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विशेष: नीति और शिक्षा की मातृभाषा

राष्ट्रीय शिक्षा नीति की घोषणा ने देश में कोरोना संकट के बीच एक सकारात्मक विमर्श को जन्म दिया है। इस नीति के साथ जहां शिक्षा का सवाल फिर से केंद्र में आ गया है, वहीं इसमें जिस तरह मातृभाषा को अहमियत दी गई है उससे भारतीय भाषाओं के उन्नयन का एक सर्वथा नया दौर शुरू हो सकता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति की प्रस्तावना और प्रावधानों पर आज का विशेष

मातृभाषा से पढ़े कई लोग देश के शिखरपुरुष सिद्ध हुए। कविगुरु रवींद्रनाथ ठाकुर की मातृभाषा बांग्ला थी और उनकी शिक्षा का प्रारंभ बांग्ला माध्यम के विद्यालय में हुआ था।

राजकुमार भारद्वाज
भारत में सात दशकों में एक ऐसी शिक्षा नीति का सूत्रपात हुआ है, जो देशज और चोटी के चिंतकों, विचारकों की अवधारणा के अनुरूप है और जिसमें भारत के लिए भारतीय परिवेश में मातृभाषा में मौलिक विचार के संग नवाचार और नवोन्मेष के प्रसून पल्लवित होंगे। आशा की यह किरण भी जगी है कि है कि अलाना मोंटेसरी स्कूल, फलाना इंग्लिश स्कूल और ढिमकाना पब्लिक स्कूल के दासतालिप्त मनोविकारों से भारत की भावी पीढ़ियों को मुक्ति मिलेगी। ‘कोई तिरंगा थामने वाला नहीं मिलेगा’ वाले कथनों और विचारधारा को चुनौती देते हुए प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी ने शिक्षा नीति में मातृभाषा की अनिवार्यता को समाविष्ट करने का बड़ा निर्णय किया है।

दूरगामी परिणाम
सबल और सक्षम भारत के निर्माण में इसके दूरगामी परिणाम दिखाई देंगे। यह नीति कहीं न कहीं महात्मा गांधी, सरदार पटेल, रवींद्रनाथ ठाकुर और पंडित दीनदयाल उपाध्याय जैसे राष्ट्रनायकों की अभिलाषाओं को भी पूरा करेगी। इस नीति के मंतव्यों को इसरो के पूर्व प्रमुख के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में विशेषज्ञों की एक समिति ने लिपिबद्ध किया था, जिसे प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में 29 जुलाई, 2020 को मंत्रिमंडल ने स्वीकृति दी। नई शिक्षा नीति में पांचवीं कक्षा तक मातृभाषा, स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा में अध्ययन-अध्यापन का माध्यम रखने का उल्लेख है।

स्वदेशी चिंतक दीनदयाल उपाध्याय मानते थे कि कोई भी बात अपनी भाषा में जितने अच्छे तरीके से कही जा सकती है, दूसरी भाषा में नहीं। वे भारतीय और मातृभाषा का प्रखर पक्षपोषण करते थे। उनका कहना था कि अंग्रेजीभक्त हिंदीभाषियों पर चिरकाल के लिए अंग्रेजी को लादे रखना चाहते हैं। वे अन्य भारतीय भाषाओं का गला घोंटना चाहते हैं। स्वतंत्र भारत में भारतीय भाषाओं के अधिकार का हनन कदापि नहीं हो सकता।

कस्तूरीरंगन का तर्क
कस्तूरीरंगन का कहना है कि बच्चा जन्म से ही बाहरी दुनिया से मातृभाषा में संवाद करता है, उस वजह से मातृभाषा पर मस्तिष्क की सक्रियता अन्य किसी माध्यम से अधिक प्रभावशाली होती है। यही कारण है कि नई नीति में मातृभाषा पर विशेष जोर दिया गया है।

दरअसल, मातृभाषा का सरल वर्तूल उस आयुवस्था के लिए सहज होता है, जिसमें उसका पालन-पोषण होता है। बालक के शिक्षार्जन का प्रादुर्भाव उसी बोली और भाषा में होता है, जिसे उसके प्रथम गुरुमाता-पिता, दादा-दादी तथा सहचर बोलते हैं। भाषा के इस परिवेश और संस्कार से जुड़कर बच्चे की ग्राह्यता सर्वाेच्च स्तर पर न सिर्फ अपनी समझ विकसित करती है बल्कि उसमें एक स्वाभाविक बोध का भाव जागृत होता है। बच्चा सहज भाव से शिक्षा को ग्रहण करता है। निर्देश का माध्यम मातृभाषा में होने से बच्चे सूचना और तथ्य आसानी से संग्रहित करते हैं और इसके लिए उन्हें कोई विशेष प्रयोजन नहीं करना पड़ता है। जैसे ही बच्चे का सामना परभाषा से होने लगता है, तो उसमें विषय विशेष के प्रति अरुचि बढ़ने लगती है। पांचवीं कक्षा तक के बच्चों के लिए शिक्षा का अर्थ उस अवसंरचना को विकसित करने सरीखा होता है जिसमें ज्ञान समा सके ताकि बच्चा जीवनपर्यंत उस ज्ञान के विवेकपूर्ण विश्लेषण से लोकाचार के संग नवाचार के लिए प्रवीण हो सके।

अकेले हिंदी पर जोर नहीं
नई शिक्षा नीति में बात मात्र हिंदी अकेले की नहीं, वरन हिंदी की सभी सखियों पंजाबी, डोगरी, पहाड़ी, गढ़वाली, कुमाउंनी, नेपाली, परबतिया, मंडियाली, कुल्लवी, चांबियाली, क्योंथली, कांगड़ी, सिरमौरी, बघाटी, बिलासपुरी, बांग्ला, भोजपुरी, अवधी, मगही, बघेली, कन्नौजी, रुहेली, ब्रज, बुंदेली, छत्तीसगढ़ी, मालवी, नागपुरी, खोरठा, पंचपरगनिया, हरियाणवी, बांगरू, हाड़ौती, राजस्थानी, गुजराती, मराठी, दक्खिनी हिंदी, गुलबर्गी हिंदी, बीदरी हिंदी, बीजापुरी हिंदी, हैदराबादी हिंदी, बंबईया हिंदी, कलकतिया हिंदी, कन्नड़, तमिल, कोंकणी और तेलुगु आदि भाषाओं और बोलियों में नवप्राण का संचार करने की बात कही गई है। नई नीति से इन सभी क्षेत्रीय भाषाओं के विकास के मार्ग खुलेंगे। इनमें पठन-पाठन से इन भाषाओं के साहित्य सृजन का माहौल और समृद्ध होगा।

क्षेत्रीय भाषाओं की फिक्र
वैदिक गणित, दर्शन और प्राचीन भारतीय परंपरा से जुड़े विषयों का विपुल भारतीय ज्ञान मात्र भारत की क्षेत्रीय भाषाओं में ही संभव है, क्योंकि यह देश के विभिन्न अंचलों में क्षेत्रीय भाषा के शब्दों के संग विकसित हुआ। कई बार तो क्षेत्रीय भाषाओं के शब्दों के अन्य भाषाओं में समानार्थी शब्द ही नहीं मिलते हैं, तो पूरक शब्दों के प्रयोग से विषय में भटकाव तक देखने को मिल जाता है। जाहिर है कि नई नीति के कारण अब मातृभाषा ऐसे तमाम झंझावात से उबारेगी।

जो पीढ़ी मातृभाषा में शिक्षा ग्रहण करेगी, वह पीढ़ी भाविष्य में वही उत्तराधिकार भावी पीढ़ियों को सौंपेगी। ये बच्चे कल को अपनी मातृभाषा के राजदूत होंगे। फट्टे चक द्यांगे, भालो, कैम छो, वणक्कम आदि शब्दों की तरह ये भाषायी राजदूत अपनी भाषा को सर्वग्राही बनाएंगे। इस क्रम से क्षेत्रीय भाषाओं का उत्तरोत्तर विकास होगा, जिनकी दशा इस समय चिंतनीय है।

भाषाई विवाद का हल
जब भाषाओं का प्रयोग बढ़ेगा, तो अन्य भाषा-भाषियों में भी मातृभाषा का संवाद और संप्रेषण बढ़ेगा। इससे राज्यों के मध्य भाषाई विवाद भी समाप्त होंगे। हम प्रासंगिकता के अभाव में विलुप्त हो रही भाषाओं की उस अधोगति से उबर सकेंगे, जिसमें हमें अपने वेद, पुराण, शास्त्र और टीकाओं की मूल पांडुलिपियां जर्मनी और जापान से सहेजना पड़े।

भेड़चाल में अंग्रेजी
कुछ प्रांतों ने भेड़चाल में प्राथमिक शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी कर दिया है, जबकि उनकी मातृभाषाएं काफी समृद्ध हंै। जम्मू-कश्मीर तथा नगालैंड के सभी स्कूलों में शिक्षा का एकमात्र माध्यम अंग्रेजी है जबकि महाराष्ट्र, दिल्ली, तमिलनाडु, बंगाल समेत कुछ अन्य राज्यों में छात्रों को अंग्रेजी भाषा को माध्यम चुनने का विकल्प दिया जाता है। मातृभाषा से पढ़े कई लोग देश के शिखरपुरुष सिद्ध हुए। कविगुरु रवींद्रनाथ ठाकुर की मातृभाषा बांग्ला थी और उनकी शिक्षा का प्रारंभ बांग्ला माध्यम के विद्यालय में हुआ था। देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की आरंभिक शिक्षा बिहार के सीवान जिले के विद्यालय में हिंदी, संस्कृत और फारसी में हुई थी। डॉ. आंबेडकर की प्राथमिक शिक्षा महाराष्ट्र के सतारा में मराठी माध्यम से हुई। टाटा समूह के अध्यक्ष नटराजन चंद्रशेखरन ने आरंभिक शिक्षा मातृभाषा तमिल में ग्रहण की। देश में अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में शिक्षा ग्रहण करने की अंधी दौड़ तो अंग्रेजों के भाषासंकर मानसपुत्रों के कारण हुई। अन्यथा कोई कारण नहीं कि मातृभाषा उत्तुंग शिखरों का स्पर्श करने में उत्तम साध्य सिद्ध न हो।

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