DU पाठ्यक्रम में दो दलित लेखिकाओं व महाश्वेता देवी को लाएं वापस- अरुंधति, गुहा और शबाना समेत एक हजार बुद्धिजीवियों की मांग

हस्ताक्षर करने वालों में लेखक विक्रम चंद्रा और पेरुमल मुरुगन, अभिनेत्री शर्मिला टैगोर व नंदिता दास के साथ स्कॉलर रोमिला थापर और जयति घोष भी शामिल हैं।

Arundhati Roy, Ramachandra Guha, Shabana Azmi
दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के वीसी और राष्ट्रपति को इस बाबत याचिका भेजने वालों में लेखिका अरुंधति रॉय, स्कॉलर राम चंद्र गुहा और एक्ट्रेस शबाना आजमी हैं। (एक्सप्रेस आर्काइव फोटो)

दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के अंग्रेजी पाठ्यक्रम से हटाई गईं तीन महिला लेखकों के समर्थन में देश के एक हजार से अधिक बुद्धिजीवी आगे आए हैं। इनमें लेखिका अरुंधति रॉय, शिक्षाविद रामचंद्र गुहा और अभिनेत्री शबाना आजमी भी शामिल हैं, जिन्होंने दो दलित लेखिकाओं (बामा और सुखीरथरानी) और महाश्वेता देवी की वापसी की मांग उठाई है।

इस बाबत देश के कुल 1,150 हस्ताक्षरकर्ताओं ने डीयू के कुलपति के साथ राष्ट्रपति से हटाई गई महिला लेखकों को बहाल करने के लिए याचिका दायर की है। हस्ताक्षर करने वालों में लेखक विक्रम चंद्रा और पेरुमल मुरुगन, अभिनेत्री शर्मिला टैगोर व नंदिता दास के साथ स्कॉलर रोमिला थापर और जयति घोष भी शामिल हैं।

याचिका में इसके अलावा अखिल भारतीय दलित महिला अधिकार मंच, एशिया दलित अधिकार मंच, बांग्ला दलित साहित्य संस्था और दलित मानवाधिकार के लिए राष्ट्रीय अभियान सरीखे दलित संगठनों द्वारा भी हस्ताक्षर किए गए हैं। दरअसल, डीयू को दो दलित लेखकों के साथ प्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता को पांचवें सेमेस्टर के अंग्रेजी पाठ्यक्रम से हटाने पर विरोध का सामना करना पड़ रहा है।

याचिका पर साइन करने वालों के संयुक्त बयान में कहा, “हटाए गए ग्रंथ मौलिक रूप से महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे दलित और आदिवासी समुदायों के प्रणालीगत उत्पीड़न को महसूस करने में मदद करते हैं। खासकर लिंग के संदर्भ में…और हमारे समकालीन लोकाचार और राजनीति की बेहतर प्रशंसा प्रदान करते हैं। क्या यह ऐसा कुछ नहीं है, जिसे स्वतंत्र भारत के युवा पुरुषों और महिलाओं को जानने और उनसे जुड़ने की जरूरत है? एक बेहतर और समान दुनिया का निर्माण कैसे होगा? या क्या हम विरोध करने वाली महिला और आदिवासी को दिल्ली विवि 2021 के पाठ्यक्रम की परिधि में वापस ला रहे हैं? हम किससे डर रहे हैं?”

आगे बताया गया, “1947 के दशकों बाद अनुवाद और अंग्रेजी में भारतीय साहित्य को डीयू के अंग्रेजी सिलेबस के उपनिवेशित परिसर में प्रवेश की अनुमति दी गई थी। क्या लेखकों की जाति, वर्ग और लिंग के संदर्भ में और उनके द्वारा जीवंत किए गए संसार के संदर्भ में प्रक्रिया को रोक दिया जाना चाहिए? हम विवि से अपने फैसले पर फिर से विचार करने का आग्रह करते हैं।”

मामले से जुड़ी याचिका डीयू के मिरांडा हाउस से अंग्रेजी के चार एसोसिएट प्रोफेसरों (दीपिका टंडन, सरस्वती सेन गुप्ता, शम्पा रॉय और शर्मिला पुरकायस्थ) द्वारा मंगाई गई थी। बाद में इसे बड़े स्तर पर पहुंचाने के लिए लोगों के पास प्रसारित किया गया।

वैसे, डीयू के रजिस्ट्रार विकास गुप्ता ने पहले आलोचना का जवाब देते हुए कहा था कि पाठ्यक्रम “समावेशी” था, लेकिन उन्होंने कहा कि “विवि इस विचार की सदस्यता लेता है कि अध्ययन के एक भाषा पाठ्यक्रम में पाठ का हिस्सा बनने वाली साहित्यिक सामग्री में ऐसी सामग्री होनी चाहिए जो किसी भी व्यक्ति की भावना को चोट न पहुंचाए।”

इसी बीच, दक्षिणपंथी शिक्षकों के समूह एनडीटीएफ ने कहा कि “हिंदू धर्म और हमारी प्राचीन सभ्यता को बदनाम करने, सामाजिक जातियों के बीच दुश्मनी को कायम रखने, आदिवासियों के बीच उग्रवादी माओवाद और कट्टरवाद को प्रोत्साहित करने आदि” का प्रयास किया गया था।

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