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कोरोना: नई वैक्सीन नीति से शहर और गांव के बीच बढ़ी असमानता, CoWin App पर रजिस्ट्रेशन अनिवार्य होने से और बढ़ रही खाई

वैक्सीन मार्केट में जबकि पहले से मांग और आपूर्ति बेमेल है, सरकार की संशोधित वैक्सीन खरीद नीति छोटे शहर-कसबों के अस्पतालों के हित में नहीं जाएगी। उनके विपरीत बड़े शहरों के बड़े अस्पतालों को वैक्सीन सहज उपलब्ध होगी।

प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक 16 जनवरी से मई के बीच 16.84 करोड़ वैक्सीन लगी थीं। जबकि सात मई को खत्म हुए सप्ताह का आंकड़ा 1.16 करोड़ था। (फोटो – पीटीआई)

एक मई के बाद, जब से कोविड के टीके 18 साल से ऊपर सब लोगों के लिए खुल गए हैं, वैक्सीन पाने वालों की संख्या घट गई है। यह संख्या पिछले आठ हफ्तों में सबसे कम है। यह संकेत है कि वैक्सीनेशन प्रक्रिया में अब असमानता और बढ़ेगी।

वैक्सीन मार्केट में जबकि पहले से मांग और आपूर्ति बेमेल है, सरकार की संशोधित वैक्सीन खरीद नीति छोटे शहर-कसबों के अस्पतालों के हित में नहीं जाएगी। उनके विपरीत बड़े शहरों के बड़े अस्पतालों को वैक्सीन सहज उपलब्ध होगी। गांव और शहर की खाई साफ है। यह असमानता अभी से दिख रही है। अस्पतालों की खरीद व ढुलाईक्षमता अलग होती है। इन बातों का कीमत पर भी होता है। सो, अस्पतालों की वैक्सीनों पर लागत अलग-अलग आएगी। तिस पर नई नीति में लाभार्थी के लिए कोविन पोर्टल पर पंजीकरण अनिवार्य हो गया है।

यह अनिवार्यता छोटे शहरों और कसबों पर असर डालेगी, जहां लोग स्मार्ट फोन को लेकर बड़े शहरों जितना स्मार्ट नहीं हैं। यही नहीं भारत में अभी भी सिर्फ 58 प्रतिशत लोगों के पास ही इंटरनेट कनेक्शन है, जिसके बिना कोविन पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन संभव नहीं। कोविन का एक दोष यह भी है कि वह केवल अंग्रेजी में ही उपलब्ध है और भारत की कितने प्रतिशत जनता अंग्रेजी में रजिस्ट्रेशन कराने में सक्षम है, यह बात भी सब लोग जानते हैं। वैसे दिलचस्प बात यह है कि कोविन का वैक्सीनेटर ऐप जिसका इस्तेमाल वैक्सीन लगाने वाले करते हैं, वह 12 भारतीय भाषाओं में उपलब्ध है।

कोविन ऐप की एक बहुत बड़ी विशेषता भी ग्रामीणों के खिलाफ जाएगी। विशेषता यह है कि कोविन ऐप पर इंटरनेट के एक्सपर्ट अपने शहर के बाहर के केंद्रों पर भी एप्वाइंटमेंट फिक्स कर सकते हैं। इतने जागरूक लोग कसबों या गांवों में कहां से मिलेंगे। वरिष्ठ सरकारी अफसरों का कहना है कि कोविन अनिवार्य करने के पीछे आइडिया यह था कि वैक्सीन सेंटरों पर भीड़ का जमावड़ा न हो। उन्होंने कहा जो लोग आनलिन रजिस्टर नहीं करा सकते वे कॉमन सर्विस सेंटर या आइवीआरएस कॉल सेंटर के जरिए खुद को पंजीकृत करा सकते हैं।

प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक 16 जनवरी से मई के बीच 16.84 करोड़ वैक्सीन लगी थीं। सात मई को खत्म हुए सप्ताह का आंकड़ा 1.16 करोड़ था। यह आठ हफ्तों में निम्नतम था। दरअसल पचास फीसदी वैक्सीन खुद खरीदने के केंद्र के फैसले से राज्य सरकारों और प्राइवेट अस्पतालों को बाकी की वैक्सीन खरीदने के लिए एक दौड़ में लगा दिया गया है। प्राइवेट अस्पताल, कारपोरेट अस्पताल और राज्य सरकार अब वैक्सीनों की लॉजिस्टिक्स, ढुलाई और भंडारण के लिए पूरी तरह अपने पर निर्भर हैं। इन सबमें विलंब हो रहा है जिसका अंतिम दुष्परिणाम लोगों के हिस्से ही पड़ेगा।

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