पर ट्रेन और ऑटो की टक्कर में 18 लोगों की मौत हो गई। मारे गए लोगों में 6 पुरुष, तीन महिलाएं और 9 बच्चे शामिल थे। घटना जिले में सुगौली-सेमरा रेलखंड पर सेमरा स्टेशन के पास हुई जब चिकनौता रेलवे क्रॉसिंग पर राप्ती-गंगा एक्सप्रेस ने सवारियों से लदे ऑटो को टक्कर मार दी। ऑटो में कुल 19 लोग सवार थे। मरने वालों में एक ही परिवार के 13 लोग थे। टक्कर इतनी जोरदार थी कि ऑटो के परखचे उड़ गए और ऑटो रेलवे फाटक से एक किमी तक ट्रेन के साथ घिसटता चला गया। रेलवे ने गेटमैन की लापरवाही मानते हुए क्रॉसिंग पर तैनात दो कर्मचारियों को निलंबित कर दिया क्योंकि रेल फाटक वक्त पर बंद नहीं हुआ था जिस वजह से ये हादसा हो गया।

*4 दिसंबर 2014 : उत्तर प्रदेश के मऊ जिले में एक स्कूल वैन एक मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग पर रेलगाड़ी की जद में आ गई थी, जिसमें पांच बच्चों की मौत हो गई। हादसे में 20 बच्चे घायल हो गए थे। दुर्घटना के संदर्भ में लोकसभा में रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने कहा था, ‘चालक की लापरवाही के कारण दुर्घटना हुई। घटना तब हुई जब लगभग 25 बच्चों से भरी स्कूल वैन मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग पार करते समय खूटाहार गांव के पास तामसा पैसेंजर रेलगाड़ी की चपेट में आ गई। सुबह घने कोहरे के कारण दृश्यता भी कम थी’।

      महत्वपूर्ण जानकारी:

  • भारतीय रेल के इतिहास में पहली ट्रेन दुर्घटना 25 जनवरी 1869 को हुई थी। यह हादसा पुना-बंबई मार्ग के भोरघाट में हुआ था।
  • सबसे बड़ी दुर्घटना 6 जून 1981 को बिहार में। मानसी-सहरसा के बीच बागमती नदी में ट्रेन गिर जाने से लगभग 800 लोग मारे गए थे।
  • रेल दुर्घटना के कारण इस्तीफा देने वाले पहले रेल मंत्री लालबहादुर शास्त्री थे।
  • रेलवे सुरक्षा बल का गठन 1882 में किया गया था।
  • देश के पास ऐसी 27 ट्रेनें हैं, जिनकी रफ्तार 110 किमी/घंटे है। हर दिन सवा दो करोड़ से अधिक लोग ट्रेन से यात्रा करते हैं।

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