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भाषाबोध: भय की कुंजी भाषा

यह बात सही नहीं है कि हमसे कोरोना महामारी का सामना करने में कोई चूक नहीं हुई। पर जिन चूकों पर सबसे कम ध्यान गया है, वे भाषागत हैं। दरअसल, जब पूर्णबंदी की घोषणा की गई तो पहले चरण तक ज्यादातर लोगों को यह समझ में ही नहीं आया था कि यह क्या बला है। जब देश में पूर्णबंदी लागू हुई तो तो हमने इस पूरी प्रक्रिया से अनभिज्ञ होने की वजह से इसे एक आपातकालीन घटना का नाम दे दिया और शब्द चल पड़ा- तालाबंदी।

कोरोना संकट की वजह से लॉकडाउन और क्वारंटाइन जैसे शब्द आम प्रचलन में आए।

नरेंद्रनाथ त्रिपाठी
कोरोना महामारी के खतरे के बीच आदमी की जान के साथ उसकी अस्मिता और संवेदना के आगे भी बड़ी चुनौती खड़ी हुई है। इस चुनौती को हम सबसे ज्यादा उस भाषा के स्तर पर महसूस कर सकते हैं, जिसका प्रचलन इन दिनों सूचना और अभिव्यक्ति के एक नए अभ्यास के तौर पर हुआ है। इस अभ्यास में जहां अंग्रेजी शब्दों के स्थानापन्न के तौर पर कई देशज शब्द प्रचलन में आए हैं, वहीं कई ऐसे भाषिक प्रयोग भी हुए हैं जिनमें संवेदनात्मक असावधानी दिखती है। एक संकटपूर्ण दौर में शब्द और भाषा के नए प्रयोग-संदर्भों पर सामयिक विमर्श।

कोरोना संकट के मुकाबले के लिए लागू की गई पूर्णबंदी पूरी दुनिया के लिए परिवर्तन का काल रहा है। इस दौरान न केवल मानवीय आचार-व्यवहार बल्कि प्रकृति के रूप-रंग में भी आश्चर्यजनक बदलाव देखने को मिले हैं। बात अकेले भारत की करें तो यह देखना खासा दिलचस्प होगा कि इन बदलावों के बीच भारत ने कैसी उपलब्धियां हासिल की हैं और इनमें यहां की भाषाओं और विशेष रूप से हिंदी का क्या योगदान रहा है।

यह बात सही नहीं है कि हमसे कोरोना महामारी का सामना करने में कोई चूक नहीं हुई। पर जिन चूकों पर सबसे कम ध्यान गया है, वे भाषागत हैं। दरअसल, जब पूर्णबंदी की घोषणा की गई तो पहले चरण तक ज्यादातर लोगों को यह समझ में ही नहीं आया था कि यह क्या बला है। जब देश में पूर्णबंदी लागू हुई तो तो हमने इस पूरी प्रक्रिया से अनभिज्ञ होने की वजह से इसे एक आपातकालीन घटना का नाम दे दिया और शब्द चल पड़ा- तालाबंदी। यह बहुत गलत प्रयोग भी नहीं था। क्योंकि घरबंदी से लेकर कारोबारबंदी तक जो कुछ इस दौरान हुआ, उसे सूचित करने वाला यह सार्थक शब्द था।

इसके कारण को लेकर आम जनता के बीच जो शब्द प्रचारित किया गया वह ‘पैनडेमिक’ था। आम अंग्रेजी शब्द की तरह इसे समझने में भी लोगों को मशक्कत करनी पड़ी। इसके लक्षणों, बचाव और उपचार को लेकर जब पूरी जानकारी सामने आई तो लोगों ने कहा कि अरे यह तो महामारी है, छूत की महामारी और तब तक यह बड़े खौफनाक तरीके से फैल चुकी थी। इसके संक्रमण, प्रकोप और बचाव के उपायों के लिए जिन शब्दों का इस्तेमाल किया गया उनमें से अधिकतर शब्द हमारी संस्कृति से परे के शब्द थे।

अंग्रेजी शब्दों की आमद
लॉकडाउन, सोशल डिस्टेंसिंग, क्वारंटीन, आइसोलेशन, कंटेनमेंट जोन और इम्युनिटी जैसे शब्द हमारे बीच इस बीमारी से भी भयंकर रूप में सामने आए। हमने बिल्कुल ध्यान नहीं दिया कि देश की एक बड़ी आबादी इन अंग्रेजी शब्दों को समझने में या तो असमर्थ है या फिर इनके आशय को ग्रहण करने का उनके पास कोई पूर्व का अनुभव नहीं है। चाहे अहिंदी भाषी दक्षिण के राज्य हों या उत्तर भारत के हिंदी क्षेत्र, सभी जगह अंग्रेजी के ये शब्द एक खौफ की तरह ही आए। आम जनता जब तक इनके बारे में ठोस समझ बना पाती तब तक काफी देर हो चुकी थी और लोग शहरों से गांवों की तरफ बचाव के अंतिम उपाय के रूप में पलायन करना शुरू कर चुके थे।

भूख-प्यास से भागते लोगों की दयनीय पीड़ा और उनकी लाचारगी को हम सबने देखा। ये शब्द इन कम पढ़े-लिखे लोगों के ऊपर इस महामारी से अधिक जानलेवा साबित हुए। शहरों में भी पढ़े-लिखे काफी लोग इस डर से अछूते नहीं रहे। क्वारंटीन सेंटर को लोग डिटेंशन सेंटर सा समझने लगे। उनके अंदर इन शब्दों ने इतना भय पैदा कर दिया कि आत्महत्या तक की खबरें आने लगीं।

हालांकि अब मालूम हो चला है कि इस तरह की आपदाओं का भारतीय समाज ने पूर्व में भी सफलतापूर्वक सामना किया है। काश हम अपनी भाषा में इस आपदा के बारे में शुरू में ही जानकारी दे पाने में समर्थ हो गए होते तो शायद जो जानें गर्इं, उनमें से बहुतों को बचाया भी जा सकता था । अब तो महामारी के संबंध में काफी जानकारियां जुटा ली गई हैं। आज दवा से लेकर उपचार के तरीके और बचाव के किट सभी हमारे अपने हैं।

देसी शब्दों का कमाल
पूर्णबंदी के दूसरे-तीसरे दौर तक कोविड-19 का कोई टीका या प्रामाणिक दवा उपलब्ध नहीं थी। पर इसके उपचार की दिशा में आयुष मंत्रालय ने जो कुछ उपाय सुझाए उसने संजीवनी का काम किया। शरीर की अंदरूनी शक्तिऔर रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए ये वे नुस्खे थे, जिनका भारतीय समाज में सदियों से प्रयोग होता रहा है।

आयुष मंत्रालय द्वारा नुस्खे के रूप में प्रचारित आयुष काढ़ा दुनियाभर में जीवनदायी औषधि के रूप में लोकप्रिय हुआ। काढ़ा भारतीय औषधि विज्ञान में प्रयोग किया जाने वाला शब्द है, जो भारतीय समाज में सदियों से जाना जाता है। आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों के इस्तेमाल द्वारा हमने तरह-तरह के काढ़ों की बानगी आजमाई और वे सब आश्चर्यजनक रूप से कारगर साबित हुईं।

जब ‘क्वारंटीन’ के लिए संगरोध, ‘आईसोलेशन’ के लिए पृथकवास, ‘इम्युनिटी के लिए अंदरूनी शक्ति या प्रतिरोधक क्षमता जैसे शब्दों का प्रयोग विभिन्न माध्यमों के जरिए बढ़ा तो लोगों को इस बीमारी और इसके उपचार के तरीकों के बारे में भी सही जानकारी मिलने लगी। इस दौरान प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्र के नाम संबोधनों और ‘मन की बात’ कार्यक्रमों में इस्तेमाल किए गए शब्दों ने भी काफी असर दिखाया। देसी शब्दों ने दवा का काम किया। लोगों को देसी शब्दों से चुनौती का सामना करने के लिए अद्भुत शक्ति मिली, जिसका काफी सकारात्मक परिणाम आज देखने को मिल रहा है।

भाषा की शक्ति
भारत में ‘लॉकडाउन’ से लेकर ‘अनलॉक’ तक का पूरा अनुभव सच कहें तो भाषा के प्रयोग की एक अनुभवपरक कहानी है। इस दौरान इस महामारी के बारे में जानकारी प्रदान करने में सबसे अधिक योगदान स्थानीय भाषाओं और विशेष रूप से राजभाषा हिंदी का रहा है। कोरोनाकाल में अन्य बातों के साथ-साथ यह बात भी प्रमाणित हुई कि हम स्वदेशी भाषाओं के प्रयोग से इस तरह की आपदाओं का सफलतापूर्वक सामना कर सकते हैं। चूंकि इस दौरान बड़े निर्णय केंद्र सरकार द्वारा लिए जाते हैं, ऐसे में केंद्र सरकार की राजभाषा हिंदी के समक्ष यह एक बड़ी चुनौती थी कि वह इस महामारी से संबंधित संपूर्ण जानकारी को पूरे देश के लोगों को ठीक-ठीक समझा पाने में समर्थ हो पा रही है या नहीं।

हिंदी ने इस चुनौती को स्वीकार किया। हिंदी भाषा के जानकारों और प्रयोगकर्ताओं ने काफी मेहनत की, परंपरा से आए शब्दों से लेकर पुस्तकों में परिभाषित शब्दों का अध्ययन किया, जनता के बीच उनका प्रयोग किया और आज इन सब कोशिशों के आश्चर्यजनक परिणाम देखने को मिल रहे हैं। शब्दों की शक्तिसे कोरोना को संवेदनात्मक त्रासदी न बनने देने में हम हम काफी हद तक सफल हो रहे हैं।

अपने विचारों को अभिव्यक्त करने की शक्ति मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है। मनुष्य शब्दों के माध्यम से विचार प्रकट करता है। शब्द में असीम शक्ति है। शब्दों के सही प्रयोग से संपूर्ण सृष्टि में संतुलन बनाया जा सकता है। हमें इनका संरक्षण और विकास हर हाल में करना ही होगा। भाड़े की संस्कृति और उधार की तकनीक से देश को आत्मनिर्भर बनाना कठिन होगा। अपनी भाषा के बल पर हमने आजादी हासिल की। शब्द जीवंत अस्मिता के साथ अनमोल संपदा भी है।

स्वदेशी शब्दों के बल पर कोरोनो महामारी को समझ पाने के हमारे अभिनव प्रयोग ने हमें प्रेरित किया है कि न केवल स्वदेशी अनुसंधान उद्योग बल्कि अपनी देसी भाषा के शब्दों का प्रयोग करके हम अपनी जनता को सही समय पर सही जानकारी देकर बड़ी सफलता प्राप्त कर सकते हैं।

राजभाषा की जीत
कोरोना काल का असर संवेदना और अर्थ दोनों स्तर पर पड़ा है। संवेदना के स्तर पर हम चाहकर भी किसी का हाथ पकड़कर समझाने का साहस नहीं कर सकते, वहीं अर्थ के स्तर पर देश में लोगों को समझाने में अंग्रेजी शब्द कमजोर साबित हुए। अंग्रेजी शब्दों ने समाज में डरावना और मौकापरस्त माहौल बनाया। इससे लोगों को स्थिति की भयावहता का अंदाजा लगाने में कठिनाई हुई। उन्हें सुकून तब मिला जब विदेशी आपदा के लिए विदेशी की जगह स्वदेशी खासतौर पर हिंदी के शब्दों का प्रयोग बढ़ा। इस कार्य में मीडिया विशेष रूप से प्रिंट मीडिया का योगदान काफी सराहनीय रहा।

टीवी ने भी इस दिशा में प्रसंशनीय योगदान दिया। कोरोना काल में हमारी भाषा में जो रातोंरात बदलाव आया है वह सभी भाषाकर्मियों की उस मेहनत का परिणाम है जिन्होंने अन्य कोरोना योद्धाओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर बात को जनता तक ले जाने की कोशिश की है और भाषा को एक बार फिर अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बना कर उसे समाजोपयोगी बनाया है।

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