दिक्कत यह है कि PM ने जितना वक्त मोरों को दिया, उतना मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को न दिया- नरेंद्र मोदी पर कांग्रेसी नेता का कटाक्ष

वह आगे बोले- दिक्कत क्या है न कि जितना समय प्रधानमंत्री ने मोरों को दिया, उतना मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को नहीं दिया। जितना वक्त उन्होंने मोरों के साथ फोटो खिंचाने में लगाया, अगर उत्पादन क्षेत्र की तकलीफें जान लेते तो ये कंपनियां एक के बाद एक देश के बाहर नहीं जातीं।

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मोर के साथ विभिन्न मौकों पर पीएम नरेंद्र मोदी। (फाइल फोटो)

कांग्रेस के प्रवक्ता गौरव वल्लभ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कटाक्ष किया है। आरोप लगाते हुए कहा है कि असल दिक्कत यह रही कि पीएम मोरों के साथ फोटों खिंचाने में व्यस्त रहे। उन्होंने जितना वक्त मोरों को दिया अगर उतना मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर (उत्पादन क्षेत्र) को दिया होता, तब तस्वीर कुछ और होती।

ये बातें उन्होंने शुक्रवार (10 सितंबर, 2021) को हिंदी न्यूज चैनल ‘न्यूज 24’ पर ऐंकर संदीप चौधरी के साथ एक टीवी डिबेट के दौरान कहीं। बकौल वल्लभ, “ढाई लाख लोगों के ऊपर रोटी-पानी और रहने का संकट आ चुका है। हमारे मित्र कह रहे हैं कि फोर्ड मोटर्स कंपनी खराब है। ऐसा क्यों हुआ? उन्होंने आंकड़ा दिया ईज ऑफ डूइंग बिजनेस। अरे, ईज ऑफ डूइंग बिजनेस अच्छा होता, तो ये कंपनियां क्यों जातीं? एक के बाद एक…।”

वह आगे बोले- दिक्कत क्या है न कि जितना समय प्रधानमंत्री ने मोरों को दिया, उतना मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को नहीं दिया। जितना वक्त उन्होंने मोरों के साथ फोटो खिंचाने में लगाया, अगर उत्पादन क्षेत्र की तकलीफें जान लेते तो ये कंपनियां एक के बाद एक देश के बाहर नहीं जातीं। नतीजतन क्वार्टर वन की जीडीपी है, जो कि बत्तीस दशमलव तीन लाख करोड़ है, वह चार साल पुराने स्तर पर जा पहुंची है।

रोजगार के मुद्दे को लेकर मेक इन इंडिया और फोर्ड पर हुई बातचीत के दौरान अर्थशास्त्री विजय सरदाना ने बताया- भारत से फोर्ड का जाना बदलते भारत की तस्वीर है। इसे सकारात्मक तरीके से देखें, क्योंकि ओला, ऊबर के आने से कारों की सेल कम हो गई है। मेरे आईआईटी और आईआईएम के जितने साथी थे, वे नौकरी के बाद गाड़ी खरीदते थे। अब वे ओला-ऊबर का इस्तेमाल कर रहे हैं।

सरदाना के मुताबिक, लोग अधिक गाड़ी नहीं खरीद रहे हैं। देश में पार्किंग की समस्याएं हैं, जिससे वे दुखी हैं। नई गाड़ी लेते हैं, तब सर्विस, ड्राइवर, पार्किंग और रख-रखाव आदि के खर्च बच जाते हैं। साथ ही हिंदुस्तान का उपभोक्ता पुरानी तकनीक नहीं चाहता है। 1995 में फोर्ड आई थी, आज बंदकर के जा रहा है। आप 2019-20 की कंपनी की सेल देखें, तब -14 फीसदी थी। उस वक्त तो कोरोना भी नहीं था। जब आप उम्मीद करते हैं कि हिंदुस्तान का उपभोक्ता अमेरिका का पुराना मॉडल भारत में नया कर के बेचोगे, तब वह नहीं चलने वाला है।

दरअसल, अमेरिका की प्रमुख वाहन विनिर्माता कंपनी फोर्ड द्वारा भारत में कारों का उत्पादन बंद करने की अचानक घोषणा की गई। हालांकि, इसके अगले दिन शुक्रवार को एक वरिष्ठ सरकारी सूत्र ने समाचार एजेंसी पीटीआई-भाषा को बताया कि यह निर्णय देश के कारोबारी माहौल को परिलक्षित नहीं करता है, बल्कि यह परिचालन संबंधी मुद्दों से जुड़ा मामला है।

सूत्र, सरकार में एक वरिष्ठ अधिकारी हैं। उन्होंने पहचान उजागर नहीं करने की शर्त पर कहा कि जापानी और कोरियाई कार विनिर्माताओं से प्रतिस्पर्धा के कारण अमेरिकी कंपने ने उत्पादन बंद करने का निर्णय किया है। फोर्ड मोटर कंपनी ने गुरुवार को घोषणा की कि वह भारत में अपने दो विनिर्माण प्लांट्स को बंद करेगी और केवल आयातित वाहनों की ही बिक्री करेगी।

फोर्ड, जिसने अपने चेन्नई (तमिलनाडु) और साणंद (गुजरात) संयंत्रों में लगभग 2.5 अरब डॉलर का निवेश किया है, इन संयंत्रों से उत्पादित इकोस्पोर्ट, फिगो और एस्पायर जैसे वाहनों की बिक्री बंद हो जायेगी। जनरल मोटर्स के बाद भारत में प्लांट बंद करने वाली फोर्ड दूसरी अमेरिकी वाहन कंपनी है। साल 2017 में जनरल मोटर्स ने कहा था कि वह भारत में वाहनों की बिक्री बंद कर देगी क्योंकि दो दशकों से अधिक समय तक संघर्ष करने के बाद भी उसके कारोबार में बदलाव नहीं आया है।

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