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विश्लेषण: क्या इस चुनाव में बदल रही है घाटी की सियासत

पुण्य प्रसून वाजपेयी घाटी में कभी नारे लगते थे, ‘जिस कश्मीर को खून से सींचा वह कश्मीर हमारा है।’ तो बैनरों व पोस्टर से जगमगाते कश्मीर का यह आसमान किसका है। यह पैसे वालों का आसमान है जो सत्ता चाहते हैं। अब सत्ता को कोई क्या बदले, यह तो खुद ही कुर्सी के लिए हर […]

Author November 24, 2014 1:55 PM
जम्मु कश्मीर में इस बार नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी, कांग्रेस और भाजपा सभी अपनी किस्मत आज़मा रहे हैं।

पुण्य प्रसून वाजपेयी

घाटी में कभी नारे लगते थे, ‘जिस कश्मीर को खून से सींचा वह कश्मीर हमारा है।’ तो बैनरों व पोस्टर से जगमगाते कश्मीर का यह आसमान किसका है। यह पैसे वालों का आसमान है जो सत्ता चाहते हैं। अब सत्ता को कोई क्या बदले, यह तो खुद ही कुर्सी के लिए हर चुनाव में बदल जाती है। जो कल तक नेशनल कांफ्रेंस (एनसी) में था, आज पीडीपी का हो चला है। कल तक जो बायकाट का नारा लगाता था, आज दिल्ली की गोद में खेलने को तैयार है। सुरक्षा तंत्र भी अब सड़क से नहीं, अपने कैंपों से निशाना साधता है। वाजपेयी जी के दौर में एजंसियो ने एनसी के खिलाफ पीडीपी को पैदा किया। अब एजंसियां एनसी और भाजपा को साथ खड़ा करने में लगी हैं। और कांग्रेस जो एनसी के साथ सत्ता में रही, अब भाजपा को रोकने के लिए पीडीपी के साथ हो चली है। इस बार तो आजादी और बायकाट का नारा भी कोई नहीं लगा रहा। कश्मीरी चुनावी रंग में है। हर रैली में हजारों कश्मीरियों की भीड़ बताने लगी है कि घाटी बदल रही है। पर कुछ लोग अब भी पुराने नारे लगा रहे हैं।

श्रीनगर से नब्बे किलोमीटर दूर बांदीपुर के करीब सुंबल की गलियों में युवा कश्मीरियों कुछ का कहना है कि चुनाव तो झेलम के पानी की तरह है जो हमारे घर डुबा भी देंगे और फिर जिंदगी भी देंगे। इन गलियों में नब्बे के दशक में कूका पारे का राज था। और जिस उस्मान मजीद के चुनाव प्रचार के लिए सोनिया गांधी भी बांदीपुर पहुंचीं वह कभी कूका पारे ही नहीं बल्कि सीमापार के आतंक की गलियों में भी घूम चुका है। मजीद इस बार कांग्रेस का उम्मीदवार है।

न्यूज चैनलों के पर्दे पर जिंदाबाद के नारे हैं। नाचती गाती महिलाओं की टोलियां लोगों के दिलों में सेंध लगाने की मशक्कत कर रही हैं। एक तरफ चुनावी रंगत है तो दूसरी ओर अलगाववादियों के जिले स्तर तक के कैडरों का मुंह बंद कर दिया गया है। कोई घर में नजरबंद है, कोई अस्पताल में तो कोई जेल में और कोई थानों में कैद है क्योंकि बायकाट की आवाज उठनी नहीं चाहिए। सड़क पर सेना नहीं है बल्कि अब हर गांव और मोहल्ले में सेना को जानकारी देने वाले नौकरी पर हैं। यानी सेना अब खौफ पैदा करने वाली मौजूदगी से दूर सूचनाओं के आधार पर अभियान चलाएगी। चुनावी खुलेपन का नजारा चुनावी बिसात पर जीत-हार के लिए कहीं मोहरा है तो कहीं वजीर। क्योकि शहरो में कश्मीरी बोलता नहीं।

अब भी कुछ घटनाएं नब्बे के दौर की याद दिला कर लोगों को घरों में कैद कर देती हैं, यह भी कम सियासत नहीं। बीस नवंबर को त्राल में तीन आंतकी मारे जाते हैं और चुनावी उल्लास सन्नाटे में सिमट जाता है। कयास लगने लगते हैं कि त्राल में अब कोई वोट डालने निकलेगा नहीं तो जीत हार सिखों के वोटों पर निर्भर है जिनकी तादाद हजार भर है। तो भाजपा यहां जीत सकती है। लेकिन इस बार नेताओं को कुछ और भी डरा रहा है। युवा कश्मीरी के हाथ कलम थाम कर पहली बार आजादी शब्द दिलों में कैद रख दिल्ली की तरफ देखना चाहते हैं। जरूरत पड़ी तो आजादी का नारा भी लगा लेंगे। लेकिन एक बार भ्रष्टाचार से कश्मीर को निजात मिल जाए तो देखें कि दिल्ली की धारा में शामिल होने का रास्ता दिल्ली खुद कैसे बनाती है।

यह आवाज साबरपुरा की है। गंदेरबल में आने वाले साबरपुरा में तालीम के लिए स्कूल से आगे का रास्ता बंद है। हर कोई दिल्ली या अलीगढ़ तो जा नहीं सकता। लेकिन दिल्ली हमारे कश्मीर में तो आ सकती है। तो क्या यह नरेंद्र मोदी के लिए आवाज है। वाजपेयी ने भी कश्मीर के बारे में सोचा था। मोदी भी सोचें तो अच्छा होगा। लेकिन जम्मू के रास्ते कश्मीर नहीं आना चाहिए। घाटी के रास्ते जम्मू जाएं तो ही कश्मीरियत होगी। तो क्या घाटी बदलने को तैयार है। चुनाव के आंगन में कश्मीर को खड़ा न करें। कश्मीर के सच को मानें और समझें कि कश्मीर दिल्ली से भी दर्द लेकर लौट रहा है और इंग्लैंड व अमेरिका से भी। तालीम के लिए कश्मीर छोड़ें, तालीम लेकर कश्मीर न लौटें। कश्मीर सिर्फ बेवा और बुजुर्गों का रह जाए। सीमा पर कश्मीर है, सेना के हवाले कश्मीर है। क्या यह हिंदुस्तान के किसी राज्य में संभव है। कश्मीर की सियासी बोली न लगे तो बेहतर है।

दिल्ली में 12 बरस व्यवसाय करने के बाद वापस लौटे अल्ताफ के ये सवाल क्या बदलते कश्मीर की दस्तक है। क्योंकि पहली बार घाटी के चुनावी मैदान में इंग्लैंड और अमेरिकी विश्वविद्यालयों से निकले कश्मीरी लोकतंत्र के मायने समझने उतरे हैं। अवामी इत्तेहाद पार्टी के जीशान पंडित और शहजाद हमदानी अमेरिकी यूनिर्वसिटी से पढ़कर सियासत के मैदान में हैं। नेशनल कांफ्रेंस के जुनैब आजिम मट्टू हों या तनवीर सादिक, दोनों ही उर्दू की जगह अंग्रेजी बोलकर युवा कश्मीरियों को लुभा रहे हैं। कांग्रेस के बड़े नेता सैफुद्दीन सोज के बेटे सलमान सोज तो वर्ल्ड बैंक की नौकरी छोड़कर अब कश्मीर को अपने नजरिए से समझने और समझाने को आतुर हैं।

दिल्ली के जिन सवालों पर राजनीति करने वाले कश्मीरी नेता अपनी सत्ता के जुगाड़ में उतरते थे, इस बार पहली बार विदेशी विश्वविद्यालयों से पढ़कर आए युवा कश्मीरी युवा उनसे इसी सवालों पर दो-दो हाथ करने को तैयार हैं।

देवबंद के जमात ए उलेमा हिंद की फौज श्रीनगर की आभिजात्य कालोनियों से लेकर गुरेज और कंघन तक में कश्मीरी मुसलिमों को दिल्ली से ज्यादा मोदी के मायने समझा रही है। नारो की शक्ल में आवाज लगा रही है, ‘न दूरी है न खाई है, मोदी हमारा भाई है।’ लेकिन घाटी में तो मुश्किल सवाल यह नहीं है कि नारों का असर होगा या नहीं। मुश्किल पहली बार अपनों से उठता भरोसा है। क्योंकि गिलानी के बायकाट की आवाज के लिए उम्र के लिहाज से यह आखरी चुनाव है। मौलाना अंसारी बीमार हैं। अब्दुल गनी बट झेलम के पानी के बाद श्रीनगर छोड़ सोपोर लौट चुके हैं। सज्जाद लोन सियासत कम पासपोर्ट के लिए ज्यादा तड़पते है। इसलिए दिल्ली के साथ खड़ा होना उनकी जरूरत है क्योंकि हर तीन महीने में पत्नी के लिए वीजा की भीख दिल्ली से ही मांगनी पड़ती है। खुद का पासपोर्ट भी दिल्ली की इच्छा पर निर्भर है। तो फिर दिल्ली के साए में ही सियासत क्यों नहीं। वैसे भी वे वे अपने पिता की हत्या के बाद जबरदस्ती नेता बना दिए गए थे।

मीरवायज उमर फारुख भी पिता की हत्या के बाद झटके में नेता हो गए। यासीन मलिक जेल में हैं। लेकिन पहली बार उनके पिता गुलाम कादिर मलिक की याद भी कश्मीरियों को आने लगी है जो पेशे से ड्राइवर थे। तो क्या 2014 का चुनाव सारे जख्मो को कुरेद रहा है या इसे नए तरीके से परिभाषित कर रहा है। या फिर नब्बे के दशक में आतंक के साए से निकला नारा, ‘जिस कश्मीर को खून से सींचा, वह कश्मीर हमारा है’ अब बदल चुका है।

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