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लापरवाही: एम्स में कोरोना संक्रमित शवों की अदला-बदली, अलग-अलग रीति से हुआ दोनों का अंतिम संस्कार

एम्स के ट्रॉमा सेंटर में एक पत्रकार की संदिग्ध मौत के 24 घंटे बाद लापरवाही का एक और बड़ा मामला सामने आया है। इसमें दो कोरोना मरीजों की मौत के बाद उनके शव बदल दिए गए। इनमें एक मरीज अंजुम का शव दूसरे मरीज कुसुम के परिजनों को दे दिया गया और कुसुम का शव अंजुम के परिवार को।

Coronavirus, COVID-19, Mumbai, Delhiनई दिल्ली के पंजाबी बाग इलाके में श्मशान घाट के बाहर खड़ी एंबुलेंस। यहां पर इनदिनों सिर्फ कोरोना से मरने वालों की लाशों को जलाया जा रहा है। (फोटोः पीटीआई)

एम्स के ट्रॉमा सेंटर में एक पत्रकार की संदिग्ध मौत के 24 घंटे बाद लापरवाही का एक और बड़ा मामला सामने आया है। इसमें दो कोरोना मरीजों की मौत के बाद उनके शव बदल दिए गए। इनमें एक मरीज अंजुम का शव दूसरे मरीज कुसुम के परिजनों को दे दिया गया और कुसुम का शव अंजुम के परिवार को। इतना ही नहीं लापरवाही का आलम यह रहा कि जब इस गड़बड़ी का पता चला तब भी ध्यान ही नहीं दिया गया और कुसुम के परिजनों ने हिंदी रीति से अंजुम का संस्कार कर दिया। जबकि अंजुम के परिवार को अपने शव को मिट्टी देना भी नसीब न हुआ।

अंजुम के भाई नसीम शाह ने बिलखते हुए बताया कि हम बरेली से अपनी बहन को पीलिया के इलाज के लिए लाए थे तो जांच में कोरोना पाया गया तो ट्रॉमा सेंटर भेज दिया। जहां कल तक हमसे तीन यूनिट खून मांगा हमने वह भी दिया। इसके बाद रात को अचानक फोन आया कि आप के रिश्तेदार की मौत हो गई है। आप सुबह किट लेने आ जाना। यहां आकर हम एक बार चेहरा दिखाने की गुहार लगाते रहे लेकिन हमे चेहरा नहीं देखने दिया।

हमे पहले कहा गया कि आप पंजाबी बाग पहुचों वहीं शव आएगा। फिर बाद में कहा कि नहीं आप दिल्ली गेट जाओ शव वहां आएगा। उन्होंने बताया कि कर्मचारी ने उनसे कहा कि कब्रिस्तान पहुंचों हमें 500 रुपए दे देना हम वहीं चेहरा दिखा देंगे। जब गड्ढा तैयार हो जाए तो हमे फोन करना हम शव लेकर आ जाएंगे। जब हमने तीन हजार का ताबूत खरीद लिया ढाई हजार देकर गढ्ढा खुदवा लिया कफन वगैरह लाए।

शव आने पर हमने जब 500 रुपए दिए तभी उसने चेहरा दिखाया लेकिन तब तो हम भौचक रह गए यह हमारी बहन नहीं थी। उन्होंने बताया कि इसके बाद उसने परची देखी तो यह कुसुम नाम के मरीज का शव। वह बोला आप लोग यहीं रहो हम गलती से किसी और का शव ले आए। सही शव लेने गया कर्मचारी कई घंटे नहीं आया। काफी देर टरकाते रहे।

अंत में हार कर हम अस्पताल पहुंचे तो पता चला कि हमारी बहन के शव का तो पंजाबी बाग में हिंदू रीति से संस्कार कर दिया। फिर हमने 100 नंबर पर फोन किया। हम सुबह से भटक रहे पुलिस वाले एफआइआर तक नही लिख रहे।

कब्रिस्तान में पैसा वापस लेने गए वह भी नहीं मिला। मां आंगनबाड़ी में थी। इस बारे में ट्रॉमा सेंटर के मुखिया प्रोफेसर राजेश मल्होत्रा से इस बारे में बात करने की कई बार कोशिश की लेकिन उनका फोन नहीं उठा।

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